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    आंखों की रोशनी क्या गई, इलाज में सबकुछ के साथ नाम भी छिन गया

    Published: Tue, 20 May 2014 10:16 PM (IST) | Updated: Tue, 20 May 2014 10:16 PM (IST)
    By: Editorial Team
    20ry01 20 05 2014

    सुजीत सरकार, पखांजूर

    अंचल के बेलगांव पंचायत अंतर्गत आने वाले ग्राम बल्लीगढ़ निवासी दुखूराम सलाम को भला यह कहां मालूम था कि उसकी जिंदगी का सोलहवां साल उस पर कहर बनकर बरपेगा। जिन आंखों में जिंदगी के खूबसूरत सपने वह बुन रहा है, उनमें हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरा छा जाएगा। 16 साल की उम्र में आंखों में अचानक उठे तेज दर्द ने उसके आंखों की रोशनी छीन ली। संपन्न परिवार का होने के बावजूद आंखों के इलाज में उसका सबकुछ बिक गया। आज वह अपने परिवार के साथ दाने-दाने को मोहताज है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जन्म के समय रखा गया उसका नाम सुखुराम भी हालात बदलने के साथ-साथ धीरे-धीरे खोता चला गया। आज उसे लोग दुखूराम के नाम से ही पहचानते हैं। छोटी-मोटी मजदूरी व शासन से मिलने वाले 200 रुपए पेंशन से ही वह किसी तरह गुजारा करता है।

    दुखूराम सलाम (45 वर्ष) का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। उसके जन्म पर परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। उत्साह से भरे माता-पिता ने उसका नाम सुखूराम रख दिया। सभी की तरह जैसे-जैसे सुखूराम बड़ा होने लगा, उसकी आंखों में भी जिंदगी के खूबसूरत सपने सजने लगे। लगभग 16 साल की उम्र में वह हमेशा की तरह ही जंगल में बांस काटने गया था, इसी दौरान अचानक उसकी आंखों में जोर का दर्द होने लगा। और देखते ही देखते उसकी आंखों की रोशनी चली गई। घर के लोगों ने उसका काफी इलाज कराया, लेकिन कुछ न हुआ। घरवालों ने यह सोचकर की उसे सहारे की जरूरत हमेशा होगी, किसी तरह उसकी शादी करा दी।

    आंखों के इलाज में बिक गया सबकुछ

    दृष्टिहीन होने से पूर्व दुखूराम के पास जमीन, घर, गाय, बैल, बकरी, मुर्गे आदि अच्छी-खासी संपत्ति थी। आंखों के इलाज में एक-एक कर उसकी सारी संपत्ति खत्म हो गई। दुखूराम के पास आज एक टूटी-फूटी झोपड़ी के सिवाय कुछ नहीं है। इसी में वह किसी तरह अभावभरी जिंदगी बिता रहा है।

    भीख मांगकर गुजारा करने को मजबूर

    दुखूराम के परिवार में उसकी पत्नी डॉली सलाम के अलावा तीन बच्चे भी हैं। उनके जीवनयापन की संपूर्ण जिम्मेदारी दुखूराम पर ही है। आंखें नहीं होने से दुखूराम बच्चों के सहारे इधर-उधर जा-जाकर भीख मांगने को मजबूर है। कभी तिरस्कार तो कभी लोगों की मदद से किसी तरह उसके जीवन का पहिया चल रहा है।

    शासन से नहीं मिली कोई मदद

    शासन द्वारा मदद के नाम पर दुखूराम को केवल एक राशन कार्ड और 200 रुपए प्रतिमाह का पेंशन ही मिलती है। दुखूराम का घर कभी भी धराशाही होने के कगार पर है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा अब तक उसे कोई सार्थक मदद नहीं की गयी है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी उसके हालात पर तरस नहीं आता।

    कई बार लगा चुका है शासन से गुहार

    दुखूराम द्वारा कई मर्तबा शासन से मदद की गुहार भी लगाई जा चुकी है, लेकिन अब तक उसे किसी प्रकार की कोई मदद नहीं मिल पाई है। दुखूराम द्वारा क्षेत्र के कई अधिकारियों के पास कई दफे फरियाद भी की जा चुकी है, लेकिन उसके दुख को कम करने में किसी ने भी रुचि नहीं ली।

    शिक्षा से वंचित हैं बच्चे

    दुखूराम के तीन बच्चों में दो की उम्र स्कूल जाने की है, लेकिन आर्थिक दिक्कतों के चलते वह उन्हें स्कूल नहीं भेज पाता। कहीं भी आने-जाने के लिए बच्चे ही उसका सहारा होते हैं। यह भी बच्चों के लिए एक बंधन होता है। जिन बच्चों का पेट पालन दुखूराम के लिए मुश्किल हो रहा है, उन्हें स्कूल भेजने के लिए वह चाहकर भी नहीं सोच सकता। इस ओर उसे किसी प्रकार की मदद भी नहीं मिल रही है।

    उसके वास्तवित नाम ने भी छोड़ा साथ

    जन्म के समय उसका नाम सुखूराम सलाम रखा गया था। हालात क्या बदले, वक्त के साथ-साथ नाम भी बदल गया। तंगहाल जिंदगी के चलते लोग उसे दुखूराम कहकर पुकारने लगे। आज यही नाम उसकी पहचान है। समाज के लोगों ने दुखों के भंवर में फंसे सुखूराम को दुखूराम बना दिया।

    जिम्मेदारियों का है पूरा अहसास

    आंखों की रोशनी तो चली गयी पर दुखूराम के हौसले आज भी बुलंद हैं। उसे अपनी जिम्मेदारियों का पूरा अहसास है। इसीलिए वह तेंदूपत्ता संग्रहण, मिट्टी खुदाई जैसे कार्य के साथ ही कई घरेलू काम करके किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। इसके बाद भी जब पूर्ति नहीं हो पाती, तो भीख मांगने को मजबूर हो जाता है।

    शासन से है मदद की आस

    दुखूराम को अब भी शासन से ही मदद की आस है। वह भी अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहता है। उसे उम्मीद है कि शासन इस ओर उसकी मदद जरूर करेगा। उसके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की पूरी व्यवस्था करने के साथ ही उसकी जिंदगी के संघर्ष को भी थोड़ा कम करने का प्रयास करेगा।

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