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    संपादकीय : पराजितों का स्यापा

    Published: Wed, 15 Mar 2017 09:47 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Mar 2017 12:30 AM (IST)
    By: Editorial Team
    kejri and maya 15 03 2017

    संदेह मायावती ने उठाया। जल्द ही कई दूसरे विपक्षी दलों ने सुर मिलाया। फिर सोशल मीडिया के इस दौर में किसी अपुष्ट बात को बहुचर्चित कर देना कठिन नहीं है। तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल फैला दिए गए। मंगलवार को दिल्ल्ी नगर निगम के चुनाव कार्यक्रम का एलान हुआ। लेकिन उसके पहले ही यहां सत्ताधारी 'आप के साथ-साथ कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग को पत्र लिख मतपत्रों के जरिए मतदान कराने की मांग कर दी। बुधवार को 'आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि पंजाब में उनकी पार्टी को पड़े 20-25 फीसदी वोट अकाली दल को ट्रांसफर हो गए। गुजरे शनिवार को उत्तर प्रदेश में वोटिंग मशीनों से भाजपा की प्रचंड जीत निकलने के फौरन बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ईवीएम्स में धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। जब ये मुद्दा वहां के निवर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने रखा गया, तो उन्होंने कहा - 'जब आरोप लगा है, तो जांच होनी चाहिए। यानी उन्होंने ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया।


    फिलहाल भाजपा नेताओं ने ऐसे बयानों को पराजित नेताओं की हताशा बताया है। मगर अब ईवीएम के खिलाफ मुहिम चला रहे नेता इसका जवाब यह कहकर दे रहे हैं कि इन मशीनों पर सबसे पहले सवाल भाजपा ने ही उठाया था। 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उसके नेताओं ने दलील दी कि वोटिंग मशीनों में हेरफेर संभव है। इस बारे में भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने पुस्तिका लिखी थी। तब ये मुद्दा भारतीय निर्वाचन आयोग और न्ययापालिका तक पहुंचा था। ये स्थिति अपने राजनीतिक दलों में मौजूद अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों की झलक है। स्वस्थ लोकतंत्र वो होता है, जहां अपने लिए जनादेश जुटाने में विफल रहे दल सहजता से अपनी हार स्वीकार करते हैं। जम्हूरियत की कामयाबी चुनाव प्रक्रिया की साख पर निर्भर है। यह संदिग्ध हो जाए, तो जनतंत्र नहीं चल सकता। इसकी मिसाल बांग्लादेश सहित कई अन्य देश हैं। इसके उलट भारत की चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता संदेह से परे रही है। बल्कि इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा है। उल्लेखनीय है कि निर्वाचन आयोग इससे इनकार नहीं करता कि वोटिंग मशीनों में हेरफेर संभव है। लेकिन उसका भरोसा अपनी प्रक्रिया पर है, जिसे वह अभेद्य मानता है। इसे और दुरुस्त बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम में दर्ज हुए वोटों के कागजी सबूत रखने का निर्देश दिया था। इसे कई जगहों पर आजमाया भी गया। बेहतर होगा कि आगे से इसे सभी चुनाव क्षेत्रों में लागू किया जाए, ताकि पराजित पक्षों को संदेह उठाने का मौका ना मिले।


    यह तो तय है कि भारत मतपत्रों की तरफ लौटने का प्रतिगामी कदम नहीं उठा सकता। तो अपेक्षित यही है कि सियासी पार्टियां इसकी वकालत ना करें। वे बिना साक्ष्य के आरोप ना लगाएं। हार स्वीकार करने की विनम्रता उन्हें दिखाना चाहिए, ताकि हमारा लोकतंत्र अक्षुण्ण एवं बेदाग बना रहे।

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