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    संपादकीय : अनुशासन का पाठ

    Published: Thu, 10 Aug 2017 10:05 PM (IST) | Updated: Fri, 11 Aug 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    modi narendra 10 08 2017

    यह बड़ी अजीब बात है कि जिन्हें लाखों लोग अपनी नुमाइंदगी करने के लिए चुनते हैं, उनको उनका दायित्व बार-बार याद दिलाना पड़ता है। यह शायद अतीत में बनी राजनीतिक संस्कृति का ही परिणाम है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि उस कार्य में सबसे कम दिलचस्पी लेते हैं, जो उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।


    हैरत तो यह है कि भारतीय जनता पार्टी जैसे अनुशासित माने जाने वाले दल के सांसद भी अपने आलाकमान के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी कर देते हैं। संसद के वर्तमान सत्र में सत्ताधारी पक्ष के सांसदों की अनुपस्थिति के कारण एक मौके पर सरकार के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए पेश संविधान संशोधन विधेयक पर राज्यसभा में विपक्ष ने अपने दो संशोधन पास करा लिए। नतीजतन वो बिल लटक गया, क्योंकि वह जिस रूप में लोकसभा से पारित हुआ था, राज्यसभा से पास बिल उससे अलग है। ऐसे में बिल को फिर से लोकसभा में ले जाना होगा। इस तरह न सिर्फ एनडीए सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हुई, बल्कि अन्य पिछड़ी जातियों के सशक्तीकरण के लिए उसकी एक महत्वपूर्ण पहल भी लटक गई। जिस रोज ये हुआ, 242 (वर्तमान में) सदस्यों वाले सदन के सिर्फ 126 सदस्य मौजूद थे। स्पष्ट है कि उस दिन यदि सत्तापक्ष के सांसद पर्याप्त संख्या में सदन में उपस्थित होते, तो इस तरह की नौबत नहीं आती। इस पर भाजपा नेतृत्व का खफा होना लाजिमी था। तब ये खबर आई थी कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने व्यक्तिगत तौर पर अपने दल के गैरहाजिर रहे सभी सदस्यों से मुलाकात की। उन्हें बेलाग संदेश दिया गया कि उनका तौर-तरीका अस्वीकार्य है।


    अब यही पैगाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया है। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में नरेंद्र मोदी ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि आखिर किसी पार्टी को ह्विप जारी करने की नौबत क्यों आनी चाहिए? ये बात तार्किक है कि सांसदों को खुद सत्र के दिनों में पूरे समय सदन में मौजूद रहना चाहिए। जनता के धन से उन्हें तमाम सुख-सुविधाएं इसीलिए मिलती हैं। दरअसल, सत्र के दिनों में उन्हें सदन में रहने के लिए प्रतिदिन का भत्ता भी मिलता है। ऐसे यह न सिर्फ अपेक्षित, बल्कि अनिवार्य होना चाहिए कि सांसद बिना अपने दल के नेतृत्व की इजाजत लिए एक घंटा भी सदन की कार्यवाही से गैरहाजिर ना हों। भाजपा सदस्यों को अपने नेता (यानी प्रधानमंत्री मोदी) से सीख लेनी चाहिए, जिनके बारे में बहुचर्चित है कि वे बिना अवकाश लिए लगातार अपना कर्तव्य निभाने में संलग्न रहते हैं। सांसद अगर अपनी तरफ से ये जज्बा नहीं दिखाते, तो भाजपा आलाकमान को इस बारे में सख्त कायदे लागू करने चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक बार कहा था कि सासंदों के कामकाज पर नजर रखी जा रही है। आशा की जानी चाहिए कि पार्टी उन सांसदों को दोबारा नुमाइंदगी का मौका देने (यानी अगली बार टिकट देने) से पहले इस आकलन को निर्णय का आधार बनाएगी।

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    • mahendra agrawal MAIHAR12 Aug 2017, 02:47:44 PM

      P M जी के पास कोई बीवी बच्चे नहीं है तो क्या सांसद जी के पास भी नही है विचार किया जाना चाहिये | रही टिकट की बात तो उसकी बात टेबल के नीचे हो जायगी |

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