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    वेडिंग एनिवर्सरी

    Published: Thu, 23 Feb 2017 02:08 PM (IST) | Updated: Thu, 23 Feb 2017 03:31 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    शेखर एस. झा की ‘वेडिंग एनिवर्सरी’ महान लेखक जलालुद्दीन रूमी की सोच का सार बनने की कोशिश करती है। वो यह कि प्यार में दूरियां मायने नहीं रखतीं। खासकर तब, जब आपस में सच्चा प्यार हो। इस तरह यह फिल्म ‘लौंग डिस्टेंस रिलेशन’ में पड़े युवक-युवतियों के अनुत्‍तरित सवालों के जवाब की श‍क्‍ल अख्तियार करती है। एक पल की जुदाई तक बर्दाश्‍त न करना भी खुदगर्जी ही है। साथ ही जिस रिश्‍ते में शारीरिक जरूरतें हावी हों, वह प्रेम नहीं छलावा है। लिप्सा है। शेखर इन्हें जाहिर करने को छायावाद की राह पकड़ते करते हैं। हिंदी सिनेमा में किस्सागोई का यह अनूठा प्रयोग है। गिनती के मौकों पर उपमाओं के सहारे कहानी कही गई है। इस पैटर्न में दोहरी-तिहरी जिंदगी जी रहे किरदारों की उलझनें बाकी किरदार अपने क्रियाकलाप से जाहिर करते हैं।

    ‘वेडिंग एनिवर्सरी’ बेहतर प्रयोगवादी फिल्म साबित हो सकती थी, पर ढीली पटकथा, सतही तर्क और सहकलाकारों की कमजोर अदायगी ने ऐसा न होने दिया। इसमें एक रात का किस्सा है, मगर उक्त खामियों के अलावा मंथर रफ्तार इसे असरहीन बना दिया। इसकी नायिका का नाम कहानी है। इंवेस्टमेंट बैंकर निर्भय उसका पति है। दोनों मुंबई में रहते हैं। तयशुदा योजना के तहत उनकी सालगिरह का जश्‍न गोवा में होना है। कहानी वहां पहले पहुंच चुकी है। निर्भय जरूरी काम के चलते उस रात नहीं पहुंच पाता। कहानी निराश और नाराज हो जाती है। मिजाज ठीक करने की खातिर वह अपने पसंदीदा लेखक नागार्जुन की लिखी कहानी प्रतिबिंब पढ़ने लग जाती है। उसकी आंख लग जाती है। अचानक उसकी नींद खुलती है।

    देर रात नागार्जुन दरवाजे के बाहर खड़ा मिलता है। शुरूआती शक-ओ-सुबहा व नोंकझोंक के बाद वह नागार्जुन को अंदर आने देती है। अपनी नाराजगी की वजह जाहिर करती है। फिर शुरू होता है नागार्जुन द्वारा उसे समझाने का सिलसिला। दोनों गोवा की सड़कों पर निकलते हैं। राह में प्रेम व वासना के द्वंद् से जूझ रही जोडि़यां उनसे टकराती हैं। वे कोई और नहीं, बल्कि असल में कहानी के जहन में घुमड़ती जिज्ञासा, धारणाएं व पूर्वाग्रह हैं। नागार्जुन हरिवंश राय बच्चन और अटल बिहारी बाजपेयी व अन्य गणमान्य लोगों की कविताओं से कहानी का संशय दूर करने का प्रयास करता है। लेखन की कमजोरी यहीं दिखी है। नागार्जुन बने नाना पाटेकर की जुबान से भी कविताओं की पंक्तियां वजनी नहीं बन पाई हैं।

    सहकलाकारों की बदतरीन अदाकारी से सीक्वेंस हास्यास्पद हो गए हैं। ऐसे जॉनर में कहानी पर चित्ताकर्षक यानी एंगेजिंग बने रहने का अतिरिक्‍त दवाब होता है। सीन को टुकड़ों में जाहिर किया जाता है। निरंतर अंतराल पर केंद्रीय किरदारों के अलावा अन्य घटनाक्रम की दरकार रहती है। इनसे फिल्म महरूम रही। रही-सही कसर प्रभावहीन कैमरा वर्क और गीत-संगीत ने पूरी कर दी। कहानी प्ले कर रहीं माही गिल पर कैमरा जरूरत से ज्यादा क्लोज था। परिणामस्वरूप संवाद अदायगी के दौरान उनके चेहरे पर फ्लैट भाव कैमरे में कैद हुए। पर्दे पर वह देखना हताशाजनक था। नाना पाटेकर ने अपने कंधे पर फिल्म को बचाने की भरपूर कोशिश की, मगर नाकामी ही हाथ लगी है। ऐसा साफ लगा कि उन्हें संवाद कुछ और मिले, लेकिन पर्दे पर अंतिम उत्‍पाद कुछ और निकल कर आया है। निर्भय के रोल में प्रियांशु चटर्जी मेहमान भूमिका में हैं।

    -अमित कर्ण

    अवधि: 108 मिनट

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