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    अतीतगंधा: कभी आर कभी पार, लागा तीरे-नजर

    Published: Sat, 26 Apr 2014 12:01 PM (IST) | Updated: Sat, 26 Apr 2014 03:27 PM (IST)
    By: Editorial Team
    shamshad-begum 26 04 2014

    इस गीत में शमशाद की शोख, बर्छीमार, काली मिर्ची-सी तीखी आवाज जहां मर्दों को बुरी तरह याद दिलाती है कि वे मर्द हैं और सिर्फ तरसते रहने का काम करें, वहीं गाने की तालप्रधान चाल, नैयर की मशहूर ढोलक की मादक एड़ पाकर तथा बाजारलूट फ्लूटवर्क से धनाढ्य होकर, नसों में शहद का तड़का लगा जाती है। इतना आनंद... इतना आनंद कि बस, जहर खा लें और दीर्घायु हो जाएं। इस सारे कहर के पीछे एकमात्र हीरो नैयर साहब थे।

    अपने नन्हे बच्चे के लिए दूध का इंतजाम करना भी उस नौजवान संगीतकार ओंकार प्रसाद नैयर के लिए भारी पड़ रहा था। घर में फाके की नौबत आ चुकी थी। बावजूद इसके कि वह एक ही साल 1952 की दो फिल्मों 'छम छमा छम' और 'आसमान' में कुछ दिग्विजयी मेलडीज दे चुका था और सन् '53 की 'बाज' के गीतों से अवाम को पगला चुका था, उसे फिल्में नहीं मिल रही थीं। उसने सोच लिया कि अब पंजाब लौट जाना चाहिए, जहां से वह आया था। गुरुदत्त पर उसकी कुछ लेनदारी बचती थी। पर गुरुदत्त भी पलटी मार गए थे। आखिर एडजस्टमेंट यह बना कि नैयर गुरुदत्त की 'आरपार' के लिए गीत बना दें, तो फिल्म से आय होने के बाद पूरा हिसाब कर दिया जाएगा। फिर गरुदत्त ने परेशानहाल नैयर को कुछ कामपुरता रुपए दिए और नैयर बिस्तर खोलकर बंबई में ठहर गए। फिर भी उन्हें अपनी किस्मत पर शक था। 'आरपार' के गाने बने।

    मगर यह क्या! 'आरपार' (1954) रिलीज हुई, तो उसके गानों के तूफानी, अद्भुत माधुर्य ने देश के दिलों पर डाका डाल दिया। 'कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर' और 'बाबूजी धीरे चलना' पर बस बिजली के खंभे और मील के पत्थर नहीं नाच पड़े, वर्ना देश का एक-एक आदमी इन गानों पर झूम उठा था। क्या 'ये लो मैं हारी पिया', 'हूं अभी मैं जवां' और 'जा जा जा जा बेवफा' (ये तीनों सोलो गीता के) और क्या 'सुन सुन सुन सुन जालिमा', 'अरे ना ना ना ना ना जी तौबा तौबा' और 'शिकायत कर लो जी भर लो अजी किसने रोका है' (सभी में मोहम्मद रफी और गीता दत्त, जबकि आखिरी वाले में कुछ पल को सुमन कल्याणपुर भी हैं) - ये सभी गीत थिएटरों में और सड़कों पर (जहां दुकानों पर रेडियो बजते थे) सिने-प्रेमियों की भीड़ जमा करते रहे। इस फिल्म ने जहां नोंटों से गुरुदत्त के सूटकेस भर दिए, वहीं ओपी को कभी पंजाब न लौटने की खुशकिस्मती बख्श दी। फिल्म में गुरुदत्त का श्यामा के लिए डायलॉग है- 'प्यार किया है, तो हाथ पकड़ और निकल चल। आर या पार?' नैयर के लिए भी यह फिल्म 'आर या पार' साबित हुई और बंबई में उन्होंने अपना खंब ठोंक लिया। आगे का इतिहास आप जानते हैं।

