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    आलेख : पाक के प्रति नरमी से नहीं चलेगा काम - ब्रह्मा चेलानी

    Published: Wed, 15 Mar 2017 09:49 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Mar 2017 12:30 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    पिछला साल काफी असामान्य था। पाकिस्तानी आतंकियों ने भारतीय सुरक्षा बलों के ठिकानों पर सिलसिलेवार ढंग से हमले किए। पठानकोट में हमला पड़ोसी मुल्क द्वारा नए साल के तोहफे जैसा था, तो उरी अटैक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके बर्थ-डे गिफ्ट सरीखा। इससे पहले एक साल के दौरान भारतीय सुरक्षा ठिकानों पर कभी इतनी बड़ी तादाद में हमले नहीं हुए थे। ध्यान रहे कि बीते साल जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में 1990 के दशक के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। पाकिस्तान आशंकित है कि डोनाल्ड ट्रंप की अगुआई वाला नया अमेरिकी प्रशासन उसके खिलाफ सख्त रुख अपना सकता है। लिहाजा उसने दिखावे के तौर पर आतंकी हाफिज सईद के खिलाफ कुछ कदम उठाए ताकि ऐसा आभास हो कि वह आतंकी समूहों पर कार्रवाई को लेकर गंभीर है। अगर ट्रंप पर पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही उसी नीति पर टिके रहने का दबाव बढ़ा जिस पर उनके पूर्ववर्ती काम करते आए थे तो आने वाली गर्मियों में आतंक के खिलाफ भारतीय सुरक्षाकर्मियों का अभियान खासा खून-खराबे वाला हो सकता है। इस पृष्ठभूमि से इतर यह गौरतलब है कि मोदी पाकिस्तान को लेकर अपनी नीतियों से पलटकर वापस रिश्तों को सामान्य बनाने की राह पर लौटते दिख रहे हैं।


    सितंबर में उरी आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार ने बड़े जोर-शोर से स्थायी सिंधु आयोग (पीआईसी) पर सख्त रवैया दिखाया था। अब जल्द ही लाहौर में पीआईसी की बैठक आयोजित होगी जिसमें भारत भाग लेगा। पीआईसी 1960 के सिंधु जल समझौते (आईडब्ल्यूटी) के जरिए अस्तित्व में आया। यह सिंधु तंत्र की तीन नदियों के पानी पर पाकिस्तान के हिस्से को बढ़ाता है। इसके तहत भारत के हिस्से महज 19.48 प्रतिशत पानी आता है। इसे दुनिया का सबसे उदार जल साझेदारी समझौता माना जाता है। मोदी के यह कहने के बावजूद कि 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते पीआईसी को लेकर उनके फैसले से यही संकेत मिलता है कि वह इस संधि को रद्द या तब तक मुल्तवी करने के इच्छुक नहीं लगते जब तक पाकिस्तान आतंक के जरिए छद्म युद्ध को बंद ना कर दे। वास्तव में विश्व बैंक मोदी सरकार पर दबाव बना रहा है कि वह पीआईसी के जरिए पाकिस्तान के साथ किशनगंगा व रैटल पनबिजली परियोजना को लेकर किसी समझौते पर पहुंचे। पाकिस्तान इन परियोजनाओं के ढांचे में बदलाव की मांग कर रहा है। इनमें रैटल परियोजना का निर्माण कार्य अभी तक शुरू भी नहीं हुआ है।


    कुछ अन्य घटनाक्रम भी पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार के नरम होते तेवरों का संकेत करते हैं। इनमें सेवानिवृत्त पाक राजनयिक अमजद हुसैन सियाल की दक्षेस के नए महासचिव के तौर पर नियुक्ति भी शामिल है। इस पर भारत ने अपनी आपत्ति वापस ले ली थी। मोदी ने नवाज शरीफ के साथ जून में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से इतर वार्ता करने का विकल्प भी खुला रखा है। एससीओ की बैठक कजाकिस्तान के अस्ताना में प्रस्तावित है। अपने वादों पर अमल करने को लेकर मोदी सरकार की हिचक तब और संदिग्ध नजर आती है जब उसने केरल सेराज्यसभा सदस्य राजीव चंद्रशेखर को पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने से जुड़ा निजी सदस्य विधेयक वापस लेने के लिए कहा। जब पाकिस्तानी आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित भारत ही उसे आतंकी देश घोषित करने से हिचकिचाएगा तो क्या इस मसले पर अमेरिका द्वारा कदम उठाने की उम्मीद करना मुनासिब होगा? अन्य ताकतें भले ही भारत की स्थिति पर हमदर्दी जताएं, लेकिन भारत महज बयानबाजी के जरिए उनका सम्मान हासिल नहीं कर पाएगा। पाकिस्तान के साथ सीमापार आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अकेले भारत की है।

