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    भोपाल गैस त्रासदी : भूलती नहीं वह काली रात

    Published: Tue, 02 Dec 2014 07:51 AM (IST) | Updated: Fri, 02 Dec 2016 10:06 PM (IST)
    By: Editorial Team
    bhopal gas 2016122 215651 02 12 2014फोटो सौजन्य : DD News

    - माधव जोशी

    कैसे भूल सकता हूं उस काली रात को। उस विभीषिका को। चाहकर भी नहीं भूल सकता। वह दिन, वह महीना, वह साल। इसके बाद ही तो भोपाल विश्व मानचित्र पर आया था। लोग ठीक से भोपाल को जानने लगे थे। जानने लगे थे कि यह झीलों का शहर है। वरना पहले सिवाय मध्यप्रदेश की राजधानी के इसकी कोई पहचान न थी। न यहां किसी को यूनियन कार्बाइड के बारे में पता था और न ही उस जहरीली गैस के बारे में। मालूम होगा तो उन सरकारी अफसरों को जो इससे जुड़े कामकाज देखते होंगे या शायद उन्हें भी नहीं। सच पूछिए तो पहले भोपाल में केवल तीन चीज़ें ही फेमस थीं। जर्दा, पर्दा और नामर्दा। लेकिन उस काली रात के बाद यहां की एक और चीज़ प्रसिद्ध हुई, जिसे “यूनियन कार्बाइड” कहा जाता है।

    दिसंबर का महीना बस शुरू ही हुआ था। महीने की दूसरी रात थी। जब उस डायन फैक्ट्री ने अपना घिनौना रंग दिखाया था। वही रात फिर आने को है। जब हम उसकी बत्तीसवीं बरसी पर शोकाकुल होंगे। वही खबरें, वही चर्चा। फिर वही यूनियन कार्बाइड, एंडरसन और गैस पीड़ितों के नाम लिए जाएंगे। मैं भयाक्रांत हूं ऐसे शब्दों को लेकर। क्योंकि यह शब्द सुनते ही मेरे कानों में दर्द होने लगता है। लोगों के चीखों की अनुगूंज मेरे हृदय, मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोरने लगती है। मैं सहज नहीं रह पाता जब वह काली रात मुझे याद आती है। मैं आज भी गैस कांड से जुड़ी ख़बरें नहीं पढ़ता। खबरों का एक-एक काला अक्षर मुझे मृतकों की लम्बी कतारों सा लगता है।

    मैं कैसे भूल सकता हूं वह रात। जो मैंने पूरे मोहल्ले के साथ गुज़ारी थी। उसी रात मैंने भोपाल रेलवे स्टेशन का एक अलग ही रूप देखा था। स्टेशन नहीं, सैकड़ों मुसाफिरों की कब्रगाह थी वह। न किसी को ट्रेन से उतरना था और न ही किसी को चढ़ना। क्योंकि ट्रेन खुद सो चुकी थी। पहली बार मौत की वह विरल खामोशी मैंने महसूस की थी। सन्नाटे की आवाज सुनी थी। कैसे भूल सकता हूं वह साल, जब मुझे वार्षिक परीक्षा में जनरल प्रमोशन मिला था। नहीं भूल सकता क्योंकि उसी भंयकर त्रासदी के कुछ महीनों बाद मैंने अपनी छोटी बहन को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया था। नहीं भूल सकता, कभी नहीं भूल सकता।

    एक बार फिर 2-3 दिसंबर की रात आने को है। वही मंजर मेरी आंखों के सामने फिर घूम रहा है। वही रात, जिस वक्त ये हादसा हुआ था। मैं आज भी सुबह सबसे पहले भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं कि उसने मुझे लड़ने की शक्ति दी। मुझे व मेरे परिवार को उस भयंकर त्रासदी में जीवित रखा। अपने धैर्यवान पिता को भी धन्यवाद कहना नहीं भूलता, जिनकी अटूट इच्छाशक्ति और साहस ने न सिर्फ हमारे परिवार बल्कि ईस्ट रेलवे कॉलोनी के अनेक परिवारों को सुरक्षित रखा। शायद पिता इसे ही कहते हैं। वह होता ही इसलिए है, जो विषम समय में अपने परिवार की रक्षा कर सके। मां लाख शिकायतें करती रहीं लेकिन पिता ने अपना धैर्य नहीं खोया। आख़िरी दम तक सबसे कहते रहे, 'घबराओ मत, एक जगह बैठ जाओ, भागो मत, थोड़ी देर कम सांसों से ही काम चलाओ। हो सके तो मुंह से हवा बाहर फेंको। सबकुछ ठीक हो जाएगा।' पिता को भी आंखों में जलन और सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। इसके बावजूद वह भागे नहीं। सबको संगठित करते रहे। उस समय तो ऐसा लग रहा था कि मेरे पिता के दो नहीं, सैकड़ों बच्चे थे। मेरे बचपन का हीरो, मुझे सुपर हीरो नज़र आ रहा था।

