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    आखेट नवरात्र फाल्गुन मड़ई आज से शुरू

    Published: Fri, 07 Mar 2014 06:47 PM (IST) | Updated: Fri, 07 Mar 2014 06:47 PM (IST)
    By: Editorial Team
    07dntmela 07 03 2014

    दंतेवाड़ा। मां दंतेश्वरी का आखेट नवरात्र फाल्गुन मेला के नाम से आज से शुरू हो रहा है। ग्यारह दिनों तक चलने वाले इस मेले में दुर्गा के नौ रूपों की पूजा बतौर नौ दिनों तक माईंजी की पालकी निकाली जाएगी। आमतौर पर चैत्र और शारदीय नवरात्र को आमजन देवी आराधना का पर्व मानते है, परन्तु बस्तर के आदिवासी अपनी आराध्या की पूजा फाल्गुन मेला के दौरान नौ रुपों में करते है। वहीं विभिन्न परंपरागत आखेट का मंचन भी किया जाता है, इसलिए इसे माईंजी का आखेट नवरात्र भी कहा जाता है। मेले में शामिल होने वाले चार सौ से अधिक ग्राम्य देवी-देवताओं की अगवानी शनिवार से प्रारंभ हो जाएगी।

    जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा के शंकनी-डंकनी नदियों के संगम स्थल पर विराजित मां दंतेश्वरी देवी का प्रसिद्घ ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्राचीन शक्तिपीठ इसी आदिशक्ति मां दंतेश्वरी की छत्रछाया में आयोजित होता है। दंतेवाड़ा को प्रसिद्घ फाल्गुन मड़ई बसंत ऋतु के आगमन पर सम्पूर्ण जनजीवन मड़ई के सम्मोहन में बंधकर इस संगम पर जमा हो जाते हैं।

    ऐसी मान्यता है कि शक्ति स्वरूपा मां सती के इस स्थान पर दांत गिरने के कारण इस देवी का नाम दंतेश्वरी एवं स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। निर्माण तेरहवीं शताब्दी में करवाया था। आदिवासी लोक संस्कृति, परंपराओं एवं मान्यताओं को जीवित रखने हेतु राजा पुरूषोत्तम देव ने फाल्गुन मड़ई की शुरूआत कराई।

    फाल्गुन मड़ई के नाम से विख्यात इस वासंतिक पर्व की औपचारिक शुरूआत बसंत पंचमी के दिन मंदिर में त्रिशुल स्तंभ गाड़कर एवं माईजी के छत्र पर आम बौर चढ़ाकर की जाती है। फाल्गुन मास के अंतिम दस दिनों में आयोजित होने वाला आदिवासी समाज की पारंपरिक देवभक्ति, आदिवासी संस्कृति, लोक नृत्यों का यह उत्सव अपने चरम पर होता है। मंदिर के सामने स्थित मेंडका डोबरा मैदान में मां दंतेश्वरी की कलश स्थापना के साथ इस उत्सव का शुभारंभ होता है। इसमें बस्तर संभाग के एवं उड़ीसा के नवरंगपुर जिले के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित कर सहभागी बनाया जाता है। इस वर्ष यह आयोजन फाल्गुन शुक्ल सप्तमी संवत 2070 तदनुसार 8 मार्च शनिवार से 18 मार्च तक निर्धारित किया गया है।

    प्रथम दिवस पर मड़ई स्थल पर कलश स्थापना की जाती है। तत्पश्चात दूसरे दिन ताड़फलंगा धुवानी विधान सम्पन्न किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि ताड़ वृक्ष के पत्तों को धोना। ताड़ के इन पत्तों को माता तरई में धोकर होलिका दहन के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इस बीच माईजी की पालकी प्रतिदिन शाम मंदिर से नारायण मंदिर के लिए निकाली जाती है। तत्पश्चात पुनः मंदिर वापस लाई जाती है। इसी बीच विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। तीसरे दिन खोर खुंदनी एवं चौथे दिन नाच मांडनी पर मांदर, नगाड़े की थाप पर मंदिर के सेवादार एवं अन्य लोग माई दंतेश्वरी के सम्मुख नृत्य करते हैं। आदिम संस्कृति के मेलमिलाप , हंसी ठिठोली एवं उल्लास का वातावरण पूरे उत्सव के दौरान अपने चरम पर रहती है।

    अगले चार दिनों तक लमहा मार,कोडरी मार, चीतलमार एवं गंवरमार के रूप में शिकार नृत्यों का आयोजन सम्पन्न होता है। इसमें गंवरमार मेले का मुख्य आकर्षण होता है। जो रातभर चलता है। इन आयोजनों को देखते एवं सम्मिलित होने हजारों की संख्या में ग्रामीण एकत्रित होते हैं। आदिवासियों में आखेट नृत्यों की परंपरा काफी प्राचीन है, जो कि उनमें परस्पर सहयोग के पारंपरिक आखेट जीवन को रेखांकित करती हैं। जीवन के प्रत्येक क्षण को कला में परिवर्तित कर लोक संस्कृति को जीवित रखने का यह प्रयास जन-जातियों की प्रमुख विशेषता है।

    आखेट नृत्यों के अलावा आंवरामार का भी आयोजन किया जाता है। उस दिन माईजी की पालकी पर आंवले का फल चढ़ाया जाता है। मड़ई देखने आए जन समूह एवं पुजारी , सेवादार, बारहलंकवार इत्यादि दो समूहों में विभक्त होकर एक दूसरे पर इसी आंवले से प्रहार करते हैं। ऐसी मान्यता है कि आंवरामार विधान के दौरान प्रसाद स्वरूप चढ़े इस फल की मार यदि किसी के शरीर पर पड़ती है तो वर्ष भर वो निरोगी रहता है। त्रयोदशी को ताड़फलंगी विधान द्वारा सुरक्षित ताड़ के पत्तों से होलिका दहन कार्यक्रम सम्पन्न किया जाता है। मड़ई के अंतिम चरण में रंग-भंग उत्सव मना कर सभी आंमत्रित देवी -देवताओं का पादुका पूजन किया जाता है। गंवरमार के दूसरे दिन मड़ई का उत्सव होता है इसमें पुजारी द्वारा दोनों हाथों में माई जी के छत्र को थामे हुए कुर्सी से बने पालकी में बिठाया जाता है, तथा सारे नगर का भ्रमण कराया जाता है।

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