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    बस्तर में आंगादेव को सुंदर दिखाने लगाते हैं पुराने सिक्के

    Published: Mon, 17 Apr 2017 12:16 AM (IST) | Updated: Tue, 18 Apr 2017 10:16 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    हेमंत कश्यप, जगदलपुर। बस्तर में आंगादेव को खुश करने की अजीब परंपरा है। ग्रामीण कटहल की लकड़ी से निर्मित इस देव में ब्रिटिश कालीन चांदी के सिक्के जड़ते हैं। इस परंपरा के चलते बस्तर के आंगादेव पुराने सिक्कों का चलता फिरता संग्रहालय और इतिहास बन गया है।

    क्या है परंपरा

    जैसे भगवान शिव का प्रतिरूप शिवलिंग को माना जाता है, वैसे ही बस्तर में स्थानीय देवी- देवता के प्रतिरूप को आंगादेव, पाटदेव आदि कहा जाता है। ग्रामीण आमतौर पर इसका निर्माण कटहल की लकड़ी से करते हैं और इसे चांदी से तैयार विभिन्न आकृतियों से सजाते हैं। पुराने सिक्कों को भी इसमें टांक कर इसे सुन्दर दिखाने का प्रयास किया जाता है। इन्हे कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखा जाता। इनके रखने का विशेष स्थान और चौकी होती है।

    ग्रामीण मान्यता

    ग्रामीणों में आंगादेव और पाटदेव को जागृत मानते हैं और इन्हे हर संभव खुश रखने का प्रयास करते हैं। किसी गांव या किसी के घर में आपत्ति आने पर बाकायदा इन्हे आमंत्रित किया जाता है। चार सेवादार इन्हे कंधों पर रख नियत स्थान तक पहुंचाते हैं। आंगादेव का मुख्य पुजारी जो भी निर्णय लेता है या फैसला सुनाता है, वह सर्वमान्य होता है।

    मनौती पर सिक्का भेंट

    गिरोला स्थित मां हिंगलाज मंदिर के पुजारी लोकनाथ बघेल बताते हैं कि देवी - देवताओं को सोने- चांदी के आभूषण भेंट करने की पुरानी परंपरा है। अब वनांचल में रहने वाले ग्रामीण इतने सक्षम नहीं रहे कि वे सोने-चांदी की श्रृंगार सामग्री भेंट कर सकें, इसलिए वे अपने घरों वर्षों से सहेज कर रखे चांदी के पुराने सिक्कों को मनौती पूर्ण होने पर अर्पित करते हैं। देव को अर्पित ऐसे सिक्कों को देवों में जड़ दिया जाता हैं, चूंकि ऐसा करने से चोरी की संभावना भी नहीं रहती।

    सिक्कों में इतिहास

    आंगा व पाटदेव में जड़े चांदी के सिक्के ब्रिटिश कालीन और कम से कम 75 साल पुराने हैं। इनमें इग्लैण्ड के तत्कालीन सम्राट एडवर्ड पंचम और साम्राज्ञी विक्टोरिया की आकृतियां हैं। बताया गया कि इन सिक्कों को तत्कालीन राजा के सत्तासीन होने पर ब्रिटिश एम्पायर जारी करता था। एक रूपए मूल्य के सिक्के पूरी तरह एक तोला चांदी के हैं। वर्तमान में बाजार में ऐसे एक सिक्के की कीमत एक हजार रूपए से अधिक है।

    शोध का भी विषय

    आदिवासी समाज के वरिष्ठ व अधिवक्ता अर्जून नाग बताते हैं कि बस्तर के आंगादेव और पाटदेव पुराने सिक्कों का चलता फिरता संग्रहालय भी है। इनमें वर्ष 1818 के तांबे के सिक्के से लेकर 1940-42 में चांदी के सिक्के भी जड़े हैं। कोई शरारती तत्व पुराने व चांदी के इन सिक्कों को चुरा न पाए इसलिए इन्हे कील के साथ टांक दिया गया है। यह शोध का भी विषय है।

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