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    आलेख : अदालती फैसले से उपजे सवाल - एनके सिंह

    Published: Fri, 21 Apr 2017 08:15 PM (IST) | Updated: Sat, 22 Apr 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    joshi-advani-story 21 04 2017

    अयोध्या के विवादास्पद ढांचे को गिराए जाने के 25 साल बाद सर्वोच्च अदालत के हालिया फैसले ने कुछ नए प्रश्नों को जन्म दिया है। अदालत ने कहा कि इस मामले में दायर दो एफआईआर (एक कारसेवकों के खिलाफ और दूसरी 21 बड़े नेताओं के विरुद्ध) के मामलों में संयुक्त रूप से समयबद्ध तरीके से दो साल के अंदर सुनवाई कर फैसला दिया जाए और तब तक मामले की सुनवाई करने वाले जज का तबादला न हो। इस फैसले का तात्पर्य यह है कि भारतीय जनता पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी (89 वर्ष) और पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी (83 वर्ष) समेत कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ ढांचा गिराने की साजिश का मुकदमा लखनऊ की अदालत में फिर से शुरू होगा। और साथ ही अभियुक्त यदि चाहें तो सभी 656 गवाहों से फिर से जिरह की जा सकती है। अदालत के पास मात्र 564 कार्यदिवस हैं।


    सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद पहला सवाल तो यही उठता है कि क्या अब आडवाणी राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनने के लिए योग्य रहेंगे या क्या उन्हें प्रत्याशी बनाया जाना चाहिए? दूसरा सवाल, धार्मिक-राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों को लेकर किसी राजनेता के बयानों से उपजे जनांदोलन की परिणति के आधार पर क्या साजिश के अंश देखना या अपराध-शास्त्र के 'मेंस रिया के सिद्धांत के तहत दोष के अंश (कल्पेबिलिटी) निर्धारित करना आसान होगा? तीसरा, क्या घटना के 25 साल बाद गवाहों को ठीक-ठीक याद होगा कि उन्होंने वास्तव में क्या देखा था और पिछली (15 साल पहले) जिरह में क्या कहा था? चौथा सवाल, क्या सुप्रीम कोर्ट को वर्ष 2002 और 2007 में इसी अदालत द्वारा लिए गए फैसले को देखने की जरूरत नहीं थी, जिसमें इसी अदालत ने दोनों मामलों को संयुक्त रूप से लखनऊ में सुने जाने की याचिका को खारिज करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को बहाल रखा था और वह भी तीनसदस्यीय बेंच द्वारा? पांचवा सवाल, (यह न्यायिक प्रक्रिया में नैतिकता का ज्यादा है, कानून का कम) कि पिछले 25 सालों में अदालतें और अभियोजन संस्थाएं ढिलाई करती रहीं, लिहाजा इन 21 नेताओं में (जिनके खिलाफ रायबरेली की अदालत में मुकदमा चल रहा था) से आठ मर चुके हैं और 13 जीवित हैं और इनमें से एक के खिलाफ इसलिए मुकदमा नहीं चल सकता कि वह वर्तमान में राज्यपाल है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस फैसले में पैरा 19 में न्याय का एक सिद्धांत उद्धृत किया है, जिसके तहत कहा गया है कि 'चाहे आसमान गिर जाए, लेकिन न्याय किया जाना चाहिए। ऐसे में एक अहम सवाल यह भी उठता है कि इसी अदालत की बड़ी बेंच द्वारा इस फैसले से इतर फैसला दिया जाना (वर्ष 2002 और वर्ष 2007) क्या इस सिद्धांत से परे था?


