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    सत्य ही शिव और सत्य ही मां दुर्गा है

    Published: Mon, 14 Aug 2017 04:02 AM (IST) | Updated: Mon, 14 Aug 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team

    कोरबा। नईदुनिया न्यूज

    श्रीमद भागवत सप्ताह कथा के द्वितीय दिवस कथा का विस्तार से व्याख्यान देते हुए आचार्य गौरव कृष्ण महाराज ने बताया कि श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने मात्र से व्यक्ति की भगवान से तन्मयता हो जाती है।

    बुधवारी के घंटाघर ऑडिटोरियम में श्रीमद भागवत सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस आचार्य गौरव कृष्ण महाराज के श्रीमुख से कथा का रसपान कराया गया। आचार्य गौरव कृष्ण ने कहा कि धर्म जगत में जितने भी योग, यज्ञ, अनुष्ठान आदि किए जाते हैं। उन सबका एक ही लक्ष्य होता है कि हमारी भक्ति भगवान से लगी रहे। मैं प्रति क्षण प्रभु प्रेम में ही समाया रहूं। संसार के प्रत्येक गण में हमें मात्र अपने प्रभु का ही दर्शन हो। श्रीमद भागवत कथा श्रवण मात्र से भक्त के हृदय में ऐसी भावनाएं समाहित हो जाती है और मन वाणी और कर्म से प्रभु में लीन हो जाता है। आचार्य ने कहा कि श्रीमद भागवत के प्रारंभ में सत्य की वंदना की गई, क्योंकि सत्य व्यापक होता है। सत्य सर्वत्र होता है और सत्य की चाह सबको होती है। पिता अपने पुत्र से सत्य बोलने की अपेक्षा रखता है। भाई भाई से सत्य पर बने रहने की चेष्टा करता है। मित्र मित्र से सत्यता निभाने की कामना रखता है। यहां तक की चोरी करने वाले चोर भी आपस में सत्यता बरतने की अपेक्षा रखते हैं, इसलिए प्रारंभ में वेद व्यास ने सत्य की वंदना से मंगल चरण किया और भागवत कथा का विश्राम भी सत्य की वंदना से ही किया गया है। सत्यम परम धीमहि क्योंकि सत्य ही श्रीकृष्ण है। सत्य ही प्रभु श्रीराम है तथा सत्य ही शिव एवं सत्य ही मां दुर्गा है। कथा श्रवण करने वाला सत्य को अपनाता है। सत्य में ही रम जाता है। यानि सत्य रूप परमात्मा में उसे तन्मयता आ जाती है। मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ परम धर्म यही है। की जीवन में अपने ईष्ट के प्रति प्रगट भक्ति हो जाए। आचार्य ने कहा कि श्रीमद भागवत में निष्कपट धर्म का वर्णन किया गया है जो व्यक्ति निष्कपट हो निर्मल हो उसी व्यक्ति को ही कथा कहने एवं कथा श्रवण करने का अधिकार है। उन्होंने बताया कि श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने का संकल्प लेने मात्र से अनिरूद्ध के पितामह श्रीकृष्ण भक्त के हृदय में आकर के अवरूद्ध हो जाते हैं। कथाक्रम में आचार्य ने श्रीमद भागवत को वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल बताया और कहा कि अन्य फलों की अपेक्षा इस भागवत रूप फल में गुठली एवं छिलका ना होकर केवल रस ही रस भरा है। इस कथा का जीवन पर्यंत व्यक्ति को रसपान करना चाहिए।

    और जानें :  # satya hi shive hai
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