    यूं घूमीं सुइयां

    2 दिसंबर की रात हमारा परिवार तकरीबन रात 10 बजे सो चुका था। जाड़े के दिन थे। रजाई में घुसने की हर किसी को जल्दी थी। घड़ी की सुइयां आहिस्ता-आहिस्ता उस भयंकर त्रासदी की ओर बढ़ रही थी। रात को तकरीबन एक बजा होगा। एकाएक रजाई में दम घुटने लगा। अचानक आंखों में जलन और जोरदार खांसी शुरू हुई। मैंने सिर से रजाई हटाई तो जलन और बढ़ गई। दूसरे कमरे में मेरी मां, पिता और मेरी छोटी बहन थे। वहां भी यही हालात थे। तभी पिता ने गैस सिलेंडर चेक किया तो मां पिछली बालकनी की ओर भागी। यह देखने के लिए कि पीछे मैदान में चल रही शादी में सब कुछ ठीक तो है। कहीं कोई शामियाने में मिर्च फेंक कर लूटपाट तो नहीं कर रहा, लेकिन वहां पसरा सन्नाटा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था। शामियाना खाली पड़ा था। वहां कोई नहीं था। सारे मेहमान-बाराती भाग चुके थे। शामियाना अकेला खड़ा था। बारात लौटने से क्षुब्ध दुल्हन की तरह। अपने नसीब को कोसता हुआ। मां दौड़कर वापस अंदर की ओर भागी। तभी मैंने अपने छोटी बहन के चीखने की आवाज सुनी। मैं भी उस ओर भागा। पिता भी रसोई से बेडरूम में आ गए।

    ईस्ट रेलवे कॉलोनी के आख़िरी छोर पर लगभग सभी इमारतें चार मंज़िलां ही थी। हम भी उन्हीं मे से टाईप-3 क्वार्टर में रहा करते थे। चौथी मंजिल का हमारा मकान यूं समझिए कि बस दूसरा हवा महल था। शुद्ध ताज़ी हवा दिनभर घर मे दौड़ा करती थी। न जाने कितनी बार दरवाज़े इन्हीं बदमाश हवाओं के कारण बजा करते थे, लेकिन उस दिन हवाओं को ना जाने क्या हुआ। न जाने किसकी नज़र लगी, जो इतनी ज़हरीली हो गई।

    गैस पूरी तरह से घर में फैल चुकी थी। पीड़ा असहनीय होती जा रही थी। तभी मोहल्ले की बिजली भी हमारा साथ छोड़ गई। मां रह-रह कर भगवान को पुकारने लगी। हम पिता से सटकर अपना टूटता साहस जोड़ने की कोशिश करने लगे। कभी मां हमसे लिपटी तो कभी हम मां से। जैसे ही जलन जोर मारती, मां हमें अपने सीने से लगा लेती। तभी एकाएक मेरी बहन को एक ज़ोरदार उलटी हुई। देखते ही देखते सारा बिछावन खराब हो गया। यह देख, पिता ने दरवाजा खोला तो मां चिल्ला पड़ी, 'क्या करते हो। बंद करो दरवाजा। देखते नहीं कितनी तकलीफ हो रही है।'