    फिल्म सीमक्षकों ने गुरुदत्त का आकलन करते वक्त बार-बार उनकी तीन ही फिल्मों को ज्यादा याद किया है: 'प्यासा', 'कागज के फूल' और 'साहब बीवी और गुलाम'। मगर कथा के हिसाब से साधारण-सी 'आरपार' में गुरुदत्त ने कुछ नई जमीन तोड़ी थी। नंबर एक, सारी फिल्म में बंबईया भाषा इस्तेमाल हुई थी। यहां तक कि एक गाने का मुखड़ा बंबई की फुटपाथी भाषा (कुछ कम टपोरी) में लिखवाया गया था। नंबर दो, फिल्म के पात्र, लोकाल और माहौल को -क्योंकि कथा बंबई में घटती है- बंबईया रंग से रंगा गया था। नंबर 3, गानों के पिक्चराइजेशन में गुरुदत्त ने ग्लैमर और कृत्रिम सेटिंग को तोड़ा था। 'कभी आर कभी पार" गाना एक ईंट ढोती मराठी मजदूरन पर आया था, जिसकी भूमिका कुमकुम ने की थी। समूची फिल्म जैसे स्ट्रीट पर घटित होती है और कथा में आने-जाने वाले पात्र साध्ाारण तथा हमारी रोजमर्रा की आम दुनिया के हैं। सबसे बड़ी बात, जिस पर आम दर्शक गौर नहीं कर पाता, गुरुदत्त द्वारा करवाया गया कैमरा वर्क है। फिल्म अंध्ोरे और उजाले के सम्यक मिश्रण में चलती है, क्योंकि खुद जिंदगी में सब कुछ चटक, साफ और सादिक नहीं होता, ऐसा गुरुदत्त मानते थे। कोमल गुरुदत्त की तरह उनका कैमरा कोमल रहा है। 'आरपार" हमें छूती हुई जाती है, कहीं कोंचती-गड़ती नहीं। यह गुरुदत्त की टेकिंग्स का कमाल है। सच कहें, तो गुरुदत्त की फिल्में कैमरे के पीछे छिपी हुई कविता भी हैं। सब्टरेनियली लिरिकल!

    'आरपार' का सबसे हिट गाना यही 'कभी आर, कभी पार' था। गाना क्या है, अपनी अतिशय मध्ाुर ध्ाुन और इतराते-इठलाते-गुदगुदाते वाद्य संगीत के कारण माधुर्य की तूफानी बाढ़ है। शमशाद की शोख, बर्छीमार, काली मिर्ची-सी तीखी आवाज जहां मर्दों को बुरी तरह याद दिलाती है कि वे मर्द हैं और सिर्फ तरसते रहने का काम करें, वहीं गाने की तालप्रधान चाल, नैयर की मशहूर ढोलक की मादक एड़ पाकर तथा बाजारलूट फ्लूटवर्क से धनाढ्य होकर, नसों में शहद का तड़का लगा जाती है। इतना आनंद... इतना आनंद कि बस, जहर खा लें और दीर्घायु हो जाएं। इस सारे कहर के पीछे एकमात्र हीरो नैयर साहब थे, जिनके जैसा मीठा संगीतकार आगे-पीछे नहीं मिलता। वे रिद्म के बादशाह थे। ढोलक के दम पर त्रिलोक लूटते थे। जितनी जवान, मादक और नसों का पोर-पोर खोल देने वाली ढोलक नैयर के ऑर्केस्ट्रा में बजी है, वैसी और कहीं नहीं। गहराई से देखें, तो उत्तेजक एवं कामुक होते हुए भी नैयर का संगीत अस्तित्व की स्वयंसिद्ध, सारभूत आध्यात्मिकता का एक रूप है क्योंकि अस्तित्व एवं आध्यात्मिकता एक ही चीज है। प्रकृति से छनकर उतरा सब कुछ रम्य और दिव्य है।

