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    शिक्षाकर्मियों को सरकार का तगड़ा झटका, अधिकांश मांगे खारिज

    Published: Sat, 18 Feb 2017 12:02 AM (IST) | Updated: Sat, 18 Feb 2017 12:02 AM (IST)
    By: Editorial Team

    जगदलपुर। ब्यूरो

    आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सरकार से लंबित मांगो पर लचीले रुख की उम्मींद लगाए बैठे प्रदेश के सबसे बड़े अशासकीय कर्मचारियों के संगठन शिक्षक पंचायत संवर्ग को शासन ने तगड़ा झटका दिया है। शिक्षाकर्मियों की दो तिहाई से अधिक मांगे शासन ने सिरे से खारिज कर दी हैं। संविलियन के बारे में सरकार का कहना है कि यह संभव ही नहीं है। शासन के रवैए से शिक्षाकर्मी है और अगले शैक्षणिक सत्र में बड़े आंदोलन की रूपरेखा पर भी शिक्षक पंचायत संवर्ग के कर्मचारी संगठनों ने अभी से विचार शुरू कर दिया है। पिछले 19 सालों से सरकारी शिक्षक बनाए जाने की बाट जोह रहे शिक्षाकर्मियों को अपनी छोटी-छोटी मांगो को भी पूरा कराने के लिए हड़ताल का सहारा लेना पड़ रहा है और एक बार फिर हड़ताल के जरिए मांगो को लेकर शासन पर दबाव बनाने की स्थिति निर्मित हो रही है। दरअसल बजट सत्र से पहले 28 जनवरी 2017 को अपर मुख्य सचिव ग्रामीण एवं विकास विभाग तथा वित्त सहित शासन के कई विभागों के उच्चाधिकारियों ने शिक्षाकर्मियों के सभी संगठनों के प्रतिनिधियों को चर्चा के लिए बुलाया था। मंत्रालय में करीब एक दर्जन संगठनों के साथ अफसरों की बैठक में शिक्षाकर्मियों की ओर से दो दर्जन से अधिक मांगे रखी गई थी। शिक्षाकर्मी संगठनों के प्रतिनिधियों के अनुसार बैठक में अफसरों ने बहुत ही सकारात्मक रूख दिखाया था पर बैठक की कार्रवाई का जो विवरण और शासन की मांगो पर राय संबंधी पत्र जारी किया गया है उसमें दो दर्जन में से दो तिहाई मांगे सिरे से नकार दी गई हैं। कुछ मांगो पर शासन स्तर पर विचार किए जाने की बात कही गई हैं वहीं सबसे प्रमुख मांग समान कार्य समान वेतन और संविलियन की मांग को असंभव बता दिया गया है।

    क्या कहना है शासन का मांगों पर?

    शिक्षाकर्मियों की सबसे प्रमुख मांग शिक्षक के नियमित पदों पर शिक्षाकर्मियों का संविलियन करते हुए शासकीयकरण करने की मांग पर उप सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग याकूब खेस्स के हस्ताक्षर से जारी कार्यवाई विवरण में कहा गया है कि शिक्षक पंचायत संवर्ग के कर्मचारी जिला व जनपद पंचायतों के कर्मचारी हैं। संवैधानिक रूप से इन्हें शासकीय शिक्षकों के पद पर संविलियन किया जाना संभव नहीं है। शासकीय शिक्षकों के समतुल्य वेतन देनें की मांग पर कहा गया है कि आठ साल की सेवा पूरी करने पर शिक्षाकर्मियों के लिए समतुल्य वेतन का प्रावधान पहले से है। मूल वेतन के अलावा अन्य कोई भत्ता नहीं दिए जाने की बात पर शासन की ओर से कहा गया है कि इस बारे में शासन को अंतिम निर्णय लेना है। अभी कुछ करना संभव नहीं है। क्रमोन्नति देनें की मांग पर ग्रामीण एवं विकास विभाग ने सारी जिम्मेदारी वित्त विभाग पर डाल दी है। इसके अलावा अनुकंपा नियुक्ति, टीईटी की अनिवार्यता खत्म करने, स्थानांतरण आदि मांगो पर भी शिक्षाकर्मियों की मांगो को नकार दिया गया है। बाकी मांगो पर भी विभाग की ओर से कहा गया है कि कुछ मांगो पर वित्त और सामान्य विभाग द्वारा निर्णय लिया जाएगा।

    क्या कहते हैं शिक्षाकर्मी संगठनों के पदाधिकारी?

    पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की ओर से जारी कार्यवाई विवरण में ही शिक्षाकर्मियों की बहुतायत मांगे विशेषकर प्रमुख मांगो को खारिज कर देनें से शिक्षक पंचायत संवर्ग के कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारी नाराज हैं। नईदुनिया से चर्चा में छग नगरीय निकाय एवं पंचायत शिक्षक संघ के प्रांतीय महामंत्री प्रवीण श्रीवास्तव ने कहा कि बैठक में शासन के प्रतिनिधि अफसरों की ओर से दो-चार मांगो को छोड़ अन्य सभी मांगो पर सकारात्मक रूख दिखाया गया था। बैठक में जैसा उत्साहजनक माहौल अफसरों ने बनाया था कार्यवाई विवरण जारी होनें के बाद माहौल उतना ही नकारात्मक बन गया है। प्रवीण श्रीवास्तव ने कहा कि अफसोस इस बात का है कि शिक्षाकर्मियों की मांगो पर जनप्रतिनिधि और अफसरों के जवाब एक जैसे नहीं रह रहे हैं। संयुक्त शिक्षाकर्मी संघ के जिला अध्यक्ष शैलेन्द्र तिवारी ने कहा कि कार्यवाई विवरण के सामने आने के बाद साबित हो गया है कि शिक्षाकर्मियों की मांगो को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है। नियम-कायदे शासन बनाती है और शासन ही शिक्षाकर्मियों की मांगों का मामला सामने आने पर हाथ खड़े कर दे तो निराशा होना स्वाभाविक है। तिवारी ने कहा कि शिक्षाकर्मियों की इमेज वैसे भी हड़ताली कर्मचारी की बना दी गई है इसलिए कोई कुछ भी तमगा दे फर्क नहीं पड़ता। यदि हड़ताल के बाद ही मांगो पर निर्णय अनुकूल निर्णय लेने की परंपरा बन चुकी है तो हड़ताल के विकल्प पर विचार करेंगे।

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