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    पंचायती राज में पंचायत प्रतिनिधि हुए बेबस

    Published: Sat, 18 Feb 2017 12:51 AM (IST) | Updated: Sat, 18 Feb 2017 12:51 AM (IST)
    By: Editorial Team

    बेमेतरा। निप्र

    पूरे देश में पंचायती राज लागू किए जाने के पीछे शासन की मंशा रही कि जिला स्तर पर जिला पंचायत तथा ब्लाक स्तर पर जनपद पंचायत के माध्यम से ग्रामीण अंचल मे विकास तय कर सकें। बकायदा शासन स्तर पर व्यवस्था दी भी गई है। किन्तु बेमेतरा जिले में अधिकारियों की कोताही से यह व्यवस्था जनप्रतिधियों के लिए आफत बन गई है। बैठक में अधिकांश विभागीय अधिकारी आते नहीं। जनप्रतिनिधि न समस्या रख पाते हैं और न ही इसका निराकरण ही हो पाता है। ऐसे में वे आम लोगों को जवाब भी नहीं दे पाते।बेमेतरा जिले में कुल विकासखंड हैं। जिला पंचायत बेमेतरा में कांग्रेस के अध्यक्ष काबिज है। वहीं साजा विकासखंड जनपद में कांग्रेस का कब्जा है। तीन अन्य विकासखंड बेमेतरा, नवागढ तथा बेरला में भाजपा समर्थित अध्यक्ष काबिज है। पंचायत चुनाव गैर राजनैतिक चुनाव होता है किन्तु पंरपरा चल निकली है कि राजनीतिक दलों के द्वारा समर्थन देने की आड़ ली जाती है।

    पूछ परख नहीं

    त्रिस्तरीय पंचायती राज में यह प्रावधान दिया गया है कि पंचायत प्रतिनिधियों को ग्रामीण अंचलों के विकास के लिए अपनी बात रखें। जिससे क्षेत्र का विकास सुनिश्ति किया जा सके। किन्तु ऐसा हो नहीं रहा है। बेमेतरा जिला पंचायत जहां राजनीतिक अखाड़ा का केन्द्र बन गया है। विकास की बात कम बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंतता ज्यादा देखने मिल रही है। जिला पंचायत में विकास की बात गौण होकर रह गई है। जिला मुख्यालय होने के नाते जिला पंचायत की बैठक में अधिकारी पहुंचते तो हैं। किन्तु राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का आलम यह है कि विकास की बात जिला पंचायत में कम हो रही है। केवल रुटीन के कार्य ही जिला पंचायत मे हो रहे हैं। जो रुटीन के कार्य हो रहे हैं उसमें सभी काम में रुचि कम बल्कि श्रेय लेने का होड़ ज्यादा दिखाई दे रही है। ऐसे में भला त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्देश्य कहां तक पूरा हो पा रहा है यह सवाल उठने लगा है। जिला पचांयत की बैठक में व्यक्गित अहमियत के चलते मे विकास की बाते गौण हो गई है।

    जनपद में भी यही हाल

    मामले में जिले के जनपद पंचायतों का जिला पंचायत के बाद बारी आती है। जिले के चार जनपद पंचायतों का जहां पर भले ही भाजपा समर्थित अध्यक्षों का कब्जा हो किन्तु जनपद पंचायतों की बैठक में ब्लाक स्तर के अधिकारियों की अनुपस्थिती चर्चा का विषय रहती है। किन्तु अधिकारियों की इस तरह लगातार बरती जा रही उदासीनता के चलते समुचित कार्यवाही नहीं हो पाने का ही परिणाम है कि जनपद पंचायत की बैठक में अधिकारी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी तरह से कर नहीं पा रहे हैं। हांलाकि इन सब के चलते जनपद पचांयत की बैठक में सदस्यों को बकायदा उग्र होते भी देखा गया। बेमेतरा जनपद पंचायत में तो बकायदा अधिकारियों की उदासीनता के चलते उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। किन्तु इन सब के बाद भी अधिकारियों का रवैया जनपद पंचायत के बैठको में सककरात्मक नहीं हो पा रहा है। इसके चलते वास्तव मे ग्रामीण अंचलो के विकास की बाते औपचारिकता बनकर रह गई है। इतना ही नही ग्रामीण अंचलो मे निर्वाचित जनप्रतिनिधी अपने अपने क्षेत्र में विकास की बातों पर एक तरह से खामोश भी बन जा रहे हैं जो कि उनकी मजबूरी हो गई है। इन हालातों के बाद जिस तरह से त्रिस्तरीय पचांयती राज का गठन सरकार के द्वारा ग्रामीण अंचलों के विकास के उददेश्य से रखा गया था उसे कहीं न कहीं अधिकारियों की उदासीनता एक सबसे बडी कमजोरी हो गई है।

    सिर पर पेयजल की समस्या

    हालांकि अब तक जैसे तैसे जनप्रतिनिधियों के द्वारा अपनी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया जा रहा था। किन्तु अब गर्मी सिर पर है। अंचल में पिछले दो वर्षों से जिस तरह के सूखे के हालात बने हुए हैं उसके चलते ग्रामीण अंचलो में पेयजल की समस्या एक प्रमुख समस्या अवश्य बन सकती है। कुछ जगहों पर तो अभी से हालात बनते ही जा रहे हैं। परन्तु जिला पंचायत अथवा जनपद पंचायत स्तर पर अब तक कोई भी ठोस कार्ययोजना नहीं बन पाई है।

    'इस तरह की शिकायत मिलने के बाद पूरी तरह से जनपद स्तर के सभी अधिकारियों को निर्देशित कर दिया गया है कि वे अनिवार्य रूप से जनपद की बैठक में अपनी उपस्थिति देवें।'

    -रीता शांडिल्य, कलेक्टर बेमेतरा

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