    नैयर एक बिगड़ैल ऋषि थे। 'आरपार' के सारे गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। धुन पर एकदम फिट और मौलिक जैसा मौलिक गीत लिखने में मजरूह माहिर थे। नैयर की धुनें पहले बन चुकी थीं। मजरूह ने उन्हें सरल, सहज, मौजूं शब्द पहनाए हैं। ऐसे जबरिया काम में भी कविता आ ही जाती है। तो देखिए इस आलोच्य गीत में यत्र-तत्र मिठास और मुहावरे के कैसे प्यारे टुकड़े आ गए हैं। बॉक्स में गीत की शब्द रचना पेश है। हम तीसरा अंतरा भी पेश कर रहे हैं, जो सिर्फ फिल्म के साउंड ट्रैक पर है।

    सैंया घायल किया रे, तूने मोरा जिगर

    कभी आर कभी पार, लागा तीरे नजर - (2)

    सैंया घायल किया रे, तूने मोरा जिगर।

    कितना संभाला बैरी, दो नैनों में खो गया - (2)

    देखती रह गई मैं तो, जिया तेरा हो गया - (2)

    दर्द मिला है जीवन भर का, मारा ऐसा तीर नजर का - (2)

    लूटा चैन करार!

    (नैयर का यहां अंत में अंतरा अक्सर टूट जाता है या झटके से खत्म होता है। नतीजतन, आगे जगह खाली जाती है, जिसे नैयर खूबसूरती से भरकर गायक को ध्ा्रुव-पंक्ति पर वापस उछाल देते हैं। यहां फिलर का काम बांसुरी की प्यारी-सी कूक करती है। इस गीत में फ्लूट का यह टुकड़ा और अब्दुल कय्यूम की मदमाती ढोलक मेलडी का शीर्ष पैदा करती है। तो...)

    कभी आर कभी पार, लागा... - (2)

    सैंया घायल किया रे...।

    पहले मिलन में ये तो, दुनिया की रीत है -(2)

    बात में गुस्सा लेकिन, दिल ही दिल में प्रीत है -(2)

    मन ही मन में लड्डू फूटें, नैनों से फुलझड़िया छूटें -(2)

    होठों पे तकरार!

    कभी आर कभी पार, लागा... - (2)

    सैंया घायल किया रे...।

    (यह हिस्सा सिर्फ फिल्म में)

    मरजी तिहारी चाहे, मन में बसाओ जी -(2)

    प्यार से देखो चाहे, आंखों से गिराओ जी - (2)

    दिल से दिल टकरा गए अब तो, चोट जिगर पे खा गए अब तो -(2)

    अब तो हो गया प्यार!

    कभी आर कभी पार, लागा तीरे नजर -(2)

    सैंया घायल किया रे, तूने मोरा जिगर।

    (एक बार फिर यही लाइनें और गीत समाप्त।)

    अब न नैयर हैं, न शमशाद और न गुरुदत्त और मजरूह हैं। मगर इन सबके मेल और कमाल से उपजा 'आरपार' का यह सुपरहिट गीत हजारों बार बजकर भी अगले हजार बारों के लिए वैसा का वैसा ताजा, जीवंत और जांलेवा बना रहेगा। जमाना इससे कभी छक नहीं पाएगा। फिल्म में फटेहाल पर खुद्दार और पाकदिल मोटर-मैकेनिक गुरुदत्त, जो श्यामा से प्यार करता है, शकीला से, जो अपनी बिगड़ी मोटर सुध्ारवाने आई है और गुरुदत्त को अपना बनाना चाहती है, पूछता है,'इस गाड़ी में क्या खराबी है?' शकीला दो अर्थों वाला जवाब देती हैं- 'यही तो समझने की कोशिश कर रही हूं!' और हम, नैयर के दीवाने भी, यही समझने की कोशिश कर रहे हैं कि घर-बार से बरबाद, आशा भोंसले से बरबाद, अपने दिल से बरबाद, यह खुद्दार, बिगड़ैल, जीनियस, दि कम्पोजर ओ पी नैयर इतना आलमफतही और मीठा संगीत कैसे दे गया! इसका राज क्या है? एक बार फिर, आखिरकार, वही भगवान जैसी चीज याद आने लगती है!

    चलते-चलते:

    'जिसे दीवानगी कहते हैं, उल्फत की नबव्वत है

    गनीमत है जो सदियों में कोई दीवाना हो जाए।'

    (नबव्वत याने पैगंबरी, नबी का पद)।

    - अजातशत्रु

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