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    संपादकीय : भ्रम दूर करने का मौका

    Published: Thu, 15 Jun 2017 10:25 PM (IST) | Updated: Fri, 16 Jun 2017 04:03 AM (IST)
    By: Editorial Team
    pashu1 15 06 2017

    केंद्र को यह स्पष्ट करने का अब उपयुक्त अवसर मिला है कि देश में पशुओं की खरीद-बिक्री पर वैधानिक स्थिति क्या है और इस बारे में सरकार का इरादा क्या है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से जवाब-तलब किया। उसे जवाब पेश करने के लिए दो हफ्तों का वक्त दिया गया है। दरअसल इस मामले में भ्रम पिछले 26 मई को जारी केंद्रीय अधिसूचना से खड़ा हुआ। उसके जरिए सरकार ने पशुओं से क्रूरता निरोधक (पशु बाजार विनियमन) नियम-2017 जारी किए। ये नियम पशु क्रूरता निरोधक अधिनियम-1960 के तहत किए गए। नए नियमों के तहत यह अनिवार्य किया गया कि मवेशियों की बिक्री के समय लिखित तौर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि खरीददार उनका वध नहीं करेगा। आलोचकों ने इसे परोक्ष रूप से गाय व भैंस वंश के जानवरों को मारने से रोकना और उनके मांस खाने पर प्रतिबंध लगाना माना है। इसे लेकर देश के कई हिस्सों में बेचैनी देखी गई। यहां तक कि मेघालय में कुछ नेताओं ने विरोध जताने के लिए भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में भी इसके विरोध में आवाजें उठीं। कहा गया कि यह लोगों के खान-पान और आस्थाओं को नियंत्रित करने की असंवैधानिक कोशिश है।

    यही दलील देते हुए सुप्रीम कोर्ट में नए नियमों को चुनौती दी गई है। इसके पहले मद्रास हाई कोर्ट नए नियमों के अमल पर रोक लगा चुका है। विवाद भड़कने पर केंद्र सरकार ने सार्वजनिक तौर पर सफाई दी कि नए नियमों का मकसद सिर्फ पशु बाजारों को विनियमित करना है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नए नियम बड़े जानवरों का मांस खाने पर रोक नहीं लगाते। इसके बावजूद भ्रम कायम है।


    इसे बढ़ाने में कुछ योगदान उन असामाजिक तत्वों का भी है, जिन्होंने गोरक्षा के नाम पर कानून अपने हाथ में लेने की कोशिश की है। हाल ही में राजस्थान में वैध कागजात के साथ जानवर खरीद कर ले जा रहे तमिलनाडु सरकार के कर्मचारियों और वाहन पर हमला हुआ। ऐसी प्रवृत्तियों ने कानून-व्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा की हैं। अब सरकार के सामने मौका है कि वह उपरोक्त नियमों में परिवर्तन के अपने मकसद को देश की सर्वोच्च अदालत के सामने स्पष्ट करे। साथ ही राज्य सरकारों को भी यह बेलाग निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे किसी को भी गोरक्षा के नाम पर कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत न दें।


    पशुओं से क्रूरता रोकना नेक उद्देश्य है। इस बारे में पहले से मौजूद कानून पर प्रभावी अमल सुनिश्चित करने के सरकार के प्रयासों से भी असहमत नहीं हुआ जा सकता। लेकिन यह आवश्यक है कि नियम कानून की भावना के अनुरूप हों, उन्हें लागू करने के क्रम में किसी के संविधान-प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन न हो और कानून-व्यवस्था पर अमल में कहीं कोई ढिलाई न हो। आशा है, इन अपेक्षाओं को पूरा करते हुए केंद्र अपने जवाब से सर्वोच्च न्यायालय को संतुष्ट करने में सफल रहेगा।

    और जानें :  # supreme court # central govt # beef ban
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