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    संपादकीय : गोरखपुर की त्रासदी

    Published: Sun, 13 Aug 2017 10:39 PM (IST) | Updated: Mon, 14 Aug 2017 04:02 AM (IST)
    By: Editorial Team
    gorakhpur11 13 08 2017

    गोरखपुर में एक सरकारी अस्पताल में कथित तौर पर ऑक्सीजन सप्लाई रुकने से बच्चों की मौत पर नोबेल पुरस्कार विजेता बाल-अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी का कथन गौरतलब है। सत्यार्थी ने कहा- 'यह त्रासदी नहीं, बल्कि जन-संहार है। ये बताता है कि सत्तर साल की आजादी का बच्चों के लिए क्या अर्थ है! समग्रता से गौर करें, तो इस बात का निहितार्थ बेहतर स्पष्ट होगा। अस्पताल में हुआ हादसा गोरखपुर में बच्चों की जारी मौत का सिर्फ एक पहलू है। उप्र सरकार ने स्वीकार किया है कि बीते गुरुवार की रात 800 बिस्तरों वाले बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दो घंटों के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी। लेकिन अधिकारियों का दावा है कि उस दौरान कोई मौत नहीं हुई। जबकि कई पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उनके बच्चों की जान ऑक्सीजन आपूर्ति रुकने से ही गई। इस बारे में सच तो जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट से ही सामने आएगा। इस बीच रविवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने गोरखपुर का दौरा किया। वहीं पर मुख्यमंत्री ने दिमागी बुखार की व्याधि के खिलाफ जंग छेड़ने का एलान किया। असल समस्या यही बीमारी है, जिससे गोरखपुर का इलाका दशकों से पीड़ित है। पिछले बुधवार से इस रोग के कारण 60 से ज्यादा बच्चों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 1970 के दशक से इस कारण हर साल सैकड़ों जानें जाती रही हैं। आश्चर्यजनक है कि इतनी लंबी अवधि में यह कभी सियासी मुद्दा नहीं बना। यह सवाल नहीं पूछा गया कि इस रोग की रोकथाम और चिकित्सा के पर्याप्त इंतजाम वहां क्यों नहीं हुए? इसके लिए कौन जवाबदेह है?


    स्पष्टत: इसका पूर्ण उत्तरदायित्व पांच महीने पहले बनी आदित्यनाथ सरकार पर नहीं डाला जा सकता। हां, योगी आदित्यनाथ से यह अवश्य पूछा जाएगा कि जिस क्षेत्र का उन्होंने लगातार पांच बार लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया, वहां मासूम बच्चों की हर साल होने वाली ऐसी मौतें उनके लिए ऐसा मुद्दा क्यों नहीं थीं, जिसे वे सड़क से संसद तक लगातार उठाते? और यही प्रश्न उस पूरे क्षेत्र से लोकसभा और विधानसभा पहुंचे सभी पार्टियों के तमाम नुमाइंदों से भी पूछा जाना चाहिए।


    वैसे इस प्रश्न का दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। इसके घेरे में उस इलाके के मतदाता एवं आम नागरिक भी हैं। वे इसको लेकर कभी आंदोलित नहीं हुए। निर्वाचित प्रतिनिधियों से जवाब नहीं मांगा। क्यों? लोकतंत्र में नेता व दल अक्सर उन मुद्दों को अहमियत देते हैं, जिनसे वोट मिलने की आशा हो। अपने देश में आम मतदाता स्वास्थ्य, शिक्षा या रोजी-रोटी के सवालों से नेताओं को नहीं घेरते, तो नेता भी लापरवाह बने रहते हैं। नतीजा गोरखपुर जैसी त्रासदी के रूप में सामने आता है। इस घटना ने पूरे देश को झकझोरा है। किंतु ये वेदना कब तक कायम रहेगी? अगर यह क्षणिक रही, तो गोरखपुर से लेकर देश के तमाम दूसरे हिस्सों में स्थिति में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आएगा।

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