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    आलेख : पूर्वी एशिया में नए रिश्तों की बुनियाद - डॉ. रहीस सिंह

    Published: Tue, 14 Nov 2017 11:23 PM (IST) | Updated: Wed, 15 Nov 2017 04:05 AM (IST)
    By: Editorial Team
    modi in asean 14 11 2017

    हवाई से टोक्यो, सियोल और हनोई होते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मनीला पहुंचे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली से, तो वहां न केवल द्विपक्षीय रिश्तों की नई बुनियाद रखी गई, बल्कि बहुपक्षीय रणनीति के नए आयाम भी निर्मित होते दिखे। यहां पर एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक), आसियान और पूर्वी एशिया के देशों की बैठक के साथ-साथ भारत-अमेरिका, भारत-जापान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक चतुर्भुज देशों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के बीच हुई बैठकों में कुछ अहम विषय निकलकर सामने आए, जो वैश्विक संबंधों की पुनर्रचना का संकेत देते हैं। यद्यपि इन बैठकों में आर्थिक हित भी चर्चा का विषय रहे, लेकिन सही अर्थों में सामरिक विषय और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भावी रणनीतिक तैयारियां ही इनके केंद्र में थीं। मनीला में इन वैश्विक नेताओं का मिलना न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री सहित जापान एवं ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों की चतुराइयों से भरपूर कूटनीतिक यात्रा का अहम पड़ाव भी था, जो चीन को रोकने या फिर नई वैश्विक कूटनीतिके विकल्प तैयार करने की कवायद कर रहे थे। खास बात यह रही कि यात्रा के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते ट्रंप का मुख्य फोकस भारत और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर खिसक गया, जबकि उनके प्रशांत महासागरीय दोस्त भारत के बाद दूसरे एवं तीसरे पायदान पर पहुंच गए। क्या ऐसा ट्रंप का भारत में बढ़ते विश्वास के कारण हुआ या फिर उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में भारत की उपयोगिता के कारण?


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप से मुलाकात के बाद कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते द्विपक्षीय संबंधों से आगे जा सकते हैं और दोनों देश एशिया के भविष्य के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। उन्होंने ट्रंप को आश्वस्त किया कि अमेरिका और दुनिया को भारत से जो भी अपेक्षाएं हैं, वह उन पर खरा उतरने की कोशिश करेगा। इसमें कोई संशय नहीं कि आज भारत ऐसी क्षमताएंं हासिल कर चुका है कि दुनिया की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके। लेकिन यहां पर अहम सवाल यह है कि अमेरिका की अपेक्षाएं क्या हैं? क्या ट्रंप से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे दुनिया या खासकर एशियाई क्षेत्र में शांति की कोई ठोस बुनियाद रखने हेतु योजना तैयार कर रहे हैं? या फिर अमेरिका प्रशांत महासागर में स्थापित रही अपनी सर्वोच्चता को बचाने की रणनीति बना रहा है, जिसे चीन लगातार नुकसान पहुंचा रहा है? चूंकि चीन भारत के लिए भी खतरा है, इसलिए भारत अमेरिका के साथ मिलकर चीन को घेरने के लिए भावी रणनीति तैयार कर सकता है और करना भी चाहिए। लेकिन बेहतर होगा कि भारत अकेले अमेरिका पर भरोसा करने और उसके साथ रणनीति बनाने के बजाय भारत-जापान-अमेरिका त्रिकोण अथवा भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया -अमेरिका चतुर्भुज को व्यावहारिक स्वरूप देने की रणनीति पर आगे बढ़े। अगर भारत अमेरिका के साथ एक निर्णायक साझेदारी करना चाहता है तो इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा कि डोनाल्ड ट्रंप की एशिया नीति है क्या? वे बराक ओबामा की 'एशिया धुरी नीति पर चलेंगे अथवा किसी अन्य वैकल्पिक नीति पर? अभी तक यह सुनिश्चित नहीं हो पाया है कि डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति 'एशिया धुरी पर आधारित होगी या 'मॉस्को धुरी पर अथवा 'बीजिंग धुरी पर? ध्यान रहे कि ट्रंप एक व्यवसायी रहे हैं, इसलिए वे व्यापारिक रिश्तों पर विशेष ध्यान देते हुए बीजिंग के करीब भी जा सकते हैं। ऐसे में उत्तर कोरिया की हिमाकतों से सशंकित दक्षिण कोरिया और जापान भले ही उन पर भरोसा कर लें, लेकिन वियतनाम व फिलीपींस सहित पूर्वी एशिया के देश उन पर भरोसा करेंगे, कहना कठिन है। ऐसे में क्या भारत के लिए ट्रंप पर आंख मूंदकरभरोसा करना उचित होगा?


