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    आलेख : एक साथ चुनाव के फायदे अनेक - ए. सूर्यप्रकाश

    Published: Thu, 12 Oct 2017 10:09 PM (IST) | Updated: Fri, 13 Oct 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team

    हाल में चुनाव आयोग ने कहा कि सितंबर 2018 तक वह लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम हो जाएगा। इसके बाद से लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का मुद्दा एक बार फिर जिंदा हो गया। चुनाव आयोग के अनुसार एक साथ चुनाव कराने के लिए 40 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) की जरूरत होगी, जो उसे एक साल के भीतर उपलब्ध हो जाएंगी। चुनाव आयोग की इस घोषणा के बाद एक साथ चुनाव कराने में अब तक बाधा बनी उपकरणों की कमी की चिंता दूर हो गई है। अब गेंद सरकार के पाले में है। वह इस संबंध में राजनीतिक सहमति बनाए और जरूरी विधायी उपाय करे। हालांकि कुछ राजनीतिक पार्टियां एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। उनकी हताशा भरी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए लगता है कि सरकार के लिए इस पर आम सहमति बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन यदि हम हर साल हो रहे चुनावों पर भारीभरकम खर्च में कटौती करना चाहते हैं और गवर्नेंस एवं विकास कार्यों में बाधक बने चुनावों के दुश्चक्र को तोड़ना चाहते हैं तो इस दिशा में गंभीरता से प्रयास करने होंगे।


    लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव 1952, 1957, 1962 और 1967 में एक साथ ही हुए थे। इसके बाद यह क्रम दो कारणों से छिन्न्-भिन्न् हो गया। पहला, आजादी के बाद 1967 में पहली बार कांग्रेस को विभिन्न् राज्यों में हार का मुंह देखना पड़ा और उत्तर भारत में संयुक्त विधायक दल जैसे अस्थायी गठबंधन की सरकारें बनीं। ये सरकारें असमान विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों के गठजोड़ से बनी थीं जो कांग्रेस विरोध के नाम पर एक मंच पर आई थीं, लेकिन अपना चुनावी लक्ष्य हासिल करने के बाद वे बिखर गईं, क्योंकि उनके पास आगे एक साथ रहने की कोई ठोस वजह नहीं रह गई थी। इसके अलावा कांग्रेस की अगुआई वाली तत्कालीन केंद्र सरकार ने इन गठबंधन सरकारों को अस्थिर करने के लिए हर तरह की राजनीतिक चालों का इस्तेमाल किया। यहां तक कि राष्ट्रपति शासन का भी सहारा लिया। 1990 के दशक के मध्य में बोम्मई मामले में फैसला आने तक कांग्रेस ने राज्यों में दूसरी पार्टियों की सरकारों को बर्खास्त करने और उन्हें केंद्र के अधीन रखने के लिए अनुच्छेद 356 का अंधाधुंध प्रयोग किया। यह खेल वह तब तक खेलती, जब तक उसे यह विश्वास नहीं हो जाता कि राज्य की चुनावी हवा उसके अनुकूल है।


    एक साथ चुनाव की व्यवस्था टूटने का दूसरा प्रमुख कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री का साल भर पहले ही 1971 में लोकसभा चुनाव कराने का फैसला था। यदि तब तय समय से चुनाव होते तो लोकसभा के चुनाव भी 1972 में राज्यों के चुनावों के साथ ही होते, लेकिन इंदिरा गांधी के निर्णय ने इस क्रम को भंग कर दिया। उन्होंने यह कदम चुनाव में अधिक से अधिक चुनावी लाभ हासिल करने की मंशा से उठाया था, लेकिन हकीकत में वह देश में चुनावी प्रक्रिया को तहस-नहस करने का सबसे बड़ा कारण बन गया।


