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    आलेख : आपसी रिश्तों में संतुलन की दरकार - मृणाल पांडे

    Published: Mon, 13 Nov 2017 10:33 PM (IST) | Updated: Mon, 13 Nov 2017 10:35 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    कुछ दिन पूर्व चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं पंचसाला बैठक ने शीर्ष नेता शी जिनपिंग के निर्विवाद नेतृत्व पर मुहर लगा दी। जानकारों की राय है कि इस बैठक के बाद शी माओ की श्रेणी के सदी के महानेता बनकर उभरे हैं। ये भी रोचक है कि जो अन्य 6 नेता इस बैठक में अभिषिक्त हुए, सभी 60 से ज्यादा उम्र के हैं। इससे कयास लगाया जा रहा है कि पांच साल बाद जब पार्टी की महाबैठक होगी तो इनमें से कोई भी उम्र के आधार पर शी को चुनौती नहीं दे सकेगा। चीनी सेना को आधुनिकीकरण के लिए तैयार रहने को कह चुके शी ने अब इस मुकाम पर पहुंचकर कहा है कि उनका लक्ष्य है कि आगामी एक दशक में चीन सामरिक ताकत में रूस से आगे हो और 2050 तक वह अमेरिका को भी पछाड़ दे।


    शी का कद लगातार बढ़ना और चीन की हालिया सामुद्रिक व जमीनी कार्रवाइयां, सारी दुनिया के लिए गहरा अर्थ रखते हैं। और यह भांपकर अमेरिका ने चीन को चुनौती देने के लिए एशिया में जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ चौमुखी युति बनाने की दिशा में दोबारा कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। उसने राजनय के तलघर में रखे जापान के 2008 के प्रस्ताव की धूल झाड़कर ऐसे संकेत दिए हैं। यहां उल्लेखनीय है कि ऑस्ट्रेलिया ने 2008 में चीन से तल्खी न बढ़े, इस आशंका से यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उसी की तरह '1962 में चीनी दूध के जले भारत ने भी अपनी गुटनिरपेक्षता का हवाला देकर एशियाई महाशक्ति चीन को खम ठोक चुनौती देने वाला नया गुटबंदी प्रस्ताव तब यथासंभव टाल दिया था। लेकिन जैसा जानकार कहते हैं, राजनय में दोस्तियां या दुश्मनियां नहीं, सिर्फ देश का तात्कालिक हित ही स्थायी होता है। इधर, चीन के तेवर भारत की सीमा को लेकर लगातार तेज और आक्रामक हुए हैं। पहले उसने अरुणाचल सीमा पर खटपट की, फिर उत्तराखंड और डोकलाम में सीमा पर गला खंखारा। साथ ही यह कहकर कि कश्मीर मसले पर वह पाकिस्तान के साथ कश्मीरियों पर भारत की दबंगई का विरोध कर सकता है, पश्चिमी सीमा पर पाक से अपनी अनेकमुखी दोस्ती हेकड़ी के साथ रेखांकित की। लिहाजा भारत ने इस बार, जब जापान में दोबारा सत्ता में आए शिंजो आबे के साथ महत्वाकांक्षी योजना पर चर्चा उठी, तो इस बाबत फिलीपींस में होने जा रही पहली चौतरफा बैठक में भागीदारी मंजूर कर ली है।


    एशिया की दूसरी महाशक्ति बन गया भारत अपने निकट सीमावर्ती देशों के बीच भौगोलिक, सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। लिहाजा पाक ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश, सब अमेरिका की पहल पर एशिया में बन रही कहीं भारत की नई धुरी का हिस्सा बनने के गहरे निहितार्थ बनते हैं। गए बरसों में जब-जब भारत के हित वाणिज्य, जल संसाधनों की बंटवार या ऊर्जा सरीखे मुद्दों पर पड़ोसी एशियाई देशों से टकराए, तब-तब जहां तक उसका अपना हित सधता रहा, भारत एक अच्छा मददगार पड़ोसी बनकर इन सभी देशों को कई परियोजनाओं में साझेदार बनाता और धन खर्चता रहा है। लेकिन पड़ोसी देशों की तहत हमारे राजनय की एक पुरानी कमजोरी यह रही है कि भारत की दोस्ती सतत एक ही तरह की गर्माहट नहीं बनाए रखती। अक्सर भारत छोटे दोस्त देशों और वहां जारी जरूरी साझा योजनाओं को तवज्जो या वित्तीय मदद देना कम करता जाता है। जिसका सीधा असर वहां के आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। नेपाल में जब भारी भूकंप आया था तो भारत ने मदद के लिए अपने जो दस्ते पठाए, उनका इसी वजह से नेपाली जनता ने बहुत गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया। जबकि भारत के प्रति उनकी इस बेरुखी का फायदा उठाते हुए चीन तुरंत उनका बंधु सखा बनकर सामने आया और कम मदद करके भी जनता की सराहना बटोर ले गया।


