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    संपादकीय : सेना का टूटता सब्र?

    Published: Thu, 16 Feb 2017 09:56 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Feb 2017 12:30 AM (IST)
    By: Editorial Team
    stone-pelting 16 02 2017

    सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने सरल और सामान्य बात कही। जो लोग भारतीय भूभाग पर रहते हुए पाकिस्तान या इस्लामिक स्टेट (आईएस) के झंडे लहराएं, उन्हें राष्ट्रविरोधी के अलावा और क्या कहा जा सकता है? किंतु ये बात सेनाध्यक्ष को कहनी पड़ी, तो इससे यही संदेश ग्रहण किया जाएगा कि जम्मू-कश्मीर में जारी हालात को लेकर सेना अपना सब्र खोने लगी है। ये स्थिति पैदा होने की एक खास पृष्ठभूमि है। पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के हाथों शहीद होने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या पांच साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची। और इस वर्ष आरंभ में छोटे विराम के बाद फिर दहशहतगर्दों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। बीते मंगलवार को एक रिहायशी इलाके में आतंकियों की फायरिंग से तीन जवान शहीद हुए। एक अन्य मुठभेड़ में एक जवान की जान गई। उसके पहले एक मुठभेड़ के समय देखा गया कि स्थानीय आबादी के एक हिस्से ने दहशतगर्दों से लड़ रहे सैन्यकर्मियों की राह में रुकावटें खड़ी कीं।


    इन्हीं हालात के मद्देनजर जनरल रावत ने दोटूक बयानी की है। कहा कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाकर्मी ज्यादा हताहत इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि स्थानीय लोग सुरक्षा बलों के अभियान में बाधा डालते हैं। तो सेना प्रमुख ने कहा कि जिन लोगों ने हथियार उठाए हैं, वे भले स्थानीय नौजवान हों, लेकिन अगर वे आईएस या पाकिस्तान के झंडे लहराकर आतंकियों के मददगार बनते हैं तो हम उन्हें राष्ट्र-विरोधी तत्व मानेंगे। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।


    क्या इस बात पर कोई दोराय मुमकिन है? जाहिर है - नहीं। दरअसल, सेनाध्यक्ष की इस राय पर राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए। पूरे देश को सेना की किसी ऐसी कार्रवाई के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। लेकिन क्या ऐसा होगा? कहना कठिन है। अब तक का तजुर्बा यही है कि सेना की कार्रवाइयों पर कई हलकों से कई तरह के सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। ऐसा करने वालों में मानवाधिकार संगठन होते हैं, और कई मौकों पर विपक्षी दल भी। दरअसल, अक्सर सरकार भी इस मामले में बेलाग रुख अपनाती नहीं दिखती। जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार का नेतृत्व ऐसी पार्टी (पीडीपी) के हाथ में है, जिसकी छवि अलगाववादी तत्वों के हमदर्द की रही है। विचारणीय है कि अगर आतंकवादियों के समर्थक समूहों को कुछ सियासी पार्टियों तथा सिविल सोसायटी के संगठनों का साथ ना मिले, तो क्या वे अपनी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां जारी रख पाएंगे? हैरतअंगेज है कि सेना या अन्य सुरक्षा बलों के जवानों के हताहत होने पर इन हलकों से कोई आवाज नहीं उठती। यही परिस्थिति है, जिसमें सेनाध्यक्ष को सख्त बयान देना पड़ा है। अब आवश्यकता है कि सेना की भावना को समझा जाए। ऐसी रणनीति तैयार हो, जिससे जम्मू-कश्मीर में राष्ट्र-विरोधी तत्वों पर लगाम लग सके। ऐसा करते हुए ऐसी सावधानी जरूरी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के लिए असहज स्थिति खड़ी ना हो।

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