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    आलेख : चीन के बरक्स खड़ी हो चौकड़ी - हर्ष वी पंत

    Published: Wed, 12 Jul 2017 10:55 PM (IST) | Updated: Thu, 13 Jul 2017 07:52 AM (IST)
    By: Editorial Team
    malabar joint naval exercise 12 07 2017

    भारत-चीन-भूटान सीमा पर डोकलाम इलाके में चीन द्वारा सड़क निर्माण संबंधी गतिविधियों पर भारतीय और चीनी सैन्य बलों में लगातार तनातनी बढ़ने की खबरों के बीच एक खबर यह भी है कि जापानी और अमेरिकी नौसेना भारत के साथ संयुक्त सैन्य-अभ्यास कर रही हैं। तीनों देशों की नौसेनाएं मालाबार श्र्ाृंखला के अभ्यास के लिए करीब दस दिनों तक एक-दूसरे के साथ ताल मिलाएंगी। इस तरह के संयुक्त सैन्य-अभ्यास की शुरुआत 2007 में हुई थी। पहले यह अमेरिका और भारत के बीच ही हुआ करता था, लेकिन 2014 से जापान भी इसमें शामिल हो गया। इस साल के मालाबार नौसेनिक अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया ने भी बतौर पर्यवेक्षक शामिल होने की गुजारिश की थी, लेकिन भारत ने उसे खारिज कर दिया।


    हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलता शक्ति संतुलन एक तरह से अमेरिका के घटते रसूख और चीन की लगातार बढ़ती ताकत को ही दर्शाता है। अधिकांश एशियाई देशों के लिए इसके व्यापक निहितार्थ हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय नीतियों, मानकों व संस्थाओं के भविष्य को लेकर पसरी अनिश्चितता अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्य देशों पर असर डालती है, लेकिन एशियाई देश इस तरह के बदलाव से कुछ ज्यादा ही प्रभ्ाावित होते हैं। एशियाई देशों के लिए शक्ति-संतुलन में आ रहा मौजूदा बदलाव अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति और स्वरूप को लेकर महज वैचारिक संघर्ष ही नहीं है, बल्कि यह कई मायनों में उनकी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इस सामरिक बदलाव के केंद्र में हैं।


    दिल्ली और टोक्यो के बीच इस सामरिक जुड़ाव की जड़ें 2014 में तलाशी जा सकती हैं, जब भारत ने प्रशांत महासागर में अमेरिका नौसेना के साथ सालाना मालाबार नौसेनिक अभ्यास में शामिल होने के लिए जापानी नौसेना को भी आमंत्रित किया। इससे भारत-अमेरिका-जापान की त्रिपक्षीय अभ्यास की पुरानी परंपरा फिर शुरू हुई। इससे पहले सितंबर 2007 में बंगाल की खाड़ी में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और जापान की नौसेनाओं के संयुक्त अभ्यास पर चीन द्वारा आंखें तरेरने के बाद भारत के सुर नरम पड़ गए थे। चीन द्वारा इस पर नाखुशी जाहिर करने के बाद भारत ने 2008 से ऐसे अभ्यास से खुद को अलग कर लिया था।


    मोदी सरकार के आने के बाद मालाबार नौसेनिक अभ्यास में जापान की भागीदारी को भी सुनिश्चित किया गया। जापान और अमेरिका ने बार-बार अपनी यह इच्छा दर्शाई है कि वे मालाबार नौसेनिक अभ्यास का दायरा बढ़ाना चाहते हैं। सितंबर, 2014 में मोदी और शिंजो आबे ने जिस विजन डॉक्यूमेंट यानी दृष्टिपत्र पर हस्ताक्षर किए थे, उसमें दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास को नियमित बनाने के साथ ही भारत में जापान की भागीदारी को बढ़ाने की बात शामिल थी। इसके बाद जून, 2015 में होनोलुलु में हुई तीनों देशों की त्रिपक्षीय वार्ता के सातवें दौर के बाद मालाबार अभ्यास में टोक्यो के शामिल होने पर सहमति बनी।


