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    आलेख : नजर आने लगे हैं नोटबंदी के फायदे - संजय गुप्‍त

    Published: Mon, 13 Nov 2017 10:35 PM (IST) | Updated: Mon, 13 Nov 2017 10:37 PM (IST)
    By: Editorial Team
    cashless- india 13 11 2017

    पिछले वर्ष आठ नवंबर को जब एक हजार और पांच सौ रुपए के नोटों को चलन से बाहर करने का निर्णय लिया गया था तो देशभर में भूचाल-सा आ गया था। इस ऐतिहासिक फैसले से अफरातफरी का माहौल बना और आम जनता के साथ-साथ व्यापारी वर्ग को भी असुविधा की स्थिति का सामना करना पड़ा। यह सिलसिला लगभग तीन माह तक चला। नए नोट आने से जैसे-जैसे स्थिति सामान्य होती गई, वैसे-वैसे लोगों को यह एहसास होने लगा कि इस बड़े और दूरगामी असर वाले फैसले से सरकार ने दो नंबर की अर्थव्यवस्था को तगड़ा आघात पहुंचाया है। इसके साथ-साथ आम जनता को एक राजनीतिक संदेश यह भी गया कि इस कदम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कालेधन वालों की कमर तोड़ दी है।

    सरकार को इस फैसले का राजनीतिक लाभ भी मिला। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने विरोधी दलों का लगभग सफाया कर दिया। यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि देश की कुल जनसंख्या के 0.00011 प्रतिशत लोगों ने कुल नकदी का 33 फीसदी पैसा जमा किया। इसका मतलब है कि एक बड़ी धनराशि मुट्ठी भर लोगों के ही पास थी। नोटबंदी के वक्त पांच सौ और एक हजार के नोटों की कुल कीमत करीब 15.30 लाख कराेड रुपए थी। करीब-करीब यह पूरी धनराशि बैंकों में जमा हो चुकी है। गत आठ नवंबर को मोदी सरकार और भाजपा ने जहां 'काला धन विरोधी दिवस मनाया, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व में तमाम विपक्षी दलों ने इस दिन को 'काला दिवस के रूप में याद किया।

    नोटबंदी के एक वर्ष पूरे होने पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बीच जुबानी जंग भी देखने को मिली। मनमोहन सिंह ने जहां नोटबंदी के कदम को एक बार फिर सुनियोजित लूट करार दिया, वहीं जेटली ने उन्हें संप्रग शासन की याद दिलाते हुए बताया कि सुनियोजित लूट क्या होती है। एक अर्थशास्त्री के रूप में मनमोहन सिंह से यही अपेक्षा की जाती है कि वह मौजूदा सरकार के किसी फैसले की तार्किक आलोचना करेंगे, लेकिन नोटबंदी के फैसले पर उनका विरोध गांधी परिवार को खुश करने की कवायद ही अधिक नजर आया। इसके कहीं कोई सबूत नहीं हैं कि नोटबंदी में भाजपा और मोदी सरकार ने कोई लूट-खसोट की। तथ्य यह है कि सरकार के पास आज यह पूरा विवरण मौजूद है कि नोटबंदी के दौरान जो पैसा जमा हुआ, वह किसका है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ सरकार के अन्य लोग बार-बार यह कह रहे हैं कि बैैंकों के पास मौजूद विवरण को खंगाल करके दो नंबर के पैसों की पहचान की जा रही है और इसके तहत करीब पौने दो लाख खाते चिह्नित भी किए जा चुके हैं। सरकार का मानना है कि इन खातों में जमा करीब 3.68 लाख करोड़ रुपये संदिग्ध हैं।


    पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान हिमाचल प्रदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि अब बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई की बारी है। प्रधानमंत्री के इस बयान का मकसद कांग्रेस के इस झूठ का प्रतिकार करना था कि मोदी सरकार काले धन पर अंकुश लगाने के प्रति गंभीर नहीं है। आम जनता कांग्रेस की आलोचना को शायद ही गंभीरता से ले, क्योंकि वह लगातार यह देख रही है कि काले धन पर अंकुश लगाने के मामले में सरकार ने जो कहा, उसे वह पूरा करने की दिशा में सतत सक्रिय है।


