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    आलेख : जादुई नेतृत्व संग जनसमर्थन का ज्वार - मृणाल पांडे

    Published: Thu, 16 Mar 2017 11:47 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Mar 2017 12:41 AM (IST)
    By: Editorial Team
    modi after up election victory 16 03 2017

    बीतती हुई पीढ़ी के पाले में बैठकर पत्रकार की निगाह से इतिहास को सिरे से बदलते हुए देखना एक अजीब अनुभव होता है, एकसाथ उत्तेजना, आल्हाद और अवसाद में गड्डमड्ड। गुजरे सत्तर बरसों में भारत में सरकारें बनाती रही जनता बदल चुकी है। और आजादी में होश संभालने वाली पीढ़ी की तादाद आज कुल आबादी की लगभग नब्बे फीसदी होगी। जो बुजुर्ग नेता राजनीति में अहम रोल निभा रहे हैं उन्होंने भी आजादी के बाद ही जन्म लिया है। अभिव्यक्ति की आजादी के सत्तर बरसों के प्रताप से पीढ़ियों के बीच अब नए तरह के अंतराल, वैचारिक खांचे, उम्मीदें, लक्ष्य और आदर्श बन रहे हैं। अब सरकार के लिए सफलता की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि आजादी के पहले की पीढ़ी के गढ़े संविधान और लोकतांत्रिक संस्थानों के साथ वह इस बहुरंगी, मुखर और आक्रामक आबादी के हित-स्वार्थों के बीच किस तरह समन्वय बिठाती है ताकि लोकतंत्र की एकता अखंड रखी जा सके।

    और उसका समय शुरू होता है अब !


    पचास साल पहले मान लिया गया था कि जैसै-जैसे भारत एक औद्योगिक सभ्यता बनेगा और नई वैज्ञानिक समझ व आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी, समरसता भी बढ़ेगी। क्योंकि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में सभी जाति, धर्म व इलाकाई जकड़बंदियां टूट जाएंगी और इससे उपजी सामाजिक क्रांति तमाम सूखे पत्तों को पूरी तरह झड़ा-बुहार देगी। किंतु पिछले दशकों में कांशीराम, जेपी और वीपी अपनी-अपनी तरह से बदलाव की आंधी लाए, पर भले ही कुछेक डालें धराशायी हुईं, पत्ते झड़े, लेकिन वैमनस्य और पूर्वग्रहों के सारे पुराने बीज और जड़ें पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाए। वे जमीन के भीतर बने मौसम बदलने का इंतजार करते रहे और स्थिति अनुकूल होते ही उनका पुन: प्रकटीकरण हो गया। कई वैचारिक पेड़ों ने, जिनकी कि मूल जड़ें सड़-गल चुकी थीं, किसी करिश्माती नेता के जहूरे से एक तरह की जड़ निरपेक्षता बना ली और हमारे अनदेखे अन्य स्रोत से जीवन रस पाते बाहरखाने हरे-भरे आकर्षक नजर आते रहे। ऐसे पेड़ आज धराशायी नजर आ रहे हैं तो दोष आंधी को नहीं दिया जा सकता।


    विजय से दीप्त मोदीजी का 12 मार्च के भाषण में विनम्रतापूर्वक सबको साथ लेकर चलने का प्रबल संकल्प समयानुकूल था। उसकी सराहना की जा सकती है। लेकिन उसके तुरंत बाद गोवा तथा मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी न होते हुए भी जिस उतावली से सदय राज्यपालों की मदद से पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश ही नहीं किया, नए मुख्यमंत्रियों की घोषणा भी कर दी और सरकार भी बना ली, वह किरकिराहट पैदा करता है। जिस पार्टी ने पांचों राज्यों के चुनाव बिना मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सामने रखे लड़े हों, उसका यह फटाफट फैसला समन्वय तथा पारदर्शी सुराज की नई घोषणाओं को मलिन बनाता है। भाजपा की कुल जीत इतनी बड़ी है कि मणिपुर और गोवा सरीखे छोटे राज्यों के नतीजों पर अश्वत्थामा हत: कहने का पाप नाहक लिया गया। इससे मोदीजी का धर्मरथ भी कुछ अंगुल नीचे आ जाता है।


