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    संपादकीय : जानलेवा होती हवा

    Published: Wed, 15 Feb 2017 11:39 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Feb 2017 12:30 AM (IST)
    By: Editorial Team
    air pollution1 15 02 2017

    हमारा वातावरण प्रदूषित है, इससे तो हम सभी परिचित हैं। मगर हमारी हवा किस हद तक जानलेवा हो गई है, इसकी तरफ ध्यान एक अमेरिकी संस्था की ताजा अध्ययन रिपोर्ट ने खींचा है। यह गहरे अफसोस की बात है कि ऐसी स्थितियां अपने देश में ना तो राजनीतिक मुद्दा बनती हैं और ना ही मीडिया की चर्चा में प्रमुखता पाती हैं। कभीकभार गैर-सरकारी संस्थाओं के अध्ययन से चिंताजनक तथ्य सामने आते भी हैं, तो उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसलिए ये आशंका गहरी है कि भयावह होते वायु प्रदूषण के संबंध में सामने आई ताजा जानकारी भी आई-गई हो जाएगी।


    ऐसी लापरवाहियों के कारण हालत इतनी खतरनाक हो गई है कि दुनिया में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में एक चौथाई हिस्सा भारत का हो गया है। अमेरिकी संस्थान हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआई) के एक शोध के मुताबिक दुनिया में वायु प्रदूषण के चलते 2015 में तकरीबन 42 लाख लोगों की जान गई। इनमें से 11 लाख भारत के और लगभग इतने ही चीन के थे। एचईआई ने बताया है कि दुनिया की करीब 92 फीसदी आबादी प्रदूषित हवा में सांस ले रही है और वायु प्रदूषण दुनिया में मौत का पांचवां सबसे बड़ा कारण बन चुका है।


    चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच इस पर आम सहमति है कि वायु प्रदूषण से कैंसर, हृदय रोग और श्वास संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। अध्ययन रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि जहां चीन अब इस समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठा रहा है, वहीं भारत में इसको लेकर पर्याप्त जागरूकता का अभी अभाव है। नतीजतन, हालात बिगड़ रहे हैं। रिपोर्ट में उचित ही इस पर हैरत जताई गई है कि वायु प्रदूषण के खतरों के तमाम साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद भारत में राजनेता और मंत्री यह कहते सुने जाते हैं कि प्रदूषित हवा और मृत्युदर के बीच कोई संबंध नहीं है। जब ये नजरिया हो, तो जाहिर है कि समस्या से निपटने की यथोचित पहल नहीं हो सकती।


    हालांकि भारत में प्रदूषण रोकने तथा पर्यावरण संरक्षण के अनेक कानून बनाए गए हैं, लेकिन इन पर अमल लचर है। सरकारी स्तर पर लापरवाही के कारण प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी न्यायपालिका को अपने कंधों पर लेनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल इस मकसद से बनाया। मगर उसके आदेशों पर अमल भी सरकारी तंत्र को ही करना होता है। उसमें फैले भ्रष्टाचार तथा लापरवाही के कारण न्यायिक आदेशों को उनकी भावना के अनुरूप लागू नहीं किया जाता। इसी का परिणाम है कि हमारी पवित्र नदियां भी गंदी हो चुकी हैं। उद्योग क्षेत्रों एंव पर्यटन स्थलों पर पर्यावरण संरक्षण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है। मगर ये नजरिया अब घातक हो गया है। इसके बावजूद ये समस्या उपेक्षित बनी रही तो यही माना जाएगा कि भारत में मनुष्य की जान एवं स्वास्थ्य का कोई मोल नहीं समझा जाता। क्या हमारी सरकारों और सिविल सोसायटी की नींद ताजा रिपोर्ट से टूटेगी?

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