    नोटबंदी के उपरांत जो करोड़ों नए खाते खुले, उनमें एक बड़ी संख्या उनकी है जिन्हें पहले नकद वेतन मिलता था। अब इनका वेतन बैंक खातों में जा रहा है। इससे साफ है कि तमाम लोगों को नकद दिए जाने वाले वेतन में जो धांधली होती थी, वह अब नहीं हो सकेगी और उन्हें भविष्य निधि एवं बीमा आदि की सुविधाएं भी मिल सकेंगी। नोटबंदी को लेकर यह भी प्रचारित किया गया कि ये सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लिया गया निर्णय था और यहां तक कि इसके बारे में रिजर्व बैंक को भी कोई जानकारी नहीं थी। अब इस झूठ की भी पोल खुल गई है, क्योंकि इस फैसले से परिचित रहे रिजर्व बैंक के एक पूर्व अफसर ने बताया है कि नोटबंदी के लिए नौ माह से तैयारी चल रही थी। उनके अनुसार, नोटबंदी की तैयारी मार्च, 2016 से ही शुरू हो गई थी। नि:संदेह पहले से जानकारी होने के बावजूद रिजर्व बैंक चलन से बाहर किए जाने वाली मुद्रा के बराबर नए नोट नहीं छाप सकता था, क्योंकि इससे सरकार की योजना के सार्वजनिक होने का खतरा था। नोटबंदी सरीखा फैसला तभी कारगर हो सकता था, जब वह अप्रत्याशित होता। यह फैसला यकायक आया और इसी कारण जनता को परेशानी उठानी पड़ी।


    इस परेशानी के बावजूद नोटबंदी के दूरगामी नतीजे सामने आते दिख रहे हैं। कालेधन के संदिग्ध खाताधारकों की पहचान होना और डिजिटल लेन-देन करीब डेढ़ गुना हो जाना नोटबंदी के लाभ के सबसे बड़े उदाहरण हैं। नोटबंदी के कुछ महीनों बाद ही देश में टैक्स की एक समान प्रणाली के रूप में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लागू कर दिया गया। वैसे तो कांग्रेस ने इसे अपने शासन के समय लागू करने का मन बनाया था, पर वह संप्रग के कार्यकाल में इसे लागू नहीं कर पाई। जीएसटी की प्रणाली भी डिजिटल एकाउंटिंग पर आधारित है। स्वाभाविक है कि यह भी नकदी के लेन-देन में कमी लाएगी। नोटबंदी के पीछे सरकार का एक बड़ा मकसद देश में नकदी के चलन को कम करना भी था, क्योंकि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह अच्छा नहीं होता कि वहां ज्यादातर लेन-देन नकद में हो। यह शुभ संकेत है कि डिजिटल लेन-देन में वृद्धि के साथ ही नकदी पर आम लोगों की निर्भरता कम होती जा रही है।


    यह ठीक है कि जीएसटी को लेकर अभी भी परेशानियां आ रही हैं, लेकिन सरकार जिस तेजी के साथ उनका संज्ञान ले रही है, वह सराहनीय है। विपक्ष और विशेष रूप से कांग्रेस जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी का विरोध कर रही है, उससे कुल मिलाकर यही प्रकट हो रहा है कि उसके पास महत्वपूर्ण मुद्दों का अभाव है। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल यह समझ लें कि ऐसी राजनीति से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उन्हें पता होना चाहिए कि नोटबंदी के फैसले पर आम जनता अपनी मुहर लगा चुकी है। कांग्रेस गुजरात के चुनाव में भी नोटबंदी और जीएसटी का मुद्दा उठा रही है। उसे लगता है कि इन दोनों मामलों में जनता को उकसाकर वह चुनाव की दिशा अपने पक्ष में मोड़ सकेगी, लेकिन ऐसा शायद ही हो, क्योंकि तमाम सर्वेक्षण भाजपा को एक और जीत हासिल करते दिखा रहे हैं।


    इस सबके बावजूद सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि दो नंबर की अर्थव्यवस्था पर पूर्णत: लगाम नहीं लगी है। कालेधन पर एक हद तक ही नियंत्रण नजर आ रहा है। हालांकि जीएसटी भी किसी न किसी स्तर पर दो नंबर की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का काम करेगा, किंतु सरकार को यह देखना होगा कि कालेधन के बचे-खुचे कारोबार पर अंकुश कैसे लगे। इस पर ध्यान देने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि दो नंबर की कमाई बेनामी संपत्तियों व जेवरात के रूप में अभी भी अस्तित्व में है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि कालेधन वालों को नए सिरे से सिर उठाने का अवसर न मिले।

    (लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

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