    भारत और जापान ने अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय सामरिक संवाद साझेदारी की जो पहल की, उसके तहत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन कायम रखने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक सुरक्षा भी एक अहम पहलू है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच भी ऐसा ही एक संवाद कायम है। मोदी के सत्ता संभालने के बाद एशिया में सुरक्षा के मोर्चे पर ऐसी तिकड़ी में न केवल नई जान आई है, बल्कि इसमें अन्य क्षेत्रीय ताकतों को भी शामिल करने के लिए इसे विस्तार भी दिया जा रहा है। इसी सिलसिले में जून, 2015 में भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच नई दिल्ली में पहली उच्चस्तरीय बैठक हुई। इन त्रिपक्षीय पहलकदमियों में एशिया- प्रशांत क्षेत्र में सक्षम लोकतांत्रिक देशों की एक 'चौकड़ीके रूप में विकसित होने की पूरी क्षमता है। इस संभावित साझेदारी की जड़ें 2004 के अंत के उस अभियान में तलाशी जा सकती हैं, जब हिंद महासागर क्षेत्र में आई प्रलयंकारी सुनामी के बाद राहत व बचाव अभियान में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं ने कंधे के कंधा मिलाकर काम किया था।


    खासकर जापान ऐसी किसी भी साझेदारी का सबसे मुखर पैरोकार रहा है। 2007 में बतौर प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने एशिया के लोकतांत्रिक देशों से साथ आने का आह्वान किया था। अमेरिका ने भी पूरे जोशोखरोश से इसका समर्थन किया था। इस पहल की परिणति यह हुई कि सितंबर, 2007 में पांच देशों की नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में संयुक्त अभ्यास को अंजाम दिया, जिसका कोडनेम था - मालाबार 07-02। हालांकि ऐसी लामबंदी पर खिसियाए चीन ने नई दिल्ली और कैनबरा के समक्ष आपत्ति जाहिर की थी। इस पर भारत और ऑस्ट्रेलिया ने सोचा कि चीन को उकसाने में कोई समझदारी नहीं और वे इससे पीछे हट गए, जिससे यह पहल ही पटरी से उतर गई। अब जब चीन इस क्षेत्र में और ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है, तब ऐसे संकेत हैं कि ऑस्ट्रेलिया को यह विचार फिर से लुभा सकता है।


    हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की आजादी और सामुद्रिक सुरक्षा के मोर्चे पर चीन की आक्रामकता को लेकर भारत व ऑस्ट्रेलिया चिंतित हैं। इन साझा चिंताओं ने दोनों देशों के बीच व्यापक नौसैन्य सहयोग की जरूरत को बल दिया और उन्होंने संयुक्त नौसैन्य अभ्यास शुरू भी कर दिया। मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान एक सुरक्षा संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जो हिंद महासागर क्षेत्र में रक्षा सहयोग की अहमियत को और अधिक रेखांकित करता है।


    भारत व ऑस्ट्रेलिया हिंद महासागर क्षेत्र की अग्रणी ताकते हैं। दोनों देश हिंद महासागर के तटवर्ती देशों के पूर्व संगठन हिंद महासागर क्षेत्रीय संघ यानी आईओआरए में भी साथ रह चुके हैं। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया हिंद महासागर क्षेत्र में ओशन नेवल सिंपोजियम का भी स्थायी सदस्य है जो हिंद महासागर क्षेत्र की स्थानीय नौसेनाओं को साथ लाता है। हिंद महासागर क्षेत्र में उनके क्षेत्रीय सहयोग के दायरे को जापान और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ उनकी सालाना त्रिपक्षीय वार्ताओं से भी समझा जा सकता है।


    इस वक्त की जरूरत यही है कि समान सोच वाले देश अपनी सहभागिता और बढ़ाएं। अमेरिका और जापान के साथ ही ऑस्ट्रेलिया भी मालाबार नौसेनिक अभ्यास में शामिल होने के लिए ललल रहा है। भारत को ऑस्ट्रेलिया के इस अनुरोध पर उदारतापूर्वक विचार करना चाहिए। बेहतर यही है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक देशों की चौकड़ी का यह विचार जल्द से जल्द परवान चढ़े।


    (लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्राध्यापक हैं)

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