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    संपादकीय : आम-सहमति की कोशिशें

    Published: Fri, 16 Jun 2017 08:12 PM (IST) | Updated: Sat, 17 Jun 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    rajnath sonia 16 06 2017

    राष्ट्रीय जीवन के कुछ पहलुओं को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा जाए और सत्ताधारी दल उन पर आम-सहमति से निर्णय लेने की पहल करे, तो निश्चित ही इसे स्वस्थ लोकतंत्र का सूचक माना जाएगा। इसीलिए ये हर्ष की बात है कि नए राष्ट्रपति के नाम पर विपक्ष से संवाद और सहमति बनाने का प्रयास भारतीय जनता पार्टी ने किया है। उसके प्रतिनिधि राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू शुक्रवार को प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और वामपंथी नेताओं से मिले। इससे पहले एनसीपी नेता शरद पवार सहित दूसरे विपक्षी नेताओं से उनकी बात हुई थी। ये प्रक्रिया सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक और सहयोगी दलों से विचार-विमर्श के साथ शुरू की गई। 17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए अपना उम्मीदवार जितवाने की बेहतर स्थिति में है, इस पर किसी को शक नहीं है। इसके बावजूद ये साफ है कि सत्तापक्ष ने संख्या बल को अंतिम निर्णायक तत्व नहीं माना। उसके इस रुख का सबको स्वागत करना चाहिए। बेहतर यही होगा कि 24 जुलाई को अपना कार्यकाल समाप्त कर रहे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के उत्तराधिकारी का चुनाव आम-सहमति से हो।


    भारत की संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति औपचारिक राज्य-प्रमुख हैं। लेकिन वे रबर स्टांप नहीं होते। बल्कि उन्हें विशेष संवैधानिक दायित्व और राजकाज के संचालन में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। राष्ट्रपति से अपेक्षा की जाती है कि वे परामर्श एवं वैचारिक हस्तक्षेप के जरिए भारतीय संविधान के बुनियादी उसूलों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाएं। किसी तरह के राजनीतिक विवादों के बीच उनसे निष्पक्ष और समदर्शी नजरिए की उम्मीद की जाती है। इसीलिए इस पद को गरिमामय समझा जाता है। ये उम्मीद की जाती है कि उसे रोजमर्रा की आम राजनीति से ऊपर रखा जाए। इसलिए ये अपेक्षित है कि एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति भवन पहुंचे, जिसका सभी दिल से सम्मान करते हों।


    अतीत में ऐसी अनेक शख्सियतें इस पद पर पहुंची हैं। भारतीय लोकतंत्र में कई स्वस्थ परंपराएं स्थापित करने में उनका योगदान रहा है। अपने वक्त के तकाजे के मुताबिक उन्होंने ऐसे फैसले लिए, जिनसे आगे के लिए मिसाल कायम हुई। असंदिग्ध विश्वसनीयता, संविधान एवं लोकतांत्रिक परंपराओं का ज्ञान और निर्भय होकर अपनी राय जताने का साहस ऐसे गुण हैं, जिन्होंने कुछ राष्ट्रपतियों को दूसरों की तुलना में विशिष्ट बनाया। क्या सत्तापक्ष और विपक्ष इस बार उपरोक्त गुणों से संपन्न् किसी नाम पर सहमत हो पाएंगे? यह जानने के लिए हमें कुछ रोज इंतजार करना होगा। लेकिन ऐसा हुआ, तो न सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव सहजता एवं सद्भाव के साथ संपन्न् हो जाएगा, बल्कि यह राजनीतिक मतभेद और टकराव के मौजूदा माहौल में एक बड़ी राहत की बात होगी। फिलहाल, यह संतोषप्रद है कि सियासी पार्टियां ऐसा करने के लिए प्रयासरत हैं। आशा है, इससे किसी सर्व-स्वीकार्य नाम पर सहमति बनेगी।

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