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    बस्तर दहशरा में हुई नारफोड़नी की रस्म अदा

    Published: Wed, 13 Sep 2017 11:16 PM (IST) | Updated: Wed, 13 Sep 2017 11:16 PM (IST)
    By: Editorial Team

    जगदलपुर। विश्व प्रसिद्घ बस्तर दशहरा पर्व में बुधवार को सिरासार चौक में विधि-विधानपूर्वक नारफोड़नी रस्म पूरी की गई। इसके तहत कारीगरों के प्रमुख बेड़ाउमरगांव निवासी दलपत की मौजूदगी में पूजा अर्चना की गई। इस मौके पर मोगरी मछली,अंडा व लाइ-चना अर्पित किया गया। साथ ही औजारो की पूजा की गई। पूजा विधान के बाद रथ के एक्सल के लिए छेद किए जाने का काम शुरू किया गया।

    सुबह साढ़े दस बजे रथ निर्माण में लगे कारीगरों द्वारा सिरासार चौक के सामने बारसी, छैनी आदि की पूजा अर्चना की गई। इसके बाद मोंगरी मछली, अंडा व लाइ चना अर्पित कर नारफोड़नी रस्म पूरी की गई। विदित हो कि रथ के मध्य एक्सल के लिए किए जाने वाले छेद को नारफोड़नी रस्म कहा जाता है। गौरतलब है कि 75 दिनों तक चलने वाला यह लोकोत्सव 23 जुलाई को पाटजात्रा विधान के साथ शुरू हुआ था। इसके बाद डेरीगढ़ाई व बारसी उतारनी की रस्म पूूरी की गई। 20 सितम्बर को काछनगादी विधान, 21 को कलश स्थापना व जोगी बिठाई रस्म, 22 को रथ परीक्रमा पूजा विधान, 28 को महाअष्टमी पूजा विधान, 29 को कुंवारी पूजा विधान, 30 को भीतर रैनी विधान, एक अक्टूबर को कुमडाकोट पूजा विधान, दो अक्टूबर को काछनजात्रा पूजा विधान तथा तीन अक्टूबर को विदाई पूजा के साथ महा उत्सव का समापन होगा। नारफोड़नी विधान के दौरान विधायक बस्तर लखेश्वर बघेल, तहसीलदार डीडी मंडावी, नायब तहसीलदार आरपी बघेल समेत काफी संख्या में श्रद्घालु मौजूद थे।

    सामाजिक समरसता का अनूठा मिसाल

    बस्तर दशहरा का रस्म-रिवाज सामाजिक समरसता एवं लोकसहकर्मिता का अनूठा मिसाल पेश करता है। समाज में व्याप्त छुआछूत व तमाम रूढ़ियों को खत्म करते हुए सभी जातियों व समुदायों का इस महापर्व में प्रमुख योगदान रहता है। जैसे जंगल से लकड़ी लाना व रथ निर्माण के लिए बकावंड जनपद के संवरा लोगों की जवाबदेही तय है। इसी प्रकार रथ खींचने के लिए रस्सी बनाने का जिम्मा करंजी, सोनाबाल व केशरपाल गांवों के लोगों को सौंपा गया है। बलि के लिए लाए गए बकरों के देखभाल की जिम्मेदारी घाटलोहंगा क्षेत्र के मिलकू परिवार की है। लोहंडीगुड़ा जनपद के गढ़िया गांव के लोगों को रथ पर सीढ़ी लगाने का काम सौंपा गया है। आठ पहियों वाले रैनी रथ को खींचने का काम किलेपाल के माड़िया समाज के लोग करते आ रहे हैं।

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