    मैं वापस अपने कमरे की ओर दौड़ा। पलंग पर रखी अपनी रजाई चारों ओर से लपेट ली, लेकिन फिर भी रहा न गया। दम घुटा जा रहा था। अतः मां-मां पुकारता वापस उसी कमरे में लौट आया। मां–पिता की लाचारी साफ नज़र आ रही थी। हम सब आंखें मलते ही दूर होने लगते और फिर जैसे ही दम घुटने लगता, फिर एक हो जाते। वे बार-बार बहन की आंखें पोंछते और उसे प्यार करते, लेकिन जलन थी कि थमने का नाम नहीं ले रही थी। एक बार फिर दम घुटने लगा। सांस फूलने लगी। हाथ-पैरों पर खुजली सी मचने लगी। आंखों पर अंधेरा सा छाने लगा। हम दोनों मां-मां चिल्लाने लगे। तभी पिता ने पास रखा टॉर्च जलाया और ढाढ़स बंधाने लगे। एकाएक मां ने हम सबको अपने पास खींच लिया और बोली, 'अब जो होना होगा, होगा। मरना ही है तो एक साथ मरेंगे।'

    एक मां का दिल भी क्या होता है। जो हरदम अपने बच्चों के साथ जीना चाहती है और मरने के वक्त भी वह बच्चों के साथ ही मरना चाहती है। 'श्रीराम कहो, श्रीराम कहो...' मां का जाप निरंतर जारी था। हालात बेकाबू हो रहे थे। आखिर पिता ने हम सबको घर के बाहर निकल कर नीचे सड़क पर चलने को कहा।

    जैसे-तैसे अंधेरे में घर का दरवाजा खोला गया। दरवाजा खुलते ही सामने के मकान से भी रोने-चीखने की आवाजें सुनाई देने लगी। वहां भी यही हालात थे। अंकल बरामदे में पड़े थे और आंटी सीढ़ियों पर विक्षिप्त अवस्था में दीवार नोच रहीं थीं जबकि उनके दोनों बच्चे बाथरूम में बैठे-बैठे रो रहे थे। हर ओर उल्टी, पेशाब और मल बिखरा पड़ा था। समझ से परे था कि यह क्या हो रहा है? निचली मंजिलों से आता शोर मन को और भयभीत कर रहा था। सारे मोहल्ले में चीख-पुकार मची थी। चार मंजिल उतरते-उतरते हालत खराब हो चुकी थी। पैर मल से सने तो हाथ उल्टियों से गंदे, चिपचिपे हो गए थे। तभी पिता ने हमारे मुंह पर कस कर तौलिया बांधा और पड़ोसियों को बाहर निकालने में जुट गए। शायद उस समय रात के दो बजे होंगे। आश्चर्य की बात थी कि आज ट्रेनों की आवाजें नहीं आ रही थी। वरना ऐसा कभी हुआ नहीं कि कोई ट्रेन गुजरे और हमें पता न चले।

    हमारा घर भोपाल स्टेशन से बिल्कुल नजदीक था। पटरी के इस ओर हमारी कॉलोनी थी, जिसे ईस्ट रेलवे कॉलोनी कहा जाता था। 'खजांची का बाग' इसका एक नाम और भी था जबकि पटरी के उस ओर वेस्ट रेलवे कॉलोनी थी। उसी से कुछ किलोमीटर आगे थी 'यूनियन कार्बाइड'। जहां से वह विषैली गैस रिस रही थी। महज तीन-चार किलोमीटर का फासला था हमारे और उस डायन फैक्ट्री के बीच।

    सच कहूं तो इससे पहले हमने उस ओर कभी देखा ही नहीं। पता भी नहीं था कि वह कौन सी फैक्ट्री है। वहां क्या काम होता है। मालूम होता कि वह एक अमेरिकन फैक्ट्री है तो शायद हम घर पर आने वाले हर मेहमान को उसे दिखलाते। हरदम इस बात पर इठलाते कि हमारे भोपाल में एक अमेरिकन फैक्ट्री भी है।

    वक्त गुजरता गया। मुझे भी कुछ आराम महसूस हुआ। पिता अब भी सबको निकालने में जुटे थे। हर ब्लॉक से यही नज़ारा देखने को मिल रहा था। कॉलोनी के सारे परिवार एक एक कर सड़क पर जमा होने लगे थे। सबकी हालत देखने लायक थी। एक नज़र में तो लग रहा था जैसे सारे पात्र किसी विभीषिका का मंचन करने पधार रहे हों, लेकिन वह अभिनय नहीं बल्कि वास्तविकता थी। मामला ज्यादा पेचीदा होने लगा था। सभी असंयमित हो रहे थे। किसी ने कहा, 'चलो, यहां से भागो।' तो कोई कहता 'नहीं बड़े तालाब चलो। वहीं पानी से आंखें धोएंगे तभी सुकून मिलेगा।' मगर मेरे पिता इन बातों से सहमत न थे। वे सबसे कह रहे थे कि 'भागो मत, अपने आप पर विश्वास रखो। भागने से तकलीफ और बढ़ेगी। मरना ही लिखा है तो कहीं भी मरोगे, फिर यहां क्यों नहीं?'