    यह कहना इसलिए जरूरी है कि स्वयं प्रधानमंत्री खतरों के खिलाड़ी हैं। और उन्होंने किसी अन्य समवर्ती नेता से आगे बढ़कर दो महत्वपूर्ण बातें पकड़ी हैं : एक, कि भीतरखाने यह देश अपने अस्तित्व की अखंडता के बारे में बेहद चिंतित है। दो, कि नेता को भारत की जनता से सीधा संवाद स्थापित कर मेहनतकशी, स्वच्छता-सफाई व अनुशासनपरकता जैसे दैनिक जीवन और सामान्य ज्ञान की भीषण कमी को सायास हटाना चाहिए। एक समय था जबकि युद्ध जीतना, हारना, चढ़ाई करना, राज्य विस्तार का काम शासकों व उनकी (फौरी तौर से जुटाई) सेना के ही जिम्मे होता था। प्रजा युद्धकाल में भी यथासंभव अपने पुश्तैनी धंधे ही निबटाती रहती थी। बहुत बात बढ़ी तो कुछ दिन को गांववाले जाकर जंगल में छिप जाते थे और लूटपाट खत्म हुई तो फिर वापस आकर अपने-अपने काम संभाल लेते। किंतु आजादी के सात दशकों में बहुत कुछ बदल चुका है। वैश्वीकृत बाजारों तथा तकनीकी तरक्की व हरित श्वेत क्रांतियों, ग्लोबल मौसम तब्दीली ने देश में काम-धंधों का रूप बदलकर उनमें राज्य का सतत हस्तक्षेप सहज बना दिया है। सो, गरीब किसान या बुनकर के लिए भी पुरानी राज्य निरपेक्षता धारे रखना असंभव है। उसकी राज्य से जुड़ी निजहित स्वार्थों की चिंता को पहचानकर ही मोदीजी ने बड़ी चतुराई से उनको अच्छे दिना का सपना बेचा है। उनके लिए आने वाले समय की कठिनतम शासकीय चुनौती यहीं से उपजती है।


    जिन अनुभवी आंखों ने अभी अपना अनुपात बोध नहीं खोया है, वे देख सकती हैं कि मोदीजी के भाषण में जो बातें साफ तौर से कही गईं, उतनी ही महत्वपूर्ण वे थीं जिनकी तरफ इशारा किया गया। क्योंकि वे जिन सवालों को जगा रही थीं, वे सिर्फ संविधान के सवाल नहीं, भारत की एकता, वफादारी और सार्वजनिक शांति के विराट सवाल थे। राज्य एक वैध, आत्मीय और अंतरंग इकाई है, सुदूर, विदेशी या सिर्फ बड़े लोगों की मिल्कियत नहीं, इसकी तरफ प्रधानमंत्री ने अपने 12 मार्च के भाषण में बार-बार इंगित किया। इतनी बार दुहराए जाने के बाद उनका राज्य के व्यवहार तथा नीति-निष्पादन में सकारात्मक उदाहरण भी जमीन पर जल्द दिखने चाहिए। यह नहीं कि शीर्ष से तो समरसता की बात की जाए, पर जब साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ या संगीत सोम फिर वाक्शूरता की तलवारें भांज अल्पसंख्यकों, मीडिया व अकादमिक संस्थानों में आलोचकों के प्राण अकच्छ करने लगें तो शीर्ष मौन साधे रहे।


    आज जो जनसमर्थन का ज्वार मोदीजी के साथ है, वह इंदिरा युग की याद दिलाता है। आज मोदीजी भाजपा के वैसे ही प्रतिनिधि नजर आते हैं, जैसे कभी इंदिरा गांधी कांग्रेस के लिए बन गई थीं। भारत में अक्सर ऐसा ज्वार अखिल भारतीयता या एक जादुई नेता के सम्मोहन का ही नहीं, केंद्रीकरण का भी ज्वार साबित हुआ है। और इससे मुख्यनेता भले ही छायादार वटवृक्ष बनकर छा जाए उसकी उपस्थिति नए नेताओं की टोली को उगने नहीं देती। राजीव गांधी की भारी चुनावी जीत और उसके पुण्य फलों का चंद सालों के भीतर क्षय दिखाता है कि यदि किसी कारण शिखर पर अचानक वटवृक्ष की छांव में पले बिरवे को लाकर खड़ा कर दिया जाय तो उनके रक्तचाप का उस ऊंचाई से सहज अनुकूलन होने में बहुत वक्त लग जाता है। ऐसा नेता संकट की घड़ी में असाधारण क्षमता अथवा त्यागमय नेतृत्व का कोई परिचय नहीं दे पाता। कांग्रेस के शासनकाल में जिन आर्थिक, सामाजिक खंभों ने बीसेक बरस अखिल भारतीय केंद्रीकरण को टिकाए रखा, वे सब समय पर मरम्मत या पुनर्रचना न होने से ध्वस्त पड़े हैं। ऐसे में क्या बिना शीर्ष पर सिरे से बदलाव किए कांग्रेस अखिल भारतीय पार्टी के रूप में जिंदा रह सकेगी? पर गोवा तथा मणिपुर पर पार्टी की लुजलुजी प्रतिक्रिया देखकर कहने को मन करता है, हाय रे उम्रभर काकवत् परमुखापेक्षी बने रहने वालों की यह पस्तहिम्मत थकन!


    (लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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