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    27 साल पहले लिए गुरु के संकल्प को शिष्य ने किया पूरा

    Published: Wed, 15 Nov 2017 07:00 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Nov 2017 07:31 AM (IST)
    By: Editorial Team
    temple 15 11 2017

    इंदौर। गुरु शहर के अन्नपूर्णा आश्रम के संस्थापक महामंडलेश्वर स्वामी प्रभानंद के संकल्प को 27 साल में शिष्य महामंडलेश्वर विश्वेश्वरानंद ने पूरा किया। इस संकल्प को पूरा करना आसान नहीं था। इसके लिए त्रयम्बकेश्वर में ज्योर्तिलिंग के समीप स्थित स्थित नीलगिरी पर्वत श्रंखला पर स्थित पहाड को काटा गया।

    इसके बाद 27 करोड की लागत से 7200 वर्गफीट क्षेत्र में मां अन्नपूर्णा के संगमरमर से बने मंदिर का निर्माण किया है। अब इसके प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव की तैयारी की जा रही है। 18 से 28 फरवरी तक आयोजित होने वाले महोत्सव के मौके पर शतकुंडात्मक लक्षचंडी महायज्ञ होगा।

    इसमें शहर के हजारों श्रद्धालुओं के साथ देश के सात राज्यों के 1 लाख श्रद्धालु भाग लेंगे। शतकुंडात्मक लक्षचण्डी महायज्ञ के लिए यज्ञशाला का निर्माण शुरू हो गया है। प्राण प्रतिष्ठा के लिए 1931 किलो वजनी मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा मंदिर पहुंच गई है। इसी तरह मां सरस्वती की 750 किलो और महाकाली की 470 किलो वजनी पंचधातु की प्रतिमाएं भी यहां स्थापित होगीं।

    मुख्य मंदिर के वाम भाग में भैरवनाथ का एक अन्य मंदिर भी यहां आकार ले चुका है जिसमें संगमरमर की 600 किलो की प्रतिमा स्थापित होगी। आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरी बताया कि इंदौर व ओंकारेश्वर के बाद त्र्यंबकेश्वर में एक मंदिर के निर्माण का स्वप्र आश्रम के संस्थापक ब्रम्हलीन स्वामी प्रभानंद गिरी ने अपने जीवनकाल में 27 वर्ष पूर्व संजोया था।

    इसके लिए उन्होंने उस समय तीन लाख रूपए की राशि भी जमा कर रखी थी,लेकिन उनके महाप्रयाण के कारण यह योजना मूर्त रूप नहीं ले पाई । गुरु के संकल्प को पूरा करने की जिम्मेदारी शिष्य की होती है। ट्रस्टी श्याम सिंघल ने बताया कि वर्तमान महामंडलेश्वर और उनके शिष्य स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरी ने 1995 में त्र्यंबकेश्वर पहुंच कर आश्रम के लिए जमीन देखी और नीलगिरी पर्वत पर करीब 4 एकड भूमि स्थानीय अखाड़े के सहयोग से प्राप्त की । वर्ष 2002 तक इस पहाडी को समतल और व्यवस्थित आकार दिया गया।

    इंदौर के श्रद्धालुओं के लिए चलेंगी विशेष बसें

    महोत्सव में इंदौर एवं मालवा क्षेत्र के लोग अधिक से अधिक संख्या में भक्त पहुंच सकें, इसके लिए इंदौर से त्र्यंबकेश्वर तक विशेष बसें चलाई जाएगी। यज्ञ में 125 क्विंंटल काले तिल,70 क्विंटल चावल,35 क्विंटल जौ,20 क्विंटल शक्कर और 10 क्विंटल शुद्ध गाय का घी आदि का प्रयोग होगा। इस मौके पर समाजसेवी विनोद अग्रवाल और वरजिन्दर सिंह छाबडा एवं किशोर गोयल मौजूद रहेंगे। प्रमुख यजमान कैलाशजी धुले (महाराष्ट्र) एवं रती भाई पटेल होंगे।

    ऐसे लिया साकार रूप : ज्योर्तिलिंग के कलश और मां के दर्शन एक साथ

    -समुद्र तल से 2300 फीट ऊंचाई पर मंदिर का निर्माण 7200 वर्ग फीट मैदान में किया गया हैं। नींव से 75 फीट ऊंचाई पर बने इस मंदिर में मां अन्नपूर्णा सहित कुल चार प्रतिमाएं स्थापित होगीं । ये सभी सोना, चांदी,तांबा,जस्ता और टीन से निर्मित पंच धातु से बनी हैं। मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा जबलपुर में बनी एवं पीथमपुर में ढाली गई हैं।

    - मां सरस्वती और महाकाली की प्रतिमाएं मुम्बई के जैन परिवार के सौजन्य से पालीताणा गुजरात में बनवाई गई हैं। भैरवनाथ की संगमरमर की प्रतिमा शहर के समाजसेवी किशोर गोयल द्वारा जयपुर से बुलवाई गई हैं।

    - मंदिर की बाहरी दीवारों पर पौराणिक गाथाओं को चित्रांकन के माध्यम से सिर्फ छैनी-हथोडी की मदद से उकेरा गया हैं। गाथाएं मंदिर की दीवारों पर मकराना के शिल्पकारों ने बेहद संजीदगी से उकेरी है।

    - मंदिर में मां के दर्शन करते हुए वाम भाग की ओर गर्दन घुमाते ही त्रयंबकेश्वर मंदिर के कलश और ध्वजा के दर्शन भी एक ही जगह पर खडे रह कर हो सकते हैं। मंदिर के तीन प्रवेश द्वार हैं। बाहर दक्षिण भारत शैली में दो दो गजराज स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में नींव के साथ 20 फीट गहराई में बारह नवग्रह एवं वास्तु यंत्र स्थापित किये गये हैं।

    - मंदिर का निर्माण 2005 से 40 मजदूरों ने दिन- रात काम कर किया है । इसके निर्माण में 125 ट्रक मार्बल का उपयोग हुआ है जो मकराणा से लाया गया । मंदिर में कही भी लकडी या कील का प्रयोग नहीं हुआ है।

    100 हवन कुंड, 200 यजमान, 800 ब्राह्मण और 200 सहयोगी

    मंदिर के नीचे तलहटी में ही लक्षचंडी महायज्ञ होगा । यज्ञ स्थल तक पहुंचने के लिए प्रवेश द्वार के सामने से सीढिय़ां बनाई गई है। नीचे के पहाडी रास्ते और मैदान को समतल बनाने में एक हजार ट्रक मिट्टी और मुरम का प्रयोग किया गया है। यज्ञशाला का निर्माण इंदौर के विद्वान आचार्य नंदकिशोर के निर्देशन में शास्त्रोक्त विधि से किया जा रहा हैं। यज्ञशाला में 100 हवन कुंड बनेंगे जिन पर 800 ब्राह्मण ,200 यजमान ,200 सहयोगी , और एक आचार्य प्रवेश कर सकेंगे।

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