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    आलेख : वाम के गढ़ में भाजपा की ललकार - कमलेंद्र कंवर

    Published: Tue, 10 Oct 2017 10:31 PM (IST) | Updated: Wed, 11 Oct 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    amit-shah jan raksha yatra1 10 10 2017

    इन दिनों भारतीय जनता पार्टी वामपंथियों के गढ़ केरल में घुसकर अपने पूरे दमखम के साथ उन्हें ललकार रही है। भाजपा संगठनात्मक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ऊर्जा प्राप्त करती है, जिसकी कि इस वक्त गुजरात से भी ज्यादा शाखाएं केरल में संचालित हैं। केरल में भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं की माकपा के कथित गुंडों द्वारा की जा रही हत्याओं के विरोध में भाजपा ने बीते हफ्ते अध्यक्ष अमित शाह की अगुआई में मुख्यमंत्री पी. विजयन के गृहनगर कन्न्ूर से अपनी 15 दिवसीय जन-रक्षा यात्रा का आगाज किया था। अगले दिन इस यात्रा में शिरकत करने पहुंचे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी माकपा के खिलाफ खूब आग उगली। न सिर्फ केरल, बल्कि दिल्ली में भी भाजपा ने माकपा के खिलाफ रैली निकाली। इससे पता चलता है कि भाजपा-माकपा का द्वंद्व पूरे उफान पर है।


    भाजपा पूरा जोर लगा रही है, लेकिन हम यह भी देखें कि उसका राज्यसभा में बहुमत नहीं है और केरल में भी उसे पर्याप्त जन-समर्थन हासिल नहीं। लिहाजा लगता नहीं कि वह केरल मेंबढ़ती राजनीतिक हिंसा के नाम पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की सोचेगी। हालांकि राज्य के हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जहां अमित शाह ने माकपा और आतंकी संगठन आईएस के बीच एक तरह के नापाक गठजोड़ का इशारा किया, वहीं योगी आदित्यनाथ भी केरल पहुंच 'लव जिहाद का जिक्र छेड़ने से नहीं चूके। इस तरह की तमाम कवायदों का मंतव्य समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने का ही लगता है, लेकिन जिस तरह का तीव्र ध्रुवीकरण हमने पिछले चुनावों में उत्तर प्रदेश में देखा, वैसा होने की संभावना केरल में नजर नहीं आती।


    जहां तक माकपा की बात है तो यह पार्टी कोई दूध की धुली नहीं। पश्चिम बंगाल में तेजतर्रार ममता बनर्जी द्वारा खदेड़े जाने से पहले तीन दशक तक जब माकपा का राज था, उस दौरान इसके गुंडों ने वहां खूब उत्पात मचाया और लोग तो दबी जुबान में यह भी कहते थे कि वहां किस कदर चुनावों में धांधली होती थी।


    आज पश्चिम बंगाल में माकपा ध्वस्त हो चुकी है, लेकिन केरल में यह अब भी मजबूती के साथ खड़ी है, जिसने पिछले चुनावों में कांग्रेस को किनारे लगा दिया। पश्चिम बंगाल में जहां ममता बनर्जी ने अपने नाटकीय तौर-तरीकों के जरिए बंगालियों के वामपंथी शासन के प्रति असंतोष को भुनाया, वहीं भाजपा केरल और खासकर मुख्यमंत्री विजयन के गृहजिले कन्न्ूर में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या के नाम पर केरलवासियों की भावनाओं को उद्वेलित करने की कोशिश कर रही है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस वामपंथियों की गुंडागर्दी की सियासत के आगे दबी रही, जब तक कि तेजतर्रार ममता बनर्जी अपनी आंखों और बातों में एक तरह की आग लिए परिदृश्य पर नहीं उभरीं। वहीं केरल में भाजपा और संघ चीजों को इतनी आसानी से नहीं निकलने देना चाहते। इस वजह से वहां खुला टकराव चल रहा है।


    भाजपा का 140 सदस्यीय केरल विधानसभा में सिर्फ एक सीट पर कब्जा है, और उसका खाता भी वहां मई 2016 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में ही खुला था, लेकिन वोट शेयर के हिसाब से देखें तो लगता है कि उसका जनाधार वहां बढ़ रहा है। हालांकि उसे वहां अभी लंबा सफर तय करना है, लेकिन वह लगातार ईंट-दर-ईंट और विवाद-दर-विवाद खुद को स्थापित करने में जुटी है।


