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    संपादकीय : सार्थक चर्चा का सत्र

    Published: Fri, 11 Aug 2017 10:50 PM (IST) | Updated: Sat, 12 Aug 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
    lok-sabha 11 08 2017

    संसद के शुक्रवार को समाप्त हुए मानसूत्र सत्र को नए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के लिए खास याद रखा जाएगा। ये पहला मौका है जब इन दोनों सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति निर्वाचित हुए हैं। इस रूप में इस अधिवेशन के साथ भारतीय राज्य-व्यवस्था को नया रूप और नई दिशा प्राप्त हुई है। लेकिन संसदीय कार्यों के लिहाज से ये सत्र ज्यादा प्रभावी नहीं रहा। 15वीं लोकसभा के कार्यकाल में हुए पिछले सत्रों की तुलना में देखें, तो इस अधिवेशन का काफी कम उत्पादक इस्तेमाल हुआ। लोकसभा में कुल तय समय का 67 प्रतिशत और राज्यसभा में 72 प्रतिशत का ही इस्तेमाल किया गया। जाहिर है, दोनों सदनों में काफी समय अवरोधों के चलते बर्बाद हुआ। दिवंगत हुए सदस्यों (विनोद खन्न्ा और सांवर लाल जाट) को श्रद्धांजलि देने के बाद कार्यवाही के स्थगन से भी संसदीय समय का पूर्ण उपयोग संभव नहीं हो सका।


    विधायी कार्यों के लिहाज से देखें, तो मानसून अधिवेशन शुरू होने के पहले 34 विधेयक विचार एवं पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किए गए थे। लेकिन उनमें से 9 विधेयक ही पारित हुए। यानी 26.4 प्रतिशत विधायी कार्य ही निपटाए जा सके। 2014 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से आम अनुभव संसदीय समय के बेहतर उपयोग का रहा है। कुछ सत्रों में तो लोकसभा में उससे अधिक कार्य संपन्न् हुए, जितना आरंभ में सूचीबद्ध किया गया था। ऐसे में सत्ता पक्ष के लिए यह गंभीर विश्लेषण का विषय है कि इस बार ये रुझान क्यों पलट गया?


    हाल के विधानसभा एवं अन्य चुनावों में लगातार पराजय से विपक्ष का मनोबल गिरा है। इसका असर संसद के बजट सत्र में दिखा था, जब विपक्षी सांसद हंगामे का तरीका छोड़ते नजर आए। लेकिन मानसून सत्र के रिकॉर्ड से साफ है कि इस बार विपक्ष फिर से अपने पुराने तौर-तरीकों पर लौट आया। इसके परिणामस्वरूप एक मौके पर लोकसभा अध्यक्ष को कांग्रेस के पांच सदस्यों को निलंबित करना पड़ा। संसद में ऐसी घटनाएं हालिया प्रवृत्ति ही हैं। फिर इस अधिवेशन में कार्यवाही के दौरान पर्याप्त संख्या में सदस्यों के उपस्थित ना रहने की समस्या फिर सामने आई। आगे ऐसा ना हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए दोनों पक्षों को अविलंब प्रयास करने चाहिए।


    बहरहाल, मानसून सत्र में राष्ट्रीय महत्व के अनेक मुद्दों पर सार्थक चर्चा भी हुई। कृषि संकट, किसान आत्महत्या, बाढ़, भीड़ की हिंसा, दलितों पर अत्याचार और एनडीए सरकार की विदेश नीति जैसे अहम मुद्दों पर दोनों सदनों को मिलाकर तकरीबन 55 घंटों तक बहस हुई। इसके अलावा 'भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं सालगिरह पर दोनों सदनों ने प्रश्नकाल स्थगित कर चर्चा की। इस अवसर पर दोनों सदनों ने अलग-अलग प्रस्ताव पास कर एक बेहतर भारत के निर्माण का संकल्प लिया। ये संकल्प सभी दलों और सांसदों को याद रहे, तो भविष्य में वे संसदीय समय की कीमत बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।

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