    औपनिवेशिक दौर के बाद पहले इस्लामिक गणतंत्र के तौर पर अस्तित्व में आए पाकिस्तान ने अपने सृजन के साथ ही भारत के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाया, लेकिन एक के बाद एक भारतीय सरकारें इस विश्वासघाती देश के खिलाफ स्थायी, दीर्घकालिक नीति बनाने में नाकाम रहीं। नतीजतन, पाकिस्तान के लिए भारत के खिलाफ छद्म युद्ध अभी भी सबसे सस्ता व प्रभावी विकल्प बना हुआ है। पाकिस्तान के संदर्भ में मोदी सरकार की 'कभ्ाी गरम-कभी नरम की नीति दर्शाती है कि इस पड़ोसी मुल्क के तिकड़मी बर्ताव को सुधारने हेतु उसके पास कारगर रणनीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति या फिर दोनों की ही कमी है। मोदी की पाकिस्तान नीति में अहम मोड़ 2015 में क्रिसमस के दिन आया जब बिना किसी औपचारिक कार्यक्रम के वह अचानक लाहौर पहुंच गए थे। बिना पूर्वतैयारी के हुआ उनका दौरा भी बेनतीजा ही निकला। अगर कुछ हुआ तो यही कि चंद दिन बाद ही पठानकोट एयरबेस और अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास आतंकी हमलों का निशाना बने। इस पर भारत की प्रतिक्रिया लुंज-पुंज रही। पठानकोट हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान के साथ खुफिया जानकारियां साझा की गईं और उसे जांच टीम भेजने का आमंत्रण दिया। पाकिस्तान ने जांच टीम भेजी जिसे पठानकोट बेस में प्रवेश की इजाजत भी मिली। इसका अर्थ यही था कि भारत ने आईएसआई नाम के उस संस्थान के साथ जानकारियां साझा कीं, जिसके हाथ न जाने कितने भारतीयों के खून से रंगे हैं। 19 जवानों की शहादत वाले उरी हमले की प्रतिक्रिया में एक बार फिर मोदी लड़खड़ा गए। पाकिस्तान पर कुछ प्रतिबंध लगाने के बजाय वह जुबानी जमाखर्च में जुट गए। पाकिस्तानी अवाम से मुखातिब होते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो के भारत से 1000 साल तक जंग करने वाले जुमले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों को गरीबी, अशिक्षा जैसे मसलों के खिलाफ लंबी जंग छेड़ने की जरूरत है।


    निश्चित रूप से मोदी ने सितंबर के अंत में सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए अपनी साख बचाने की कोशिश की। इसमें भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा को पार कर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, किंतु यह स्पष्ट है कि ऐसी इक्का-दुक्का कार्रवाइयों से पाकिस्तान नहीं सुधरेगा। भारत को निरंतर दबाव बनाना होगा। अभी भी देर नहीं हुई। पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाने के लिए मोदी ऐसी नीतियां बना सकते हैं जिससे उसे कूटनीतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से भारी कीमत चुकानी पड़े। अगर पाकिस्तान परमाणु ढाल की आड़ में भारत पर छद्म युद्ध थोप सकता है तो परमाणु शक्ति-संपन्न् भारत दुश्मन को उसकी मांद में ही गैर-पारंपरिक युद्ध के जरिए क्यों नहीं मात दे सकता? आखिर बलूचिस्तान, सिंध, गिलगित-बाल्टिस्तानऔर पश्तून जैसे इलाकों में अलग-अलग धाराओं के विभाजन को क्यों नहीं भुनाया जाता? भारत को सिंधु समझौते में एकतरफा बदलाव का डर दिखाकर भी पाकिस्तान की आक्रामकता को कुंद करना चाहिए।

    (लेखक सामरिक मामलों के जानकार व सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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