    वहीं केंद्र में वाम दलों की हालत अभूतपूर्व रूप से लस्त-पस्त है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इसके 59 सांसद (लोकसभा स्पीकर को छोड़कर) हुआ करते थे, जिनमें माकपा सांसदों की संख्या 43 थी। लेकिन अब यह आंकड़ा सिमटते हुए 19 रह गया है, जिसमें माकपा के नौ सदस्य लोकसभा में और 8 राज्यसभा में हैं।


    जिस तरह माकपा के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात के बारे में माना गया था कि वे पार्टी के घटते प्रतिनिधित्व को थामने में नाकाम हैं और विभिन्न् मसलों पर पार्टी की राय भी दमदार तरीके से नहीं रख पाते, कुछ वैसी ही स्थिति मौजूदा महासचिव सीताराम येचुरी की भी है। येचुरी से उम्मीद की गई थी कि वे पार्टी को फिर से खड़ा करेंगे, लेकिन वे तो माकपा को कांग्रेस के और करीब ले गए, जबकि भाजपा के खिलाफ कहीं ज्यादा उग्र हैं, लेकिन इस तरह भी उन्हें पार्टी का पराभव रोकने में कोई मदद नहीं मिली है। बंगाल में रसातल में पहुंच चुकी माकपा सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के समक्ष कोई चुनौती पेश करने में नाकाम है। केरल में (जहां पर कांग्रेस व वाम दल विधानसभा चुनावों में बारी-बारी से जीत हासिल करते रहे हैं) भी माकपा-नीत सरकार के गठन का श्रेय सीताराम येचुरी को नहीं दिया जा सकता। इस पार्टी का बंगाल धड़ा अपनी केरल इकाई के प्रति एक तरह का दुराव रखता है।


    माकपा-शासित सिर्फ एक और राज्य त्रिपुरा है, जो कि एक छोटा-सा प्रांत है और वहां पर भी इसे उभरती भाजपा से तगड़ी चुनौती मिल रही है। पिछले दिनों वहां पर तृणमूल कांग्रेस के छह विधायक पाला बदलते हुए भाजपा में शामिल हो गए। यह ममता बनर्जी के लिए भी झटका था।


    वास्तव में आज वाम दल एक तरह के दोराहे पर खड़े हैं। इनका भविष्य कैसा होगा, यह इनकी नीतियों के क्रियान्वयन के अलावा इस पर भी निर्भर करेगा कि इनका नेतृत्व कितना प्रभावी रहता है। संयोग से पश्चिम बंगाल और केरल दोनों ही जगहों पर भाजपा इसकी स्थिति को चुनौती पेश करती लगती है। हालांकि पश्चिम बंगाल में 295 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा की सिर्फ तीन सीटें हैं, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जहां इसका वोट शेयर बढ़ रहा है, वहीं वामदलों और कांग्रेस का जनाधार घटा है। आरएसएसप्रमुख मोहन भागवत ने कुछ दिन पूर्व कहा था कि केरल (और बंगाल) सियासी बढ़त हासिल करने के लिए देश-विरोधी ताकतों को संरक्षण देते रहे हैं। उनकी इस टिप्पणी के बाद भाजपा और माकपा नेताओं के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई थी।

    केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने भागवत की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देने में तनिक भी देर नहीं लगाई और कहा कि हर केरलवाली इस चुनौती से जूझ रहा है और राष्ट्रविरोधी तत्वों को संरक्षण देने जैसी भाजपा व संघ नेताओं की टिप्पणियां दरअसल उनकी हताशा की उपज हैं, क्योंकि वे इस राज्य को सांप्रदायिक आधार पर बांटने में नाकाम हैं।


    बहरहाल, भाजपा केरल जैसे राज्य में तमाम अल्पसंख्यकों को अपने से दूर रखना गवारा नहीं कर सकती, जहां पर इनकी खासी आबादी हो। लिहाजा वह इस राज्य में ईसाइयों के एक वर्ग को लुभाने के जतन रही है। वह इस कोशिश में कितनी सफल होगी, इस बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ईसाई तबका अभी भी भाजपा और आरएसएस को संदेह की नजर से देखता है।


    बहरहाल, इस बात से तो कोई इनकार नहीं कर सकता कि अपने जीर्ण-शीर्ण सिद्धांतों के साथ एक पार्टी के तौर पर माकपा का पतन हो रहा है। पश्चिम बंगाल से यह बाहर हो चुकी है। केरल और त्रिपुरा में जहां इसकी सरकार है, वहां भी इसे भाजपा से चुनौतियां मिल रही हैं। इन राज्यों में माकपा के घटते जनाधार के साथ भाजपा तेजी से अपनी ताकत बढ़ा रही है।


    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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