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    आलेख : आर्थिक मोर्चे पर दें चीन को झटका - डॉ. जयंतीलाल भंडारी

    Published: Fri, 11 Aug 2017 10:52 PM (IST) | Updated: Sat, 12 Aug 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    boycott chinese goods 11 08 2017

    इन दिनों न केवल चीन के विदेश मंत्रालय, बल्कि उसके सरकारी मीडिया द्वारा भी भारत को युद्ध की धमकी दी जा रही है। चीन के विस्तारवादी मंसूबों से उसके कई अन्य पड़ोसी मुल्क भी परेशान हैं। सैन्य टकराव इसका हल नहीं हो सकता। चीन के नापाक मंसूबों को ध्वस्त करने का एक तरीका यह है कि चीनी सामान का बहिष्कार किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने पिछले 'मन की बात संबोधन में चीन पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए देशवासियों से त्योहारों में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल की अपील की थी। पीएम का कहना था कि देश में बनी मिट्टी की मूर्तियों और दीयों के इस्तेमाल से गरीबों को रोजगार मिलेगा। यद्यपि उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन उनका मंतव्य स्पष्ट था। राखी, दिवाली और गणेशोत्सव के दौरान देश में हजारों करोड़ का चीन निर्मित सामान आता है। चीन की ऐसी कई वस्तुओं ने भारतीय बाजार पर कब्जा कर लिया है। इससे धीरे-धीरे हमारे स्वदेशी उद्योग चौपट हो रहे हैं और लघु व कुटीर उद्योग पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। चीन के प्रति बढ़ते आक्रोश के मद्देनजर देशभर में ह्वाट्सएप समेत विभिन्न् सोशल मीडिया मंचों पर यह अभियान शुरू हो चुका है कि भारतीय दुकानदार और नागरिक चीन में उत्पादित वस्तुओं के बहिष्कार की नीति पर आगे बढ़कर चीन को करारा सबक सिखा सकते हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर में चीन देख चुका है कि भारतीय उपभोक्ताओं द्वारा चीनी सामान के बहिष्कार से चीन से भारत को निर्यात में कमी आई थी।

    निश्चित रूप से भारत-चीन व्यापार के बढ़ते असंतुलन के मद्देनजर चीन से आयात में कमी के प्रयास जरूरी हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में भारत-चीन व्यापार 71.47 अरब डॉलर का रहा। चीन को भारत से 10.19 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात किए गए, जबकि चीन से आयात का मूल्य 61.28 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा 47.68 अरब डॉलर का रहा। इससे पहले के तीन वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वर्ष 2012-13 में भारत-चीन व्यापार 65.85 अरब डॉलर का रहा। चीन को भारत से 14.82 अरब डॉलर के निर्यात किए गए, जबकि चीन से 51.03 अरब डॉलर के आयात हुए। व्यापार घाटा 36.21 अरब डॉलर! वर्ष 2013-14 में भारत-चीन व्यापार 72.36 अरब डॉलर का रहा। चीन को भारत से निर्यात का आंकड़ा 11.93 अरब डॉलर, जबकि आयात 60.43 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा 48.48 अरब डॉलर रहा। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में भारत-चीन व्यापार 70.71 अरब डॉलर रहा। भारत से चीन को निर्यात 9.01 अरब डॉलर, जबकि आयात 61.7 अरब डॉलर का रहा। व्यापार घाटा 52.69 अरब डॉलर का रहा। स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। लेकिन चीन से आयात लगातार बढ़े हैं और चीन को भारत से निर्यात लगातार घटे हैं। साथ-साथ व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता गया है। सिर्फ पिछले वित्त वर्ष (2016-17) में भारत में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की नीति से व्यापार घाटे में नगण्य कमी दिखाई दी है। चीन ने भारत के साथ वर्ष 2019 तक व्यापार संतुलन के लिए समझौता किया था, लेकिन वह हवाहवाई हो गया है।


