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    संपादकीय : मंजूर नहीं अराजकता

    Published: Thu, 13 Jul 2017 11:25 PM (IST) | Updated: Fri, 14 Jul 2017 04:01 AM (IST)
    By: Editorial Team
    mob lynching 13 07 2017

    गोमांस ले जाने के शक में पिटाई की ताजा घटना महाराष्ट्र के नागपुर में हुई, लेकिन इसमें उल्लेखनीय पहलू कार्रवाई करने में पुलिस की फुर्ती है। पुलिस ने तुरंत चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। कुछ लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में भी लिया गया है। बीते दिनों झारखंड में भी गोमांस के शक में हुई एक व्यक्ति की हत्या के बाद पुलिस ने ताबड़तोड कार्रवाई करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार किया था। स्पष्टत: यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुस्पष्ट घोषणा का परिणाम है। पिछले 29 जून को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में एक समारोह में बोलते हुए मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा की कड़ी निंदा की थी। उन्होंने दो-टूक कहा कि ऐसी घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। उसके बाद कानून लागू करने वाली एजेंसियों के रुख में बदलाव झलका।

    यह स्वागतयोग्य घटनाक्रम है। इसलिए कि पिछले दिनों गोरक्षा के नाम पर कानून अपने हाथ में लेने की घटी घटनाएं कानून-व्यवस्था लिए एक बड़ी चुनौती बनने लगी थीं। किसी सभ्य एवं संवैधानिक व्यवस्था में ऐसी वारदात की इजाजत नहीं हो सकती। देश के ज्यादातर राज्यों में गोहत्या पर कानूनन प्रतिबंध है। इसका उल्लंघन करने वालों के लिए दंड निर्धारित है। ऐसे में अगर कहीं ऐसी घटना हो, तो सही रास्ता पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराना है। जांच करना पुलिस और निर्णय देना न्यायपालिका का काम है। इसके उलट लोगों का कोई समूह खुद इंसाफ करने लगे तो उससे समाज में अराजकता ही फैलेगी। इसीलिए देश के विभिन्न् हिस्सों में हुई ऐसी घटनाओं से सभ्य समाज चिंतित हुआ। ज्यादा फिक्र की बात ये धारणा बनना थी कि ऐसी वारदात करने वालों को सरकार का संरक्षण हासिल है। ऐसी राय बनाने की कोशिश इसके बावजूद हुई कि प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष भी गोरक्षा के नाम पर हिंसा कर रहे तत्वों की निंदा की थी। इस बार उनका लहजा ज्यादा सख्त रहा।

    कहा जा सकता है कि उससे सही पैगाम गया है। इस सिलसिले में यह भी उल्लेखनीय है कि बूचड़खानों के लिए मवेशियों की बिक्री पर रोक से संबंधित अधिसूचना पर केंद्र हठ नहीं दिखा रहा है। इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल ने कहा कि विभिन्न् क्षेत्रों से आई प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए केंद्र उस अधिसूचना पर पुनर्विचार कर रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि न्यायालय यदि अधिसूचना के अमल पर सारे देश में रोक लगाना चाहे, तो सरकार को उस पर एतराज नहीं होगा। हालांकि ये मुद्दा गोरक्षा से नहीं जुड़ा है, लेकिन सरकार के इस कदम को गोहत्या रोकने के प्रयासों से ही जोड़कर देखा गया। अच्छी बात है कि केंद्र अब इस पर दोबारा सोच रहा है। इसका संदेश भी यही है कि कुछ तत्वों ने सरकार के इरादे की गलत व्याख्या करके हिंसा की जो राह अपनाई है, उससे एनडीए सरकार सहमत नहीं है। इसलिए वह उचित सुधार करने को तैयार है। अब चूंकि सरकार स्थिति की गंभीरता के प्रति अधिक सतर्क हो गई है तो उसका असर भी दिखने लगा है। नागपुर की घटना इसकी ही मिसाल है।

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