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    पत्नी का जल्‍दी-जल्‍दी मायके जाना तलाक का आधार: HC

    Published: Sun, 16 Oct 2016 09:06 AM (IST) | Updated: Sun, 16 Oct 2016 09:37 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    नई दिल्ली (अमित कसाना)। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा जल्दी- जल्दी मायके जाना, अधिक दिनों तक मायके में रहना परित्याग की श्रेणी में आता है और यह तलाक का ठोस आधार है।

    न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग व प्रतिभा रानी की खंडपीठ ने एक महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। पति की तलाक की मांग संबंधी याचिका पर निचली अदालत ने उसके हक में फैसला सुनाया था।

    अदालत ने कहा कि महिला हर माह मायके जाती थी और वहां करीब 15 से 20 दिनों तक रहती थी। वहीं, अप्रैल 2000 को अपने पिता की मौत के बाद वह एक साल तक मायके में रही।

    इतना ही नहीं दोनों का विवाद जब निचली अदालत में पहुंचा तो मार्च 2005 में वह विवाद खत्म कर दोबारा से पति के घर रहने के लिए पहुंची, लेकिन यह खुशी पल भर में ही खत्म हो गई। महिला चार दिन बाद ही अपने मायके लौट गई और तब से वहीं पर है।

    हाईकोर्ट ने पति की उन दलीलों को स्वीकार किया कि महिला ने 2005 में पति की दो बहनों पर दहेज प्रताड़ना के झूठे आरोप लगाते हुए हरियाणा में एफआइआर दर्ज कराई थी। इस मामले में 9 साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद हरियाणा व पंजाब हाई कोर्ट ने जनवरी 2014 में एफआईआर रद्द कर दी।

    इस दौरान पूरा परिवार मानसिक तनाव से गुजरा जो मानसिक क्रूरता में आता है। अदालत ने कहा कि मुकदमेबाजी में इतने साल बीतने के बाद अब दंपती के दोबारा साथ रहने की कोई उम्मीद नहीं है।

    यह था मामला

    मई 1998 में इनकी शादी हुई थी। 2010 में पति ने तलाक के लिए निचली अदालत में याचिका दायर की थी। आरोप था कि उसकी पत्नी जल्दी-जल्दी अपने मायके जाती है और लंबे समय तक वहां रहती है। यह उसके वैवाहिक अधिकारों के खिलाफ है। हिंदूू मैरिज एक्ट के सेक्शन 9 के तहत उसे तलाक दिलाया जाए।

    वहीं, महिला ने दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाया था। अगस्त 2016 को निचली अदालत ने महिला के खिलाफ परित्याग व मानसिक क्रूरता को आधार बनाते हुए तलाक का फैसला सुनाया था। इस फैसले को ही हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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