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    आलेख : तीन साल में हालात सुधरे तो हैं - प्रदीप सिंह

    Published: Thu, 18 May 2017 10:45 PM (IST) | Updated: Wed, 24 May 2017 12:14 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अच्छे दिनों का जो वादा किया था उसे लेकर विपक्ष पूछ रहा है कि कहां हैं अच्छे दिन? विपक्ष की मानें तो तीन साल में देश बेहाल है। विपक्ष को सरकार की आलोचना का जनतांत्रिक अधिकार है। विपक्ष तो सरकार से कभी खुश हो ही नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए, लेकिन संसदीय जनतंत्र में सबसे ज्यादा अहमियत होती है आम जनता की खुशी व नाराजगी की और उनकी खुशी-नाराजगी नापने का सबसे बड़ा पैमाना चुनाव होते हैं। दो महीने पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में लोगों ने मतदान के जरिए बता दिया कि वे किससे खुश हैं और किससे नाराज? राजनीति में वास्तविकता से ज्यादा अहमियत धारणा की होती है। आम धारणा है कि पिछले तीन साल में समाज के गरीब तबके में प्रधानमंत्री के प्रति विश्वास बढ़ा है। इसका कारण उनके वादे ही नहीं, सरकार का जमीन पर पहुंचा काम भी है। योजनाएं तो सभी सरकारें अच्छी बनाती हैं। चुनौती होती है उन्हें लागू करने की। किसी योजना को किस तरह लागू करना चाहिए, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बनी है उज्ज्वला योजना। एक साल में डेढ़ करोड़ रसोई गैस के कनेक्शन देने का लक्ष्य था और सवा दो करोड़ गरीबों के घर रसोई गैस पहुंच गई है। बात केवल इतनी नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर गैस कनेक्शन दिए गए, ज्यादा अहम बात यह है कि एक भी मामले में भ्रष्टाचार की शिकायत नहीं आई। भ्रष्टाचार ऐसा मुद्दा है जो कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के पतन का सबसे बड़ा कारण बना। तो क्या तीन साल में देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया? इसका जवाब कोई भी 'हां में नहीं दे सकता, किंतु एक बात मोदी के विरोधी भी दबी जबान से ही सही, मानते हैं कि तीन साल में सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे किसी शख्स के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है।

    तीन साल पहले ऐसा माहौल था कि मंत्रालयों में मंत्रियों और अफसरों से ज्यादा संख्या दलालों की होती थी। अब मंत्रालय के गलियारों में दलाल नजर नहीं आते। देश की अर्थव्यस्था जिस तेजी से बिगड़ रही थी, उससे लगता था कि भारी आर्थिक संकट देश का प्रारब्ध बन जाएगा। सरकार में फैसले होते नहीं थे और होते थे तो कोई मानता नहीं था। नौकरशाही को समझ में नहीं आता था किसकी सुनें और किसकी नहीं! सो वह सबकी सुनती थी, पर काम किसी का नहीं करती थी। तब कोई मंत्री अपने को प्रधानमंत्री से कम नहीं समझता था। सरकार का एजेंडा सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद तय करती थी। उसके बरक्स भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। फैसले न केवल हो रहे हैं, बल्कि पारदर्शी और प्रभावी तरीके से लागू भी हो रहे हैं। प्रधानमंत्री पद का इकबाल कायम हो गया है। नोटबंदी से अर्थव्यवस्था चौपट होने की आशंकाएं निर्मूल साबित हुई हैं।

    आखिर किसी भी चुनी हुई सरकार के कामकाज को नापने का पैमाना क्या होना चाहिए? सत्तापक्ष के अपनी कामयाबी के दावों के आधार पर या विपक्ष के आरोपों/ आलोचनाओं से अथवा विशेषज्ञों और टिप्पणीकारों की राय को पैमाना माना जाए? सभी आलोचकों को एक चश्मे से देखना ठीक नहीं है, क्योंकि आलोचना भूल सुधार का अवसर देती है। किसी भी व्यक्ति या संगठन को इसकी अनदेखी या उपेक्षा नहीं करना चाहिए, लेकिन जो आलोचना करने के लिए ही आलोचना करते हैं, उनकी ज्यादा चिंता भी नहीं करना चाहिए। जनतंत्र में जनता जनार्दन होती है। सरकार बनाती और हटाती वही है। पांच साल बाद सरकार को जनता के दरबार में ही अपने किए अनकिए का हिसाब लेकर जाना होता है। अपने देश में हर साल किसी न किसी राज्य में होने वाले चुनावों के नुकसान तो बहुत हैं, पर यह एक फायदा भी है कि सत्तारूढ़ दल की जनता के दरबार में लगातार पेशी होती रहती है। यह सत्तापक्ष व विपक्ष, दोनों को आमजन तक अपनी बात पहुंचाने का मौका देता है। यह सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली जैसा है, जहां हर छह माह पर आपको इम्तिहान देने का मौका मिलता है।