    इसी तरह श्रीलंका में भी 'लिट्टे के खात्मे तक श्रीलंका में बंदरगाह निर्माण को काफी तवज्जो देता रहा भारत, एक बार शत्रु लिट्टे का सफाया हो गया तो श्रीलंका की जरूरतों से फिरंट रहने लगा। कुछेक जगह तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसने अमेरिका के सुर में सुर मिलाकर श्रीलंकाई तमिलों के मानवीय हितों के हनन पर भी श्रीलंका के नेतृत्व को असहज करने वाले सवाल पूछ डाले। इससे वहां असहज माहौल बना और यह भांपकर तुरंत चीनी कंपनियां मैदान में उतरीं और शिथिल पड़े बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों से जुड़ी कई परियोजनाएं उड़ा ले गईं। अब चीन और उसके जहाजी बेड़ों की लंका में बढ़ती उपस्थिति से सशंक भारत फिर कोशिश में है कि वह त्रिंकोमली के बंदरगाह और मत्तला के हवाई पत्तन पर निर्माण का काम हाथ में ले ले। पर यह दोनों योजनाएं अपेक्षाकृत बेशुमार खर्चीली होने के साथ कम महत्व रखती हैं। फिर भूटान का मसला है। सालभर से नन्हा-सा भूटान भी अपनी पनबिजली परियोजनाओं में प्रस्तावित भारतीय साझेदारी और भारत से लिए कर्ज के बढ़ते आकार पर लगातार चिंता जताता रहा। पर जब डोकलाम सीमा पर चीनी सेना की पदचाप बढ़ी और चीन ने भारत विरोधी बयानात दिए, तब भारत के शीर्ष राजनय सलाहकार जयशंकर थिंपू दौड़े गए और हालचाल पूछे। इधर, भारत ने हाल में भूटान नरेश का शाही स्वागत कर अपनी उस बेरुखी की यथासंभव भरपाई करने की कोशिश तो की, लेकिन भूटान में चीन के नर्म राजनय की बढ़ती छवियां देखने वालों की राय में भूटान में भारत की मदद और उसकी मदद से वहां किया जाने वाला बुनियादी जमीनी काम लगातार जारी रहना चाहिए। सीमा के देशों में कब, कौन रूठकर चतुर चीन की गोद में जा बैठेगा, क्या भरोसा? आखिर हमारी ही तरह इन देशों को भी तो अपना राष्ट्रहित देखना है। जभी सयाने 'रहीमबहुत पहले कह गए थे कि, 'रहिमन देख बड़न को लघु न दीजै डारि।


    यह हमारा भ्रम है कि दोस्तों की गर्ज सिर्फ हमको है, हमसे लघुकाय उन दूसरों को नहीं, जिनके हम रिश्ते में बड़े भाई लगते हैं। फिलवक्त चीन के खिलाफ लड़ाकूपन की कई गलियां हमारे आगे खुली हुई हैं। लेकिन चीन ने डोकलाम में दिया अपना अल्टीमेटम अभी के लिए वापस ले लिया है और अरुणाचल में भारत की रक्षा मंत्री के दौरे पर भी सीमित नाराजगी ही जताई है। यानी नाटक आगे बढ़ता, इससे पहले ही उसने पर्दा गिराकर तमाशबीनों से कह दिया कि खेल आज नहीं होगा। उसका लक्ष्य कुछ चेतावनी देकर अपने असली विश्व प्रतिस्पर्द्धी और भारत के अचानक नए हितू बन गए अमेरिका को प्रकारांतर से जताना है कि वह एशिया में कोई चौमुखी धुरी भले ही बनाए, पर मेनलैंड एशिया तथा यूरोप पर उसकी पकड़ कम मजबूत नहीं। इसलिए भारतीय नेतृत्व को फिलहाल संतुलन का प्रदर्शन करते हुए अमेरिकी नेतृत्व के अंगने में आत्मप्रचार और जनसंपर्क साधते हुए खुद को उसका जिगरी दोस्त बनाने का मोह त्यागकर अपने एशियाई हित स्वार्थों की अधिक फिक्र करनी होगी। सह्रदय पड़ोसियों की जरूरत हमको हमेशा ज्यादा रही है और ग्लोबल तंगी बढ़ने पर और भी होगी।


    आमतौर से घरघुसरू ट्रंप फिलवक्त अगर येन-केन एशिया की यात्रा पर निकले हैं तो इसकी असल वजह विभिन्न् क्षत्रपों से उनकी बातचीत पर जारी संयुक्त विज्ञप्ति हमको यह नहीं बताएगी कि लड़खड़ाते यूरोप से लेकर एशिया तक चीन भारी किलेबंदी कर चुका है। खुद अमेरिका की अर्थव्यवस्था की कुंडली में भी चीन भारी कारक ग्रह बना हुआ है, लिहाजा दोनों से कोई सीधी टकराहट मोल लेना नहीं चाहेगा। इन दोनों से सीखने लायक यदि आज कुछ है तो वह है खुले युद्ध से परहेज और सीमित निशानेबाजी। और हां, उस उन्मादी किस्म की सार्वजनिक बयानबाजी पर अविलंब रोक, जो हमको ताकतवर कम, दयनीय अधिक बनाती है।


    (लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं)

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