    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चीन से कुछ आयात नियंत्रण का सफल प्रयोग पिछले वर्ष में दिखा है। वस्तुत: सितंबर 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद चीन के द्वारा पाकिस्तान का साथ दिए जाने के कारण उस वक्त चीनी माल का बहिष्कार भारत के उपभोक्ताओं के द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ। पिछले वर्ष दशहरा-दिवाली के दिनों में भारतीय बाजार में चीनी सामान की बिक्री में 30 से 40 फीसदी की कमी आई थी। इसका स्पष्ट प्रभाव भारत में चीन से होने वाले आयात पर दिखा। वर्ष 2015-16 की तुलना में 2016-17 में चीन से आयात की दर में कमी आई। साथ ही व्यापार घाटे की दर भी कुछ घटी। ऐसे में यदि हम चीनी माल के बहिष्कार की नीति अख्तियार करते हैं, तो इससे चीनी अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा।


    चीन के लिए भारतीय बाजार अहम है। चीन ने वर्ष 2015 के बाद से अब तक अपनी मुद्रा युआन के मूल्य में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी कमी की है। इससे चीन के निर्यातकों को फायदा हो रहा है। चीन की मुद्रा सस्ती होने से वहां से भारत में आयात किया गया हर सामान सस्ता हुआ है। भारत में सस्ते चीनी सामान की आवक तेजी से बढ़ी है। भारत के कई उद्योग भी कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। भारत में चीन से होने वाले निवेश में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2011 में भारत में निवेश करने वाले देशों में चीन 37वें स्थान पर था, लेकिन अब यह 17वां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बन चुका है। ऐसे में चीन के लिए भारतीय बाजार की अहमियत स्पष्ट दिख रही है।


    हां, यह सही है कि चीन के कुल निर्यात और कुल निवेश मे भारत का हिस्सा कम है। लेकिन इस मंदी के दौर में चीनी नेतृत्व इस बात को लेकर चिंतित तो जरूर होगा कि कहीं भारत सीमा विवाद के चलते उस पर आर्थिक चोट न कर दे। यह चोट कितनी गहरी हो सकती है, इसकी कल्पना हम चीनी मोबाइलों के भारत में बढ़ते बाजार के नियंत्रण के परिप्रेक्ष्य में कर सकते हैं। चीन की मोबाइल फोन निर्माता कंपनियों के वैश्विक लक्ष्य को भारतीय बाजार से काफी गति मिल रही है। दुनिया में सबसे ज्यादा चीनी कंपनियों के मोबाइल भारत में बिकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक वीवो की 73 फीसदी, श्याओमी की 67 फीसदी और ओप्पो की 48 फीसदी बिक्री भारत में है। भारत में वर्ष 2017 में 13 करोड़ स्मार्टफोन बिकने की संभावना है। ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं के बहिष्कार से चीनी मोबाइलों की बुरी गत हो जाएगी।


    चूंकि भारत व चीन दोनों विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य हैं, ऐसे में भारत डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत चीनी माल पर टैरिफ या गैरटैरिफ प्रतिबंध लगाकर चीनी माल को रोक नहीं सकता है। लेकिन यदि आयातित वस्तुएं घरेलू नियम-कानून, तकनीकी ब्यौरे, गुणवत्ता और पर्यावरण संबंधी सुरक्षा मानकों के मुताबिक न हों तो उन्हें प्रतिबंधित किया जा सकता है। डब्ल्यूटीओ के नियमों का हवाला देते हुए चीन ने बोवाइन मीट, फल, सब्जियों, बासमती चावल और कच्चे पदार्थों के भारत से आयात पर बाधाएं उत्पन्न् की हैं। ऐेसे में भारत भी चीन द्वारा लागत से कम मूल्य पर माल भेजकर भारतीय बाजार पर कब्जा करने का आधार देकर चीन के कई तरह के माल पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाकर उसे हतोत्साहित कर सकता है। हम आशा करें कि चीन की हेकड़ी और धमकियों के मद्देनजर एक ओर देश के करोड़ों उपभोक्ता चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की डगर पर आगे बढ़ेंगे, वहीं केंद्र सरकार डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत घटिया चीनी सामान को रोकने तथा चीनी आयात को हतोत्साहित करने के उपाय तलाशेगी। इससे आर्थिक सुस्ती से जूझ रहे चीन पर दबाव बढ़ेगा और उसकी अकड़ टूटेगी।


    (लेखक अर्थशास्त्री हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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