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    संपादकीय : मुस्लिम समाज खोजे संतुलित समाधान

    Published: Mon, 17 Apr 2017 09:56 PM (IST) | Updated: Tue, 18 Apr 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह तो कहा कि एकबारगी से तीन बार बोलकर तलाक देना उचित नहीं है, लेकिन उसने इस प्रथा को वैध करार दिया। सामान्य विवेक से यह समझना कठिन हो सकता है कि जो बात सही ना हो, उसके वैध बने रहने का क्या औचित्य है? पर्सनल लॉ बोर्ड ने शरीयत में वर्णित तलाक की प्रक्रिया का विवरण सामने रखा। उसका सार है कि तलाक एक-एक महीने के अंतर पर तीन बार बोला जाना चाहिए। समझ है कि इन तीन महीनों में मेलमिलाप का पूरा अवसर दंपती को मिलेगा। उसके बाद भी मतभेद दूर ना हों, तो उनका अलगाव होगा। पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समुदाय से 'तीन तलाकप्रथा का 'दुरुपयोग करने वालों के सामाजिक बहिष्कार का आह्वान किया। उसके वक्तव्य से संकेत मिला कि बोर्ड एक झटके में तीन बार तलाक बोलने को 'तीन तलाक व्यवस्था का दुरुपयोग मानता है। इसके बावजूद इस प्रावधान को बदलने की वकालत उसने क्यों नहीं की, यह अस्पष्ट है। उल्टे उसने चिट्ठी या ऐसे किसी दूसरे माध्यम से 'तीन तलाकप्रथा के उपयोग का भी बचाव किया। क्या इससे भारतीय मुस्लिम समाज में विवाह एवं तलाक के नियमों संबंधी वैसे सुधारों का रास्ता खुलेगा, जिसकी मांग अब बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं कर रही हैं? उन्हीं महिलाओं की पहल पर ये मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा है, जिसकी संविधान पीठ तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुपत्नी प्रथा की संवैधानिकता पर सुनवाई कर रही है।


    मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस कथन से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मुस्लिम समुदाय को अपनी मजहबी रीतियों और पंरपराओं के पालन का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन समस्या तब आती है कि जब किसी धर्म की परंपराओं का अंतर्विरोध भारतीय संविधान के आधारभूत सिद्धांतों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से खड़ा हो जाता है। आज अगर अनेक मुस्लिम महिलाएं मान रही हैं कि उपरोक्त प्रथाएं उनके मूलभूत संवैधानिक अधिकारों का हनन करती हैं, तो उसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

    बेहतर विकल्प यही है कि इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज के भीतर ऐसी सहमति बने, जो भारतीय संविधान की भावनाओं के अनुरूप हो। इस सिलसिले में ये उल्लेख प्रासंगिक होगा कि रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दिया कि मुस्लिम महिलाओं से इंसाफ होना चाहिए। लेकिन साथ ही उन्होंने जोड़ा कि ऐसा टकराव से नहीं, बल्कि विचार-विमर्श के जरिए होना चाहिए। स्पष्टत: ऐसे समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है, जिससे मुस्लिम समुदाय में ये भावना पैदा ना हो कि उसे घेरा जा रहा है, जबकि मुस्लिम महिलाओं की मांग भी पूरी हो जाए। ऐसा संभव है, बशर्ते पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम विद्वान मजहबी निजी कानून की व्याख्या में अभिनव दृष्टिकोण अपनाएं। नियम और कानूनों को अक्षरश: लेने के बजाय उनकी भावना पर गौर किया जाए, तो ऐसा होना संभव है। तब ऐसे समाजिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, जिनकी आज दरकार है।

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