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    संपादकीय : सतत तनाव बढ़ाता चीन

    Published: Wed, 19 Apr 2017 11:01 PM (IST) | Updated: Thu, 20 Apr 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    चीन फिर अपने कुटिल इरादों पर उतर आया है। उसने फिर चाल चली है। वहां इसे भारत को 'करारा जवाब देना बताया गया है। हाल में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को भारत ने अरुणाचल प्रदेश जाने की इजाजत दी, तो अब चीन ने उस भारतीय क्षेत्र पर अपना दावा जताने का दांव खेला है। अरुणाचल को वह 'दक्षिण तिब्बत कहता है और पूरे प्रदेश को अपना बताता है। अब उसने इस प्रदेश में स्थित छह स्थानों के नाम का 'प्रमाणीकरण किया है। यानी उन जगहों के नाम चीनी (मैंड्रिन), तिब्बती और रोमन लिपियों में कैसे लिखे जाएंगे, उसकी सूची जारी की है। मकसद क्या है, इसका खुलेआम एलान किया गया है। चीन के सरकारी मीडिया ने कहा कि ये कदम 'दक्षिण तिब्बत पर अपनी 'प्रादेशिक संप्रभुता को दोहराने के लिए उठाया गया। चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक प्राचीन काल में इन स्थानों को जिस रूप में जाना जाता था, वही नाम उन्हें फिर से दिए गए हैं। स्पष्ट है कि अब आगे जब कभी भारत से सीमा वार्ता होगी, तो इन नामों का उल्लेख कर चीन उस पूरे प्रदेश को अपना बताएगा। दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता के 19 दौर हो चुके हैं। 2005 तक इसमें प्रगति होती दिखती थी। तब सीमा विवाद हल करने की राजनीतिक कसौटियां तय हो गई थीं। इनमें एक प्रमुख सहमति थी कि अगर कुछ इलाकों की अदला-बदली जरूरी हुई, तो उसमें उन क्षेत्रों को नहीं छेड़ा जाएगा, जहां आबादियां बसी हुई हैं। उस मानदंड के मुताबिक हर व्यावहारिक रूप में अरुणाचल पर चीन का दावा खत्म हो गया, हालांकि सैद्धांतिक तौर पर ये बात उसने स्वीकार नहीं की थी। 2008 से दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ने लगा।


    अब साफ है कि भारत-चीन संबंध खासे तनावपूर्ण हो चुके हैं। इसका इजहार कई रूपों में हो रहा है। चीन ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान में अड्डा जमाए आतंकवादियों को संरक्षण दे रखा है, तो जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान कब्जे वाले हिस्से में वह आर्थिक कॉरिडोर भी बना रहा है। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता रोकना भी इसी सिलसिले की कड़ी है। अफगानिस्तान के मुद्दे पर वह रूस और पाकिस्तान को साथ लेकर अलग धुरी बनाने में जुटा है।


    साफ तौर पर ये सारा घटनाक्रम भारत के लिए बड़ी चुनौती है। एनडीए सरकार इसका सामना करने अथवा चीन को माकूल जवाब देने के लिए आगे क्या कदम उठाती है, इस पर निगाहें टिकी रहेंगी। नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी सख्त विदेश नीति के तहत चीन के आगे ना दबने की रणनीति अपनाई है। उधर अपनी आर्थिक एवं सामरिक शक्तियों का उपयोग करते हुए चीन भारत को आस-पड़ोस में अलग-थलग करने या घेरने की नीति पर चल रहा है। क्या इस टकराव का कूटनीतिक समाधान ढूंढ़ा जाना चाहिए? या चीन का गुरूर तोड़ने की मौजूदा नीतियां दीर्घकाल में बेहतर परिणाम देंगी? आशा है, अपने देश के हितों को सर्वोच्च एवं सर्वप्रथम रखते हुए भारत सरकार इस बारे में उचित निर्णय लेगी।

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