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    संपादकीय : असुरक्षित स्कूली बच्चे

    Published: Sun, 10 Sep 2017 10:34 PM (IST) | Updated: Mon, 11 Sep 2017 04:00 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    केवल दो दिन के अंतर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के दो नामी प्राइवेट स्कूलों में ऐसी वारदातें घटित हुईं, जिन पर जनमानस का आहत व उद्वेलित होना स्वाभाविक है। पहले गुरुग्राम स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात वर्षीय बालक की हत्या हुई। फिर दिल्ली के गांधी नगर इलाके में स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल में एक पांच साल की बालिका से दुष्कर्म की घटना सामने आई। गुरुग्राम मामले में आरोप है कि स्कूल बस के कंडक्टर ने बच्चे के साथ यौन-दुर्व्यवहार की कोशिश की। नाकाम रहने पर उसने हत्या कर डाली। वहीं गांधी नगर मामले में आरोपी स्कूल का ही चपरासी है। यानी दोनों घटनाओं में आरोपियों का प्रमुख मकसद यौन शोषण था। गुरुग्राम मामले में अपराध को भयावह ढंग से अंजाम दिया गया।


    गौरतलब है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की घटनाओं पर मीडिया का ज्यादा ध्यान रहता है। इसलिए इन मामलों से पूरे देश में लोग सदमे में आए हैं। मगर इसका कारण सिर्फ इतना नहीं है। असल में इन घटनाओं ने पूरे देश की संवेदना को इसलिए भी झकझोरा, क्योंकि स्कूलों में यौन उत्पीड़न की खबरें लगभग सभी जगहों पर अक्सर आती रहती हैं। तकरीबन पांच साल पहले हुए निर्भया कांड के बाद बलात्कार तथा यौन दुर्व्यवहार को लेकर कानून सख्त किया गया था। बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट- 2012 (पॉस्को) मौजूद है। परंतु आम अनुभव है कि महज सख्त कानून ऐसे अपराधों को रोकने में पर्याप्त साबित नहीं होते। इसके लिए स्कूलों के स्तर पर अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। ताजा मामलों में आरोप लगा कि स्कूल प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था। स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे की प्रभावी व्यवस्था नहीं थी, जिससे जुर्म का अकाट्य साक्ष्य दर्ज हो पाता। अगर वहां प्रचारित रहता कि तमाम गतिविधियों की रिकॉर्डिंग हो रही है, तो शायद आरोपी ऐसे कृत्य करने की जुर्रत नहीं कर पाते। इसके अलावा विशेषज्ञ बच्चों को प्रशिक्षित करने पर भी जोर देते हैं, ताकि अपने साथ किसी अवांछित हरकत के बारे में वे अपने शिक्षक या माता-पिता को बेहिचक सूचित करें। माता-पिता और शिक्षकों की ट्रेनिंग जरूरी है, ताकि ऐसी शिकायतों को वे हल्के में ना लें।


    स्पष्टत: गुरुग्राम और गांधी नगर स्थित स्कूलों में ऐसी सावधानियां नहीं बरती गईं। इसीलिए महज आरोपियों को पकड़ लेना काफी नहीं है। मुकदमों की तीव्र सुनवाई जरूरी है। लेकिन उसे सुनिश्चित करना भी पर्याप्त नहीं होगा। असल मुद्दा है- स्कूल प्रबंधनों की जवाबदेही तय करने का। जिन अधिकारियों ने सुरक्षा की बुनियादी शर्तों की अवहेलना की, उन्हें भी कठघरे में लाया जाना चाहिए। इस बिंदु पर प्रशासन या सरकार के उत्तरदायित्व का प्रश्न भी उठता है। प्राइवेट स्कूल मोटी फीस वसूलते हैं। वहां दी जाने वाली कथित सुविधाओं और सुरक्षा इंतजामों के आधार पर इसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश होती है। लेकिन इस मोर्चे पर नाकाम रहे स्कूलों के प्रबंधकों के लिए क्या दंड हो, अब यह भी सुपरिभाषित होना चाहिए। अपेक्षित यही है कि सरकारें इस दिशा में जल्द कदम उठाएं।

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