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    आदिवासी स्त्रियों का शोषण रोकने सुरक्षा कवच जरूरी - रमेश नैयर

    Published: Thu, 12 Jan 2017 11:00 PM (IST) | Updated: Fri, 13 Jan 2017 12:30 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    ढाई-तीन दशक से मनुष्यों का आखेट क्षेत्र बने हुए बस्तर के अनेक अप्रिय सच सामने आने लगे हैं। बस्तर की वे अल्हड़ युवतियां, जो घने जंगल में मुक्त विचरण करते हुए शेर और भेड़िये से भी नहीं डरा करती थीं, अब दो पैरों वाले नृशंस पशुओं की छाया से भी थरथराने लगी हैं। कटु सत्य यह है कि वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। बालिका छात्रावासों में शिक्षकों और अन्य पुरुष-कर्मियों द्वारा बच्चियों के यौन उत्पीड़न और उनके गर्भवती हो जाने की घटनाएं भी राष्ट्रीय स्तर तक चर्चित हुई हैं। वाम चरमपंथियों द्वारा उनके देह शोषण की खबरें अक्सर आती रहती हैं। उनके चंगुल से निकलकर वे पुलिस और समाज के सामने अपनी व्यथा दर्ज कराने का साहस भी जुटाती हैं, परंतु पुलिस और अर्धसैनिक बल जब स्वयं उनके साथ दुष्कर्म करने लगें तो वे कहां जाए? हो तो ये सब कुछ मुद्दत से रहा है, परंतु पिछले कुछ वर्षों में मानवाधिकार के हनन की निगहबानी करने वाले कुछ व्यक्तियों, संगठनों द्वारा उनकी यातना शासन-प्रशासन व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने रखी जाने लगी हैं।


    इधर, इस प्रकार यौन उत्पीड़ित 37 महिलाओं ने साहस जुटाकर राष्ट्रीय मानवाधिकार के सामने पुलिस के दुष्कर्मों की जो शिकायत की थी, उसका संज्ञान लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम ने बीजापुर जिले के उस क्षेत्र का प्रत्यक्ष अवलोकन किया, जहां स्त्रियां सन् 2015 में सुरक्षाकर्मियों की वासना की शिकार हुई थीं। दल द्वारा जुटाए साक्ष्य के आधार पर आयोग ने राज्य शासन को अपनी चिंता से अवगत कराया। अब राज्य सरकार का दायित्व है कि वह दोषी सुरक्षाकर्मियों के विरुद्ध तत्परता से कार्रवाई करे।


    राज्य का मीडिया, स्वयंसेवी संगठन व सामाजिक कार्यकर्ता बार-बार कहते आ रहे हैं कि बस्तर में महिलाओं और निर्दोष आदिवासियों पर सुरक्षा कर्मियों का कहर टूटता रहता है। निश्चय ही ये हमारी व्यवस्था के अप्रिय सत्य का सुलगता पहलू है। परंतु इसका दूसरा पहलू भी उतना ही चिंताजनक है। वह है सुरक्षा कर्मियों की आहत संवेदनाओं का। उन पर चरम वामपंथी अथवा नक्सली अक्सर घात लगाकर हमले करते हैं। सरेबाजार इक्का-दुक्का सुरक्षाकर्मी को घेरकर मार दिया जाता है। बस में यात्रा करते समय भी वे सुरक्षित नहीं। नक्सली उन्हें सरेराह बाहर खींचकर गोलियों से भून डालते हैं। घने वनों की तन्हाई और लंबे समय तक परिवारों से दूर रहने को अभिशप्त सुरक्षाकर्मी अवसाद जैसे अनेक मनोविकारों से भी ग्रस्त पाए जाते हैं। जीवन का एक-एक पल उनके लिए असहनीय यातना बन जाता है। परिणाम स्वरूप वे अपने ही हथियारों से अपना जीवन ले लेते हैं। इसी सप्ताह के आरंभ में कांकेर जिले में पदस्थ कन्याकुमारी के एक जवान ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से आत्महत्या कर ली। अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बन पाई है कि एक निश्चित अवधि तक ऐसे बीहड़ क्षेत्रों में पदस्थापना के पश्चात उन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों में तैनात किया जाए और उनके स्थान पर नए लोगों को वहां कुछ वर्षों के लिए रखा जाए।


    इन विसंगतियों और विवशताओं के बीच भी सुरक्षाकर्मियों से अपेक्षा की जाती है कि वे स्त्रियों, बच्चों व आम आदिवासियों के प्रति मनुजता का व्यवहार करें। बस्तर को भीतर-बाहर से जानने-समझने वालों का अनुभव है कि स्त्री यहां कभी भी बाहरी लोगों की वासना से मुक्त नहीं रही। शासकीय कर्मचारी, ठेकेदार, व्यापारी व पर्यटक भी उन्हें भोग की वस्तु ही मानते रहे। परंतु तब ऐसे प्रशासक भी थे, जो इस प्रकार के अपराधियों की खबर लेने से गुरेज नहीं करते थे। 1970 के दशक का एक उदाहारण है कि बस्तर में अधिकारियों-कर्मचारियों ने आदिवासी युवतियों को अपने घरों में रख लिया था। उनसे अवैध संबंधों के कारण अनेक बच्चे भी पैदा हुए थे। जब उनको बेसहारा छोड़ दिया तब तत्कालीन कलेक्टर डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने उन सबको सामूहिक विवाह के लिए बाध्य कर उन आदिवासी युवतियों और उनकी संतान के पुनर्वास की व्यवस्था की थी। क्या वर्तमान शासन-प्रशासन ऐसी मानवीय संवेदना का परिचय देने के लिए सामने आना चाहेगा?


    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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