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    सफल वैवाहिक जीवन का राज, 'एक बोले तो दूसरा चुप रहे'

    Published: Mon, 17 Jul 2017 09:12 AM (IST) | Updated: Tue, 18 Jul 2017 09:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    रायपुर। एक दौर था, जब घर के बड़े-बुजुर्ग अपने विवाह योग्य बेटे-बेटियों का रिश्ता तय कर देते थे और बाद में अपने बच्चों को बताते थे कि तुम्हारा रिश्ता अमुक जगह पक्का कर दिया गया है। पति-पत्नी शादी के बाद ही एक-दूसरे का चेहरा देख पाते थे।

    घर-परिवार में ऐसा संस्कार था कि चाहे जितना मनमुटाव हो जाए, मगर घर के सदस्य एक-दूसरे के साथ ही रहते थे। जिसके साथ शादी हो गई, फिर मरते दम तक रिश्ता टूटता नहीं था।

    जीवनभर रिश्ता इसलिए कायम रहता था कि पति-पत्नी में से एक बोले तो दूसरा चुप रहता था। गुस्सा आने के कुछ ही देर बाद शांत हो जाता था।

    हमारी शादी को 50 बरस से ज्यादा हो गए, लेकिन आज भी पति-पत्नी एक-दूजे का कहना मानते हैं और मायके व ससुराल वालों को पूरा मान-सम्मान देते हैं। आज के युवा यदि वैवाहिक जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो उन्हें भी चुप रहना और मान-सम्मान देने का गुर सीखना होगा।

    संयुक्त परिवार की महत्ता पर जोर

    यह कहना है कि उन बुजुर्गों का जिनके विवाह को 50 बरस से ज्यादा का समय बीत गया और वे संस्कारों के चलते आज के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं। ऐसे ही लगभग 25 बुजुर्गों का सम्मान 'छत्तीसगढ़ प्रांतीय अखंड ब्राह्मण समाज" ने संगठन के पहले स्थापना दिवस के मौके पर किया।

    संयुक्त परिवार से मिलती है रिश्तों को मजबूती

    शादी के 50 बरस पूरे कर चुके दंपत्ति समता कॉलोनी निवासी गोपाल प्रसाद शर्मा एवं शकुंतला शर्मा बताते हैं कि जब कभी हमारे बीच किसी बात को लेकर लड़ाई होती थी तो जब एक बोलता था तो दूसरा चुप रहता था। इससे वाद विवाद नहीं होता था।

    हम संयुक्त परिवार के साथ रहते थे। मन में डर भी होता था कि परिवार के दूसरे सदस्य क्या सोचेंगे। संयुक्त परिवार में रहने का फायदा यह था कि सभी एक-दूसरे का सहयोग करते हुए परिवार को मजबूत करने में लगे रहते थे।

    एक-दूसरे का आदर करना चाहिए

    आजाद चौक निवासी शत्रुघन प्रसाद शर्मा एवं भारती शर्मा बताते हैं कि वे दोनों ही जिद्दी थे। अपनी बात मनवाना चाहते थे, लेकिन हमारी एक बात अच्छी थी कि हम एक-दूसरे के माता-पिता का आदर करते थे। एक-दूजे की बात सुनते थे, इसलिए जीवन मजे से बीता।

    चारों बच्चों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा होने में पूरा सहयोग किया। खुशहाल जीवन का एक ही सूत्र है कि अभाव चाहे जितना हो एक-दूसरे के रिश्तेदारों को आदर दें। कभी झगड़े की नौबत नहीं आएगी।

    शांत स्वभाव से मिली क्रोध पर विजय

    मूलत: बाराडेरा बेमेतरा के मोतीलाल तिवारी एवं रामबाई तिवारी की शादी को आधी शताब्दी गुजर गई। वे बताती हैं कि पति को थोड़ी-थोड़ी बात पर गुस्सा आ जाता था, लेकिन मैं शांत स्वभाव की थी। जब कभी पति गुस्सा करते मैं चुपचाप सुनती रहती, थोड़ी देर तक चिल्लाने के बाद वे शांत हो जाते। चूंकि पहले के जमाने में मनोरंजन के साधन सीमित थे और खर्चा भी ज्यादा नहीं था। संयुक्त परिवार में सभी हिलमिलकर रहते थे।

    वर्तमान पीढ़ी को सीख देना ही उद्देश्य

    प्रांतीय अखंड ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष पं.योगेश तिवारी बताते हैं कि संस्था का उद्देश्य वर्तमान पीढ़ी के बच्चों को संस्कारों व संयुक्त परिवार में रहने के प्रति जागृत करना है।

    कई समाज में युवक-युवतियां अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी कर रहे हैं और संयुक्त परिवार के साथ ना रहने तथा संस्कारों से दूर रहने के कारण रिश्तों में खटास आ रही है। हमारा उद्देश्य है कि नई पीढ़ी अपने भारतीय संस्कारों को न भूले। संस्कार से ही परिवार में खुशहाली आएगी।

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