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    आलेख : सुधार की बाट जोहती अदालतें - विराग गुप्‍ता

    Published: Fri, 14 Apr 2017 07:52 PM (IST) | Updated: Sat, 15 Apr 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team
    lawyers supreme court 14 04 2017

    पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या विवाद का विधिसम्मत समाधान निकालने के बजाय संबंधित पक्षों पर आम सहमति से निदान तलाशने का जिम्मा सौंप दिया। इसके उलट भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में अनियमितताओं के लिए दोषियों को दंडित तो नहीं किया, अलबत्ता क्रिकेट प्रशासन में सुधार का जिम्मा सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के हाथ में सौंप दिया। शायद यही कारण रहा कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व सांसदों की पेंशन पर सुनवाई करने की पहल की तो संसद में अनेक नेताओं ने अदालत की अति-न्यायिक सक्रियता को संविधान एवं संसदीय व्यवस्था का अतिक्रमण बताया। जब आयोग-न्यायाधिकरण में नियुक्ति और कानूनी सलाह के माध्यम से सेवानिवृत्त न्यायाधीश ऊंचे वेतन-भत्ते एवं सुविधाएं लेते हैं, तो फिर न्यायाधीशों की भारीभरकम पेंशन और दोहरे लाभ पर भी बहस क्यों नहीं होनी चाहिए? न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद एवं मुकदमों में अनावश्यक विलंब के आरोपों में वृद्धि के बावजूद आजादी के बाद से अभी तक एक भी जज की बर्खास्तगी नहीं हुई।


    अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट में न्यायिक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद अब हाईकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्नन ने 20 जजों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कराने की मांग की है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने तो अवमानना कार्रवाई की धमकी के बाद माफी मांग ली, मगर जस्टिस कर्नन अब भी अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं।


    कोलकाता हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्नन ने दलित कार्ड का सियासी दांव चलते हुए दिल्ली में खुद की स्वयंभू अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के जजों के खिलाफ आदेश पारित कर नया कानून लिख दिया। हैरतनाक ढंग से वे प्रधान न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के सात न्यायाधीशों को अपनी 'आवासीय अदालत में तलब करने की हद तक चले गए। जस्टिस कर्नन को नियुक्त करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन अब कहते हैं कि कर्नन की गलत नियुक्ति के लिए वह जवाबदेह नहीं हैं। इसके बाद क्या यह जरूरी नहीं हो गया कि कोलेजियम के वरिष्ठतम जज नियुक्ति के अधिकार के साथ भावी जजों की योग्यता, ईमानदारी और निष्पक्षता की लिखित जवाबदेही भी लें? नियुक्त होने वाले जजों को संविधान के अनुच्छेद 124(6) और अनुसूची-3 के तहत सत्ता के साथ अपने संबंधों के खुलासे का हलफनामा देना ही चाहिए जिससे सभी वर्गों के योग्य लोगों को जज बनने का अवसर मिल सके। गलत हलफनामा देने पर जजों को संसद में महाभियोग के बिना बर्खास्तगी का प्रावधान भी नए प्रक्रिया पत्र यानी एमओपी में होना चाहिए, जिससे कर्नन जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति न हो।


    सर्वोच्च न्यायालय ने अक्टूबर, 2015 में जजों को नियुक्त करने वाले कोलेजियम सिस्टम (सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठतम जजों की समिति) को विफल बताते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव को जरूरी बताया था। उसके बाद अनेक जज नियुक्त हो गए, परंतु नियुक्ति प्रक्रिया एमओपी में अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है। सरकार ने एमओपी में अनेक सुधार प्रस्तावित किए हैं, जिनके अनुसार जज और वकीलों की व्यापक समिति के माध्यम से सुझाए गए प्रत्याशियों की योग्यता की छानबीन के लिए स्थायी सचिवालय बनाया जाए, नियुक्ति के बाद जजों के विरुद्ध यदि कोई शिकायत आती है तो उसकी जांच के लिए एक समिति का गठन हो। सिविल सोसाइटी ने भी अनेक सुझाव दिए और वरिष्ठ जज चेलमेश्वर ने पारदर्शिता का मुद्दा उठाया जिन्हें कोलेजियम द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर ठुकराया जा रहा है।


    कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि ऐतिहासिक बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री परमाणु बटन दबाने का फैसला तो कर सकते हैं, किंतु उन्हें जजों की नियुक्ति का अधिकार नहीं है। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री निश्चित कार्यकाल के अलावा किसी भी बड़े पद के लिए स्थायी नियुक्ति नहीं कर सकते, जबकि जजों ने मनमाफिक नियुक्ति के असीमित अधिकार हासिल कर लिए हैं। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन और नीति आयोग द्वारा उच्च पदों में विशेषज्ञों की भर्ती के सुझाव को न्यायिक क्षेत्र में लागू करने से न्यायपालिका में तकनीक के इस्तेमाल और सुधारों में तेजी आ सकती है।


    अयोध्या विवाद के 25 साल पुराने मामले को जल्द निपटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत को दैनिक सुनवाई के आदेश का पालन होने के बावजूद ट्रायल खत्म होने में दो साल लगेंगे। सरकार और न्यायपालिका दोनों के द्वारा सुधार के बजाय जजों की नियुक्ति के अधिकार को हासिल करने की जंग की वजह से हमारी अदालतें 20वीं सदी में अटकी हैं, जहां लंबित मुकदमों के पहाड़ तले आम जनता पिस रही है। संसद में हाल ही में दी गई जानकारी के अनुसार 61 साल पुराने एक मुकदमे का अभी निपटारा होना बाकी है।


    मौजूदा प्रधान न्यायाधीश ने गर्मी की छुट्टियों में 5,300 मामलों की सुनवाई का अच्छा फैसला लिया है, लेकिन क्या इसी तर्ज पर अन्य अदालतों में भी लंबित 3 करोड़ मामलों को जल्दी निपटाने का राष्ट्रीय अभियान नहीं चलना चाहिए? सरकार और दूसरी संस्थाओं को सुधारने से पहले अदालतों को अपनी व्यवस्था सुधारनी चाहिए। सरकार और कोलेजियम में गतिरोध से विभिन्न् उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 40 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं, परंतु हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालतों में 23 प्रतिशत न्यायाधीशों के पद क्यों नहीं भरे जा रहे, जिन पर कोई गतिरोध नहीं है?


    सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने 1992 में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया था कि आम जनता को न्याय देने के लिए न्यायपालिका में सर्वोत्तम कदम उठाए जाने चाहिए। अति-न्यायिक सक्रियता के दौर के बाद अब हाईकोर्ट द्वारा लोकलुभावन आदेशों के नए दौर से न्याय की गाड़ी पटरी से उतर सकती है। मद्रास हाईकोर्ट ने किसानों की कर्ज माफी के लिए आदेश दिया तो उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नदी, जंगल, हवा, पहाड़ और ग्लेशियर को इंसानी अधिकार का फैसला दे दिया। अपना कानूनी हक नहीं मिलने से न्याय की चक्की में निरीह जनता बिना वजह पिस रही है। पंच-परमेश्वर जज किसी महिला को अनचाहे बच्चे को जन्म देने के लिए विवश करने के साथ अपराधी को मृत्युदंड देने का अधिकार रखते हैं, मगर शायद वे यह नहीं महसूस कर पा रहे हैं कि लोगों को कानून की लंबी व्याख्या के बजाय शीघ्र न्याय का हक चाहिए।


    (लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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