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    आलेख : यही है सरकारी तंत्र का सच - मृणाल पांडे

    Published: Fri, 19 May 2017 08:10 PM (IST) | Updated: Sat, 20 May 2017 04:01 AM (IST)
    By: Editorial Team
    pm-modi 650 19 05 2017

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दिनांक 18 अगस्त, 2015 को (बिहार विधानसभा चुनाव की पूर्वसंध्या पर अपनी पार्टी भाजपा के लिए चुनाव प्रचार के दौरान) आरा में अपने भाषण से अभिभूत जनता को यह घोषणा कर और भी अभिभूत कर दिया था कि इस पिछड़े राज्य की प्रगति के लिए केंद्र से एक विशेष पैकेज मिलेगा, जो आम उम्मीद से कहीं अधिक पचास हजार करोड़ या साठ हजार करोड अथवा अस्सी हजार करोड़ नहीं, बल्कि पूरे सवा लाख करोड़ का होगा। तब से लेकर अब तक गंगा में काफी पानी बह गया, किंतु बिहार को पैकेज नहीं मिला। अंतत: राज्य के एक नागरिक मुहम्मद इकबाल अंसारी ने जब राज्यों की केंद्रीय नीति निर्धारक इकाई, नीति आयोग से सूचना के अधिकार की तहत इस वादे के क्रियान्वयन की बाबत जानकारी मांगी, तो उनको जवाब मिला कि आयोग के वित्तीय संसाधन विभाग के पास तो आज तक इस खास पैकेज की बाबत कोई सूचना या निर्देश नहीं पहुंचे हैं।


    यह काफी विस्मयकारी है, चिंताजनक तो है ही कि आखिर केंद्र सरकार के मुखिया द्वारा प्रस्तावित जिस कदम की घोषणा के विषय में बाकायदा सरकारी नोट जारी किया गया हो और जिसकी बाबत खुद प्रधानमंत्री ने अपने लोकप्रिय रेडियो प्रसारण (मन की बात) में भी देशवासियों से चर्चा की हो, उसके विषय में नीति आयोग के पास अब तक कोई औपचारिक सूचना तक ना हो। वैसे भाजपा नेता तथा बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि इसमें अचरज की कोई बात नहीं। इस खास पैकेज की निगरानी चूंकि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का एक प्रकोष्ठ कर रहा है, लिहाजा जरूरी नहीं कि उसकी बाबत नीति आयोग को अलग से जानकारी मुहैया कराई जाए। फिर भी अगर बात निकली है तो दूर तलक जाएगी ही। सवाल यह नहीं है कि सबका साथ सबका विकास चाहने वाले प्रधानमंत्री जी के कार्यालय ने इस महत्वपूर्ण पैकेज को खुद अपनी निगरानी में ले लिया है। उस दफ्तर की ताकत को देखते हुए यह एक तरह से उचित ही है। लेकिन यह बात जरूर अचंभे में डालती है कि सरकार बहादुर ने बिहार सरीखे जटिल राज्य को किस तरह के संसाधन चाहिए और किस मात्रा में दिए जाएं, इस बाबत देश के बेहतरीन वरिष्ठ समाजशास्त्रियों और आर्थिक विशेषज्ञों के तालाब, नीति आयोग से किसी किस्म की मदद लेने की बात क्यों नहीं सोची होगी?


    हाल ही में केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने एक खास समारोह में प्रतिस्पर्द्धा, सच्चाई तथा शक्ति(कॉम्पीटेंस, ट्रुथ एंड पावर) विषय पर बोलते हुए सरकारी तंत्र की एक महत्वपूर्ण सच्चाई को रेखांकित किया। उनके अनुसार हमारे देश के अकादमिक तथा विशेषज्ञ सरकार में बैठे हों या रिजर्व बैंक सरीखी किसी शीर्ष स्वायत्त सरकारी इकाई में, विवादित विषयों पर महत्वपूर्ण फैसलों से पहले सरकार के साथ ईमानदार तटस्थ विश्लेषण साझा करने से कतराते हैं। वे हर विषय पर पहले इस उस तरह से सरकार का रुख भांपकर, अपनी आपत्तियां निगलकर वही कह देते हैं जो उनको लगता है कि सरकार सुनना चाहती है। और जब योजना विशेष की औपचारिक घोषणा के बाद उसके लागू होने का समय आए और उसकी अपेक्षित खामियां उजागर होने लगें, तो भी वे उन पर सुधार की मांग करने के बजाय सरकारी फैसले को सही ठहराने में जुट जाते हैं। मानो उनका काम सरकार को वाजिब सलाह देना नहीं, बल्कि यथास्थिति को येन-केन सही ठहराना हो।


