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    संपादकीय : कर्तव्य-पालन की कीमत!

    Published: Mon, 17 Jul 2017 10:42 PM (IST) | Updated: Tue, 18 Jul 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team
    dig-d-roopa 17 07 2017

    अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करने वाले अफसर सरकार को नहीं भाते। ऐसी कई मिसालें हैं, जब अफसरों को कर्तव्य-परायणता की कीमत चुकानी पड़ी। ताजा मिसाल आईपीएस अधिकारी डी. रूपा हैं। उन्होंने कर्नाटक की एक जेल में बंद अन्न्ाद्रमुक नेता वीके शशिकला को कथित खास सुविधाएं दिए जाने का खुलासा किया। दरअसल, डी. रूपा ने जो बातें सार्वजनिक कीं, उससे बेंगलुरु सेंट्रल जेल में बड़े पैमाने पर जारी भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का पदार्फाश हुआ। इससे खफा कर्नाटक सरकार की गाज अब उन पर गिरी है। उन्हें डीआईजी (कारागार) पद से हटा दिया गया है। उनकी तरह ही हाल में दो अन्य महिला अधिकारियों को भी फर्ज निभाने का दंड भुगतना पड़ा। उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर की पुलिस अधिकारी श्रेष्ठा ठाकुर ने ट्रैफिक नियम तोड़ने के आरोप में कुछ भाजपा नेताओं पर जुर्माना लगाया। इससे तिलमिलाए स्थानीय नेताओं ने उनकी शिकायत राज्य सरकार से की। और कुछ दिनों के अंदर ठाकुर का तबादला कर दिया गया। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में तैनात रहीं तहसीलदार अमिता सिंह की कहानी तो और भी ध्यान देने योग्य है। हाल में उनका 13 साल की नौकरी में 25वीं बार तबादला हुआ। लेकिन इस बार वे चुप नहीं रहीं। प्रधानमंत्री को ट्वीट कर इसके खिलाफ आवाज उठाई। ये तीन हालिया मिसालें हैं। लेकिन कुछ पीछे जाकर देखें, तो ऐसे मामलों की गिनती करना मुश्किल हो जाएगा। यहां रॉबर्ट वाड्रा जमीन मामले की जांच कर चुके आईएएस अशोक खेमका का खास उल्लेख हो सकता है, जिनके 23-24 साल के कॅरियर में 45 बार तबादले हुए। इसी तरह उप्र के पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर 24 साल में 24 तबादले झेल चुके हैं।


    ये मिसालें बताती हैं कि ईमानदार अधिकारी अमूमन सत्ताधारियों को रास नहीं आते। इन अफसरों की कार्यशैली का असर अनेक निहित स्वार्थों पर पड़ता है। तब ये तत्व लामबंद होते हैं। चूंकि सत्ताधारी अक्सर ऐसे तत्वों के प्रभाव में होते हैं, अत: ईमानदार अफसरों की बलि चढ़ा दी जाती है। बार-बार तबादलों से सत्ताधारी नेता नौकरशाही को अपना सेवक बनाए रखने की कोशिश भी करते रहे हैं। चूंकि तबादलों से किसी सेवा-शर्त का उल्लंघन नहीं होता, सो अधिकारी लाचार बने रहते हैं। पर आम प्रशासन पर इसका बहुत खराब असर हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार अफसरों से निर्भय होकर अपना दायित्व निभाने का आह्वान किया है। किंतु ताजा घटनाओं से साफ है कि कम-से-कम राज्यों में इसके लिए अनुकूल स्थितियां नहीं हैं। तो बड़ा सवाल है कि क्या किया जाए? स्पष्टत: ऐसे प्रशासनिक सुधार अपरिहार्य हो गए हैं जिनसे नौकरशाही राजनेताओं के मनमाने व्यवहार से मुक्त हो सके। लोकतंत्र में नौकरशाहों से निष्पक्ष व निर्भय आचरण की अपेक्षा की जाती है। अत: अब ऐसे कायदे जरूर कायम किए जाएं, जिससे सरकारों की मनमानी रुके। तभी नौकरशाह संवैधानिक भावना एवं अपेक्षाओं के मुताबिक अपना कर्तव्य निभा सकेंगे।

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