    उल्लेखनीय है कि हमारे देश में केवल दो पद ऐसे हैं, जिन पर आसीन होने से पहले व्यक्ति संविधान के अभिरक्षण, परिरक्षण व संरक्षण की शपथ लेता है। ये दो पद हैं - राष्ट्रपति और राज्यपाल। अन्य सभी यहां तक कि प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, देश के मुख्य-न्यायाधीश संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं। कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेदों के तहत बनाए गए कानूनों का अगर उल्लंघन करने का आरोपी है, तो जरा सोचिए कि वह उस संविधान की रक्षा की शपथ कैसे ले सकता है? यही कारण है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं को पलीता लग गया है।


    इसमें कोई दोराय नहीं कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से न केवल न्याय के इस मंदिर के प्रति जनता का विश्वास बढ़ा है, बल्कि इस फैसले ने कानून की दुनिया में चर्चित यह ब्रह्म वाक्य भी सत्य साबित किया कि 'चाहे आप कितने भी ऊपर हों, कानून आप से ऊपर रहेगा। इस फैसले के बाद अब लखनऊ में सीबीआई की अदालत एफआईआर संख्या 197 और 198 (पहली, सभी कारसेवकों के खिलाफ और दूसरी, 21 विशिष्ठ व्यक्तियों के खिलाफ, जिनमें आठ मर चुके हैं) पर एक साथ सुनवाई करेगी। साथ ही, दुनिया में अपराध न्यायशास्त्र के लिए सीबीआई कोर्ट का भावी फैसला एक नया आयाम होगा।

    इसमें दोमत नहीं कि 6 दिसंबर, 1992 की प्रस्तावित कार सेवा के पूर्व देश के हिंदुओं में राम मंदिर को लेकर एक जबर्दस्त उन्माद पैदा किया गया था। यह भी सच है कि आडवाणी, जोशी ने राममंदिर निर्माण को लेकर देशभर में यात्राएं निकाली थी। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के तत्कालीन भाषणों ने इस उन्माद को हवा देने का काम किया था। अदालत के सामने ये सारे प्रश्न होंगे। पर मूल प्रश्न तो यही होगा कि क्या विवादास्पद ढांचा गिराए जाने में इन आरोपियों की साजिश के स्तर पर भी कोई संलिप्तता थी? इन नेताओं पर मुकदमा आईपीसी की धारा 120(बी) के तहत है अर्थात इन पर आपराधिक साजिश रचने का आरोप है।


    यह बात स्पष्ट है (और जिसका जिक्र वर्तमान फैसले में किया भी गया है) कि हाई कोर्ट ने तकनीकी आधार पर दोनों मामलों को एक साथ चलाने की राज्य सरकार की दूसरी अधिसूचना खारिज की थी, क्योंकि सरकार ने इस अधिसूचना के लिए हाई कोर्ट की सहमति नहीं ली थी। लेकिन फिर अगर अगले चार से छह सालों में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका ही नहीं, क्यूरेटिव याचिका के दौरान भी हाई कोर्ट के आदेश को बहाल रखा तो आरोपी इसका खामियाजा भुगतें, क्या यह न्यायोचित है?


    इस फैसले के तत्काल बाद केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रधानमंत्री के आवास पर बैठा और यह फैसला लिया गया कि इन बुजुर्ग नेताओं को मुकदमा लड़ना चाहिए और उनके बेदाग निकलने की कोशिश की जानी चाहिए। अब जबकि दो साल में फैसला आएगा (चाहे वह जो भी हो) तो पार्टी को 2019 के चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ मिलना तय लगता है। यह अलग बात है कि यदि विशेष अदालत से सजा होती भी है, तो इसकी अपील फिर हाई कोर्ट में हो सकती है, लेकिन भारतीय समाज के एक संप्रदाय विशेष में इन नेताओं के प्रति और साथ ही पार्टी के प्रति सहानुभूति तो रहेगी ही।


    एक प्रश्न और भी अनुत्तरित रहेगा और वह यह कि दो साल बाद कल्याण सिंह जब कभी राज्यपाल के पद से हटेंगे और उन पर मुकदमा चलने की राह खुलेगी, तो क्या वो भी ये अपेक्षा नहीं करेंगे कि सभी गवाहों से फिर से जिरह हो जो उनका मौलिक अधिकार है? और तब क्या एक ही मामले में तीन बार गवाहों से जिरह (और वह भी लगभग 30 साल बाद) करना उपयुक्त होगा?


    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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