    गए दिनों अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया सरीखे अमीर देशों ने, जो बड़ी तादाद में भारतीय ई-जगत को रोजगार देते रहे हैं, घरेलू बेरोजगारी कम करने को बाहरियों के लिए अपने रोजगार वीजा नियम बदलकर कई भारतीय ई-संस्थानों को भारी छंटनियों के लिए बाध्य किया है। उधर रोबोटिक्स के विकास से भी मानव श्रम की मांग लगातार घट रही है। इसके फलादेश हमारे लिए ठीक नहीं हैं। देश के उद्योग जगत की जानी-मानी संस्था, फिक्की ने इस सबसे बेरोजगारी गहराने पर एक बैठक आयोजित की थी। एक बड़े अंग्रेजी अखबार के विशेष संवाददाता की रपट के अनुसार नीति आयोग के वरिष्ठ सदस्य व ख्यात अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय ने अपने भाषण में स्वीकार किया कि बेरोजगारी कम करने की दिशा में पिछले एक साल से कोई सार्थक बदलाव नहीं लाया जा सका है। यह दु:खद किंतु सच है कि जिस तादाद में रोजगार बाजार में हर साल युवा उतर रहे हैं, उसके लिए एक से सवा करोड़ तक नई नौकरियों का बनना जरूरी है, जबकि श्रम विभाग के आंकडों के अनुसार बन पा रही हैं मात्र 10 लाख के आस-पास। पर फिर श्री देबरॉय यह बचाऊ स्थापना देते हैं कि दरअसल देश के अधिकतर लोग असंगठित क्षेत्र में रोजगाररत हैं। इसलिए सरकार के श्रम मंत्रालय के पास उनकी बाबत डाटा उपलब्ध नहीं है। छंटनी प्रभावित लोग असंगठित क्षेत्र की तरफ रुख करते हैं, पर उनकी बाबत यदि व्यवस्थित किस्म की जानकारी चाहिए तो वह तो सरकारी जनगणना रपटों तथा घरेलू सर्वेक्षणों (जिस पर नवीनतम डाटा 2012 तक का है और अगली खेप 2018 में ही मिलेगी) से ही निकल सकती है। और श्रम विभाग के पास संगठित क्षेत्र की बाबत जो डाटा है भी, उसका नमूने (सैंपल) का आकार तथा डिजाइन कुछ कमियों के कारण अपर्याप्त जानकारी दे पाते हैं। तो क्या हम यह समझें कि सरकार इधर जो बेरोजगारी मिटाने की खातिर बड़ी-बड़ी नीतियां बनाती रही है, उनके वैज्ञानिक तथा सही आकलन को जरूरी बुनियादी डाटा उसके पास नहीं है?


    श्री देबरॉय यहां पर एक अन्य चकित करने वाली बात और कहते हैं कि हमारे देश में स्वैच्छिक बेरोजगारी बढ रही है। बेरोजगारी और स्वैच्छिक? इस पर उनका मानना है कि लोगों की महत्वाकांक्षा बढ़ रही है और पहले की तुलना में पारिवारिक आमदनी भी। ऐसे कई लोग जो कॉलेज की डिग्री रखते हैं, कम तनख्वाह वाले छोटे-मोटे असंगठित क्षेत्र के काम पकड़ने से कतराते हैं। कई परिवारों में आमदनी बढ़ने से महिलाएं खुद घर बैठना पसंद कर रही हैं। अलबत्ता यह सारे तथ्य एनेक्डोटल (सुनी-सुनाई बातों) पर आधारित हैं।

    यह सब पढ़-सुनकर लगता है कि बेरोजगारी यदि भारत का स्थायी भाग्य है और इस देश के बेरोजगार युवा असंगठित क्षेत्र निरपेक्ष ही बने रहेंगे, तो फिर कोई सरकार गरीब राज्यों के लिए अनुत्पादक नौकरियां बांटने का काम हाथ में कैसे ले?


    नेता के तपोबल मात्र से किसी जादुई कालीन पर सबको एक साथ बिठाकर सबके विकास की गारंटी देने वाले स्वर्ग की तरफ उड़ा जा सके, वह निगोड़ी सुबह कब आएगी?

    (लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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