    विधि आयोग ने 1999 में अपनी 170 पेज की रिपोर्ट में इस मुद्दे का गहन परीक्षण किया और एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में खुलकर विचार रखे। उसका कहना था कि देश में एक साथ चुनाव कराने का लक्ष्य रातोंरात हासिल नहीं हो सकता, क्योंकि विभिन्न् विधानसभाओं के कार्यकाल पांच वर्षों के दौरान अलग-अलग समय में पूरे होते हैं। उसने अगले 12 महीनों में होने वाले राज्यों के चुनावों को एक साथ कराने का सुझाव दिया। आयोग ने कहा कि यदि सभी राजनीतिक पार्टियां सहयोग करें तो किसी भी दल के हितों को चोट पहुंचाए बिना इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। इसके लिए संविधान में संशोधन कर कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में छह महीने की कटौती की जा सकती है।


    हालांकि एक साथ चुनाव कराने का विरोध करने वाले दल भी कम नहीं हैं। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और कुछ अन्य छोटी-मोटी पार्टियां शामिल हैं। कुछ राजनीतिक दलों को डर है कि एक साथ चुनाव से मतदाताओं पर राष्ट्रीय पार्टियों का कहीं ज्यादा प्रभाव हो जाएगा और चुनाव अभियान राष्ट्रीय मुद्दों के आसपास सिमट जाएंगे। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय और छोटी राजनीतिक पार्टियां बड़े दलों का मुकाबला नहीं कर पाएंगी और चुनावों में उनका एक तरह से सफाया हो जाएगा। इसके विपरीत जब हम लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव के दौरान मतदाताओं के दृष्टिकोण का परीक्षण करते हैं तो इस तरह के तर्कों को एकदम निराधार पाते हैं। देश में ऐसे कई मौके आए हैं जब लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ या कुछ महीनों के अंतराल में हुए हैं। ऐसे मौकों पर मतदाताओं ने केंद्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों को सत्ता सौंपी। वास्तव में मतदाताओं का किसी एक पार्टी की तरफ एकतरफा झुकाव नजर नहीं आता। यहां तक कि लोकसभा और विधानसभाओं में अलग-अलग दलों को चुनने में मतदाता जिस चतुराई का प्रदर्शन करते हैं उससे तो कई बार अनुभवी राजनेता भी दंग रह जाते हैं।

    एक साथ चुनाव कराने के फायदे नुकसान से कहीं ज्यादा हैं। अलग-अलग चुनाव का मौजूदा चलन गवर्नेंस को बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाता है। एक बार आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है, तो जब तक चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संपन्न् न हो जाए, तब तक विकास के काम एक तरह से स्थगित हो जाते हैं। केंद्र सरकार और चुनाव वाले राज्यों की सरकारें चुनाव आयोग की विपरीत प्रतिक्रिया के डर से कई योजनाएं रोक लेती हैं। इसके अलावा हर साल हो रहे चुनावों पर भारीभरकम राशि भी बेवजह खर्च करनी पड़ती है। चुनाव आयोग ने अनुमान लगाया है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने पर 4500 करोड़ रुपए की लागत आती है। विधि आयोग की कवायद के बाद कार्मिक, लोक सेवा, विधि और न्याय से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने भी हाल में इस विषय का गहन परीक्षण किया। समिति ने माना कि 'अलग-अलग चुनाव प्राय: नीतिगत अपंगता और गवर्नेंस की कमी का जरिया बनते हैं। इस समिति ने एक साथ चुनाव की शुरुआत के लिए कहा है कि राज्यों को दो श्रेणी में बांटा जा सकता है। एक श्रेणी के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकते हंै और दूसरी श्रेणी के चुनाव एक या दो साल के बाद। अंततोगत्वा आगे चलकर सभी राज्यों का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराया सकता है।


    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और मौजूदा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों में शामिल हैं। मुखर्जी ने कहा था कि चूंकि हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं, लिहाजा आचार संहिता के कारण सरकारी कामकाज प्रभावित होता है। नायडू का कहना है कि 'नियमित चुनावी पर्व विकास को बाधित कर रहा है। देशहित में एक साथ चुनाव समय की मांग है। संकीर्ण राजनीतिक सोच के साथ हाशिये पर खड़े सियासी दलों को इसमें बाधक नहीं बनने देना चाहिए। हमें हर हाल में इन चुनावों को पुन: एक साथ कराना चाहिए।


    (लेखक प्रसार भारती के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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