    मोदी सरकार आधिकारिक तौर पर अपने तीन साल पूरे करने ही वाली है। बीच में भाजपा दिल्ली और बिहार में ठोकर खा चुकी है, लेकिन लगता है कि उसके बाद संभल गई है। अक्सर देखा गया है कि दूसरा साल आते-आते सरकारें अलोकप्रिय होने लगती हैं। सरकार से अपेक्षा और उसके प्रदर्शन में अंतर दिखने लगता है। पिछले 45 साल में यानी 1971 से अब तक केंद्र की यह पहली सरकार है जो तीन साल पूरे करने के बाद अलोकप्रिय होने की बजाय पहले से ज्यादा लोकप्रिय नजर आ रही है। चुनाव नतीजे तो यही संदेश दे रहे हैं। 1971 में इंदिरा गांधी 'गरीबी हटाओ के नारे पर पूरे विपक्ष को धूल धूसरित करते हुए सत्ता में आई थीं। बांग्लादेश युद्ध के बाद दुर्गा बन गईं, पर 1973 बीतते-बीतते सरकार के खिलाफ जनमानस में खदबदाहट शुरू हो गई। गुजरात से शुरू हुए छात्रों के नवनिर्माण आंदोलन ने 1974 में जेपी आंदोलन का विराट स्वरूप धारण कर लिया। उसके बाद क्या हुआ, यह सबको पता है। 1977 में बनी पहली गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार 1978 खत्म होते-होते बिखरने लगी। वह तीन साल भी चल नहीं पाई। 1984 में राजीव गांधी प्रचंड बहुमत और 'मिस्टर क्लीन की छवि लेकर सत्तारूढ़ हुए और 1986 में बोफोर्स दलाली का शोर पूरे देश में सुनाई देने लगा। तीस साल बाद 2014 में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। सरकार की आलोचना के कई मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन आम लोगों के भरोसे और उम्मीद में कोई खास कमी अब भी नहीं दिख रही है।

    ऐसा नहीं है कि तीन साल में सब कुछ अच्छा ही हुआ है। दीपक तले अंधेरा तो होता ही है। देश में अपराध की घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रहीं। सही है कि कानून व्यवस्था राज्य का मामला है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस सुधार के मामले पर कुछ खास नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव में मोदी को मिले भारी समर्थन में सबसे बड़ी भागीदारी युवाओं की रही। रोजगार उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। दुनिया भर में संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं, क्योंकि हर क्षेत्र में ऑटोमेशन बढ़ रहा है। रोजगार के लिए असंगठित और सेवा क्षेत्र में ही अवसर हैं। सरकार ने मुद्रा योजना के तहत साढ़े सात करोड़ लोगों को दस हजार से दस लाख तक कर्ज दिलवाए हैं, लेकिन सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जो यह बता सके कि इसमें कितने ऐसे लोग हैं जिन्होंने पहली बार स्वरोजगार के क्षेत्र में कदम रखा है।

    कांग्रेस ने कहा है कि वह अगले दो साल में मोदी सरकार के खिलाफ देशभर में आंदोलन चलाएगी। काश, वह ऐसा करती। समस्या तो यही है कि कांग्रेस में आंदोलन की क्षमता ही नहीं बची है। जिन मुद्दों पर वह सरकार को घेर सकती है, उन पर उसकी अपनी विश्वसनीयता नहीं है। अब यह कांग्रेस की उपलब्धि है या मोदी की, फैसला खुद कीजिए।

    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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