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    आलेख : न्यायिक फैसले का सियासी असर - प्रदीप सिंह

    Published: Wed, 19 Apr 2017 11:03 PM (IST) | Updated: Thu, 20 Apr 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team
    advani joshi uma 19 04 2017

    सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ इस नतीजे पर पहुंची कि अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराने के मामले में भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद के 13 नेताओं पर आपराधिक षड्यंत्र का मामला चलेगा। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और विनय कटियार सहित 13 नेताओं पर अब लखनऊ की सीबीआई अदालत में मुकदमा चलेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। इस फैसले से मुस्लिम समुदाय की यह धारणा टूटेगी कि मोदी सरकार के दबाव में सीबीआई भाजपा नेताओं को बचाने की कोशिश करेगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय व्यवस्था में भरोसे को पुख्ता करता है। अब किसी पक्ष को शिकायत का मौका नहीं है। दोनों के लिए न्याय का रास्ता खुला है। इस फैसले से न्याय हुआ ही नहीं, न्याय होता हुआ दिखा भी है। लेकिन न्याय में देरी का मसला ऐसा है जिसका सुप्रीम कोर्ट के पास भी कोई जवाब नहीं है। अब सीबीआई कोर्ट को फैसला करना है कि भाजपा और विहिप के ये नेता विवादित ढांचा गिराने के षड्यंत्र के दोषी हैं या नहीं?


    सीबाआई अदालत का फैसला जो भी हो, उमा भारती को छोड़कर भाजपा के बाकी नेता राजनीति की बंद गली के मुहाने पर खड़े हैं। उनके सामने एक ही रास्ता है और वह उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर ले जाता है। इनमें लालकृष्ण आडवाणी ही एक हैं, जिनके बारे में कहना चाहिए कि उन्हें ऐसे नहीं जाना चाहिए। उन्होंने आज की भाजपा के नेतृत्व को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। केएन गोविंदाचार्य जब भाजपा से गए तो उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में आडवाणीजी के लिए एक बात कही थी कि वह संकट में अपने लोगों के साथ खड़े नहीं होते। आखिर में हुआ यह कि जब वह संकट में आए तो उनके अपने, साथ नहीं खड़े हुए।


    राम जन्मभूमि आंदोलन ने लालकृष्ण आडवाणी और भारतीय जनता पार्टी को उस मुकाम पर पहुंचाया, जहां वह बिना उसके कितने बरसों में पहुंचती या पहुंच भी पाती या नहीं, कहना बहुत कठिन है। भाजपा ने उस आंदोलन के बाद गिरते पड़ते अपना रास्ता बदल लिया। जब ऐसा लगने लगा था कि आडवाणी और भाजपा दोनों की गति एक जैसी होने वाली है, उसी समय पार्टी को नरेंद्र मोदी के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया, जिसने पार्टी के कंधे से बाबरी का जिन्न् उतार दिया। भाजपा विकास और राष्ट्रवाद के रास्ते पर चल पड़ी। पार्टी का रास्ता बदलने की यह दूसरी कोशिश थी, जो कामयाब हुई। पहली कोशिश 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अख्तियार करके की और नाकाम रहे। अपना रास्ता बदलने की कोशिश यूं तो लालकृष्ण आडवाणी ने भी की थी, जिन्‍ना की मजार पर जाकर। नतीजा क्या हुआ,यह बताने की जरूरत नहीं। आडवाणी के राजनीतिक जीवन का सूरज जिन्‍ना की मजार पर ही अस्त हो गया। वह पिछले 12 साल से इस सच को नकारने की लड़ाई लड़ रहे हैं। गौतम बुद्ध ने कहा था कि आपके जीवन का सबसे ज्यादा हर्ष का समय वह होता है, जब आप यह स्वीकार करने का साहस जुटा लेते हैं कि किस चीज को बदल नहीं सकते। लालकृष्ण आडवाणी को अपने राजनीतिक जीवन में यह खुशी हासिल नहीं हुई। वह इस बात का साहस आज तक नहीं जुटा सके कि वह अपनी छवि नहीं बदल सकते, जिन्‍ना की मजार पर जाकर भी नहीं। उनकी उत्कट राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उन्हें कई ऐसे क्षण दिखाए, जो शायद वह देखना न चाहते रहे हों। उप-प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्होंने संघ का इस्तेमाल किया। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी मदन दास देवी जब यह प्रस्ताव लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के पास गए तो वाजपेयी नाराज नहीं हुए, चकित और दु:खी जरूर हुए। उन्होंने आडवाणी से ही कहा कि इतने दिन का साथ है, एक बार मुझसे कहते तो। आडवाणी के पास आंसुओं के अलावा कोई जवाब नहीं था।


