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    जंगलों में हाथियों के हरा चारा के लिए वैज्ञानिक से सीखा गुर

    Published: Wed, 13 Sep 2017 11:47 PM (IST) | Updated: Wed, 13 Sep 2017 11:47 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    0 हाथी प्रभावित क्षेत्र के वन अधिकारी व कर्मचारी हुए शामिल

    0 प्राकृतिक रूप से उगने वाले घास बन सकते हैं बेहतर विकल्प

    0 हाथियों को जंगल में ही रोके रखने के लिए एक और पहल

    अंबिकापुर । नईदुनिया प्रतिनिधि

    हाथी विचरण क्षेत्रों में चारे की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी वन विभाग ने पहल शुरू कर दी है। जंगलों में ही हाथियों को चारा-पानी की पर्याप्त उपलब्धता प्रदान कर रोके जाने की मंशा से वन विभाग अब वैज्ञानिकों से भी उपाय सीख रहा है। बुधवार को रायगढ़ जिले में देश के ख्यातिलब्ध बाटनिस्ट व इकोलाजिस्ट डा.मरूतकर की उपस्थिति में छत्तीसगढ़ के हाथी प्रभावित 12 वन मंडलों के अधिकारियों-कर्मचारियों का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया व जशपुर जिले के अधिकारियों-कर्मचारियों ने भी हिस्सा लेकर जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले घास और हरे चारे को बढ़ाने का गुर सीखा।

    सरगुजा वनवृत्त के तैमोर पिंगला अभ्यारण्य क्षेत्र, गुरूघासीदास अभ्यारण्य क्षेत्र में वर्ष भर हाथियों की मौजूदगी रहती है। अभ्यारण्य क्षेत्र में ही चारा-पानी की पर्याप्त व्यवस्था होने के कारण ये हाथी शायद ही कभी जंगलों से निकल आबादी क्षेत्र की ओर रूख करते हैं। दोनों अभ्यारण्य क्षेत्र में हाथियों के रहवास हेतु चारा, पानी की व्यवस्था भी कराई गई है। यही उपाय यदि हाथी विचरण क्षेत्र के जंगलों में कर दिया जाए तो हाथी शायद आबादी क्षेत्र में प्रवेश कर जानमाल को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। हाथियों के विचरण वाले जंगलों में चारा की व्यवस्था सुनिश्चित करने वैज्ञानिकों की मदद ली जा रही है। वन संरक्षक वन्य प्राणी केके बिसेन ने बताया कि महाराष्ट्र के अमरावती के डा. मरूतकर ने बुधवार को वन अधिकारियों-कर्मचारियों को जंगलों में हाथियों के लिए चारा की उपलब्धता हेतु प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि जंगलों में जल जमाव वाले क्षेत्रों में वर्ष भर नमी बनी रहती है। ऐसे नमीयुक्त स्थानों पर बगैर अतिरिक्त खर्चे के हरा चारा की व्यवस्था की जा सकती है। जंगल में दो प्रकार के घास होते हैं। एक ऐसा घास होता है, जिसे हाथी आहार के रूप में उपयोग करते हैं व दूसरे प्रकार के घास का सेवन उनके द्वारा नहीं किया जाता। उन्होंने बताया कि नहीं खाए जाने वाले घास का पैदावार अधिक होता है और आहार के रूप में उपयोग की जाने वाली घास कम उगती हैं। यदि जिस घास को हाथी नहीं खाते उसे उखाड़कर नष्ट कर दिया जाए तो हाथियों द्वारा खाए जाने वाले घास की प्रचूरता हो जाएगी। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए प्रदेश के सभी हाथी प्रभावित वन मंडलों में प्रयास किए जाएंगे,ताकि हाथियों को जंगल में ही रोका जा सके।

    जंगलों को बचाना होगा आग से

    वन संरक्षक वन्य प्राणी केके बिसेन ने बताया कि जंगलों में हाथियों के प्रचूर आहार के लिए आग से बचाव भी जरूरी है। सरगुजा वनवृत्त के जंगलों में आग लगाए जाने की घटनाओं में काफी कमी आई है, लेकिन इस वर्ष से ऐसा प्रयास किया जाएगा कि जंगलों में आग लगने की एक भी घटना न हो। उन्होंने बताया कि यदि जंगलों में आग नहीं लगी तो हाथियों के लिए चारा की व्यवस्था करना भी आसान होगा।

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