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    संपादकीय : विपक्ष की कुनबा जोड़ने की कवायद

    Published: Wed, 12 Jul 2017 10:53 PM (IST) | Updated: Thu, 13 Jul 2017 07:52 AM (IST)
    By: Editorial Team
    opposition-1 12 07 2017

    विपक्ष ने इस बार बेहतर रणनीति दिखाई। राष्ट्रपति चुनाव में साझा उम्मीदवार के सवाल पर उसमें जैसा बिखराव दिखा, उससे उबरना आसान नहीं था। जदयू द्वारा एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के बाद कांग्रेस से उसकी सार्वजनिक तकरार हुई थी। तब जदयू ने इल्जाम मढ़ा कि कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी उतारने की जिद में विपक्षी एकता नहीं बनने दी। कांग्रेस की ये आलोचना भी हुई कि प्रत्याशी चुनने में अग्रिम कदम उठाने के बजाय उसने भाजपा का प्रत्याशी जानने तक इंतजार किया। इस तरह उसने पहल विपक्ष के हाथ से निकल जाने दी। भाजपा ने दलित प्रत्याशी घोषित कर कई विपक्षी दलों का समर्थन हासिल कर लिया। कांग्रेस ने जवाब में मीरा कुमार को उतारा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।


    विपक्ष के नजरिए से देखें तो अच्छी बात है कि कांग्रेस और दूसरे दलों ने राष्ट्रपति चुनाव में पैदा हुई बदमजगी से सबक सीखा। उपराष्ट्रपति चुनाव में वे पहलकारी भूमिका में आए। इससे पहले कि सत्तापक्ष अपना प्रत्याशी तय करता, उन्होंने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इस प्रक्रिया में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू भी शामिल हुई। इस तरह पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल तथा देश की मशहूर बौद्धिक शख्सियत गोपाल कृष्ण गांधी का नाम प्रस्तावित हुआ है। ये ऐसा नाम है, जिसके विरोध के तर्क ढूंढना सत्तापक्ष के लिए अपेक्षाकृत कठिन होगा। वैसे संसद की दलगत सदस्य-संख्या को ध्यान में रखें, तो तमाम विपक्षी एकता के बावजूद गांधी की संभावनाएं धूमिल हैं। उपराष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य ही वोट डालते हैं। दोनों सदनों को मिलाकर सत्ताधारी एनडीए के पास पर्याप्त बहुमत है। इसलिए जिस तरह मीरा कुमार प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ रही हैं, गांधी की स्थिति भी वैसी ही रहने वाली है।


    मगर वर्तमान संदर्भ में ऐसी प्रतीकात्मक राजनीति की भी अहमियत है। जब विपक्ष बेहद लचर अवस्था में हो और उसकी भूमिका सत्तापक्ष के कदमों पर प्रतिक्रिया जताने भर की रह गई हो, तब 18 पार्टियों के एक मकसद के लिए इकट्ठा होने का दूरगामी महत्व हो सकता है, बशर्ते पहल करने की इच्छाशक्ति उनमें आगे भी बनी रहे। यह तभी संभव है, जब सचमुच इन दलों में समान उद्देश्य भावना हो। इसके लिए उन्हें तुच्छ स्वार्थों से उबरना होगा। फिलहाल, एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति के नाम पर सहमत होकर उन्होंने अपने समर्थकों में आस जगाई है। लेकिन ये उम्मीद क्षणिक भी हो सकती है। बिहार में महागठबंधन जैसे संकट में है तथा कई दूसरे राज्यों में इन पार्टियों के बीच आपसी अंतर्विरोध जितने तीखे हैं, उसके मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट एवं सशक्त विपक्ष का उभरना आसान नहीं है। चेहरा तथा विश्वसनीय राजनीतिक कथानक पेश करने की समस्या अलग है। जब तक ऐसा नहीं होता, विपक्ष के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को चुनौती देना टेढ़ी खीर बना रहेगा। फिलहाल, यही कहा जा सकता है कि विपक्ष ने एक सार्थक कोशिश की है।

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