    ध्यान रहे कि जापान के लिए रवाना होने से पहले ट्रंप पर्ल हार्बर गए थे, जहां उन्होंने यूएस एशिया पेसिफिक कमांड जाकर यूएसएस एरीजोना के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके पश्चात उनका एशियाई यात्रा पर रवाना होना तथा जापान पहुंचकर योकोता एयरबेस पर सैन्यकर्मियों को संबोधित करते हुए यह कहना कि किसी भी तानाशाह, सरकार या देश को अमेरिका को कम करके नहीं आंकना चाहिए, यह बताता है कि ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट की बजाए 'अमेरिका सर्वशक्तिमान का संदेश देना चाहते हैं। यहां पर ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वे उत्तर कोरिया को घेरने के लिए व्लादिमीर पुतिन से भी बात कर सकते हैं। अब यह समझने की जरूरत है कि ट्रंप ने अपनी पांच राष्ट्रों की यात्रा के दौरान दो उन राष्ट्रों में भी शिरकत की, जिनका चीन से दक्षिण चीन सागर को लेकर तीव्र विवाद है। इन दो में से एक, फिलीपींस के कारण तो चीन इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में मुंह की खा चुका है। शेष दो राष्ट्र जापान एवं दक्षिण कोरिया वे हैं, जिनका उत्तर कोरिया से सीधा टकराव है, लेकिन आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा चीन से भी है। चीन का उद्देश्य प्रशांत महासागर में अपनी शक्ति को स्थापित करना ही नहीं, बल्कि उसे बनाए रखना भी है और इसके लिए उसे उत्तर कोरिया की जरूरत है। इसलिए चीन कदापि यह नहीं चाहेगा कि अमेरिका उत्तर कोरिया के खिलाफ उसी तरह की कार्रवाई करे, जैसी उसने अफगानिस्तान में या इराक के खिलाफ की थी। अमेरिका को दक्षिण एशिया और ट्रांस पेसिफिक देशों को साधने के लिए भारत के सहयोग की जरूरत है। ऐसा संदेश पहले ही अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस और विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन दिल्ली आकर दे चुके हैं। यानी अमेरिका भारत को आगे करके अन्य सहयोगियों के जरिए अपना वर्चस्व कायम रखना चाह रहा है। जापान एवं दक्षिण कोरिया सुरक्षा चाहते हैं और अन्य एशियाई देश शांतिपूर्ण विकास। चीन ट्रांस-पेसिफिक में एकाधिकार चाहता है। ऐसे में तो यही लगता है कि एशिया-प्रशांत नए रणनीतिक गेम का क्षेत्र बनने जा रहा है।


    बहरहाल, उक्त स्थितियां बताती हैं कि भारत-अमेरिका गठजोड़ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है भारत-जापान और इससे भी महत्वपूर्ण है भारत-आसियान साझेदारी। संभवत: इसे देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस यात्रा के दौरान शिंजो आबे के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी सुदृढ़ करने की रणनीति को आगे बढ़ाया। इस मुलाकात से दो दिन पूर्व भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के अधिकारियों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और स्वतंत्र बनाए रखने के लिए भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका चतुर्भुज योजना को मूर्तरूप देने की दिशा में अहम कदम बढ़ाया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने आगामी गणतंत्र दिवस पर इसराइल के प्रधानमंत्री के साथ-साथ आसियान देशों के प्रमुखों को निमंत्रण देकर भारत की एशिया कूटनीति को केंद्र में लाने तथा एशिया के दो हिस्सों के बीच भारत को एक मजबूत सेतु बनाने की पहल की है। उम्मीद करें कि ये तमाम पहल आर्थिक और सामरिक लिहाज से न सिर्फ भारत, बल्कि एशिया के लिए भी लाभप्रद सिद्ध होंगी।


    (लेखक विदेशी मामलों के जानकार हैं)

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