    अच्छा चालक वह नहीं होता, जिसको पता हो कि कब एक्सेलेटर दबाना है। अच्छा चालक वह है, जिसे पता हो कि कब ब्रेक लगाना है। आडवाणी यह नहीं समझ पाए, फिर वह मामला चाहे अपनी महत्वाकांक्षा को काबू में रखने का हो या अगली पीढ़ी के लिए जगह खाली करने का। जब आप एक बार आत्मसम्मान से समझौता कर लेते हैं तो आप किस गति को प्राप्त होंगे, इसकी सीमा नहीं होती। आडवाणी के साथ भी यही हुआ। अयोध्या आंदोलन में वैसे तो विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा सबकी बड़ी भूमिका रही है, पर सार्वजनिक जीवन में दो शख्सियतों से इसकी पहचान बनी। एक विश्व हिंदू परिषद के सर्वोच्च और सर्वमान्य नेता अशोक सिंघल और दूसरे उस समय के भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी। एक आंदोलन का चेहरा था तो दूसरा उस आंदोलन का राजनीतिक चेहरा। दोनों ने अपने जीते जी अपना अवसान देखा। अशोक सिंघल ने आंदोलन के दौरान आडवाणी को कंधे पर बैठाया और पार्टी के सबसे लोकप्रिय और कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हाशिये पर धकेल दिया। अशोक सिंघल के करीबी मानते हैं कि उनकी राजनीतिक समझ बहुत अच्छी थी, लेकिन वह जिन दो लोगों के बारे में गच्चा खा गए, उनमें से एक लालकृष्ण आडवाणी हैं। गलती का एहसास होने पर अशोक सिंघल को वह खुशी मिली जो आडवाणी को नहीं मिल सकी। उन्होंने यह मानने और सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस दिखाया। उन्होंने कहा कि आडवाणी राजनीतिक हिंदू हैं। बाद के दिनों में उन्हें लगता रहा कि आडवाणी अयोध्या आंदोलन में राम से नहीं, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते जुड़े रहे। आडवाणी ने अशोक सिंघल के इस बयान के लिए उन्हें माफ नहीं किया। वाजपेयी सरकार में अयोध्या में शिलादान कार्यक्रम के समय उनके और विश्व हिंदू परिषद के साथ जो हुआ, उससे दोनों की प्रतिष्ठा को भारी ठेस पहुंची। अशोक सिंघल उस आघात से कभी उबर नहीं पाए। दूसरे कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनवाने के लिए संत समाज का समर्थन दिलवाने से लेकर संघ और भाजपा नेताओं को राजी करने में उन्होंने बहुत सक्रिय भूमिका निभाई।


    सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप होता दिख रहा है। जिंदगी लोगों को दोबारा मौका कम ही देती है। आडवाणी को कई मौके मिले। 2005 में पाकिस्तान के दौरे से लौटने के बाद साफ इबारत लिखी थी कि संघ और भाजपा में अब उनका स्वागत नहीं है। उन्होंने पद छोड़ने का मन बनाया, पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की सलाह पर रुक गए और उसके बाद से अपनों से ही अपमानित होते रहे। 2009 में और फिर 2013 में उनको फिर अवसर मिला कि वे अपनों द्वारा सम्मानित हों, पर उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।


    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार है। ये उनके निजी विचार हैं)

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