    इसके बाद तो जैसे सब मेरे पिता के दुश्मन बन गए। 'जोशीजी! आपको मरने का शोक है तो आप शौक से मरिये। लेकिन हमारी जान से मत खेलिए।' तो कोई कहता 'आपको तकलीफ नहीं हो रही इसलिए आप ऐसा कह रहे हैं। लेकिन हमें अब सहन नहीं हो रहा। हम तो बस अब मरने ही वाले हैं।' लेकिन, दूसरे ही पल जब वे मेरे पिता को भी अपनी लाल सुर्ख आंखें मलते देखते तो चुप हो जाते। आंखों में असहनीय जलन और सूजन थी। किसी को शरीर पर खुजली तो किसी को नाक से खून भी निकलने लगा था। हालात भयावह थे। कौन कब चल बसे कहा नहीं जा सकता था। मोहल्ले के वे लोग जो एक दूसरे की आंखों में प्रेम देखा करते थे वे आज उनमें मौत देख रहे थे। वह भी ऐसी दर्दनाक मौत जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। शायद मौत भी ऐसे ही वक्त की तलाश में होती है। यह वही लम्हें थे जिन्हें याद कर आज भी मैं अपने आप को जिंदा महसूस करता हूं। मौत न तो धर्म देखती है और न जात-पात। वह न तो अमीर देखती है और न ही गरीब। न बड़ा, न छोटा। अपनी मर्जी की मालिक होती है मौत। कब किसे अपने पास बुला ले किसे पता।

    अब तक कॉलोनी में कई लोग इसी मौत का आवेदन स्वीकार कर चुके थे। हालात ऐसे थे कि बेटे को बाप की लाश पर सिर रखने की न हिम्मत थी और न ही फुर्सत। वह अपने ही कष्टों में व्यस्त था। तकरीबन घण्टे-दो घण्टे बाद कुछ राहत महसूस हुई। पता नहीं कोई पुरवाई चली हो, जो डायन गैस का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले गई। यह कहकर कि बस बहुत हो चुका तेरा नंगा नाच। अब तो उन्हें चैन से जीने दे। हालांकि, बाद में विश्लेषणों से मालूम हुआ कि गैस भारी थी इसलिए वह जल्द नीचे दब गई। कारण जो भी रहा हो कुछ घण्टों बाद राहत मिली जरूर।

    यूनियन कार्बाइड से सटे इलाकों में मामला और भी गंभीर था। वहां मिथाईलआइसोसाइनाइट से मरने वालों की तादाद कहीं ज्यादा थी। मौत की गति ऐसी की इबोला भी हार मान ले। लोग पागलों की तरह भाग रहे थे। मानो सड़कों पर मैराथन चल रही हो। हजारों की तादाद में लोग भागे जा रहे थे। जिसे जो वाहन मिलता, वह उस पर लटक जाता। गिरने वाले को उठाने की फुर्सत किसी को नहीं थी। किसी को यह भी होश नहीं था कि वह कैसे भाग रहा है। तन पर कपड़ा है भी या नहीं। होश होता भी कैसे आज प्रतिस्पर्धा मौत से थी। जब मौत पीछे पड़ी हो तो तन का कपड़ा कौन देखता है। कुछ लोग, उस रात जो सोए तो सदा के लिए सो गए। वे कभी उठे ही नहीं। कुछ ऐसे भी बिरले निकले जिन्हें रात कैसे बीती उन्हें कुछ पता नहीं।

    उस रात भोपाल दो भागों में बंट चुका था। जहां पुराना भोपाल अपने वर्तमान से जूझ रहा था तो वहीं नए भोपाल के लोग रजाइयों में दुबके अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे। उन्होंने तो सुबह चाय की चुस्कियों के साथ गैस रिसाव की ख़बर पढ़ी, लेकिन दिन चढ़ते उन्हें यह अहसास भी हो गया कि बीती रात आधे भोपाल ने कैसे गुजारी।

    सर्दियों के दिन थे मगर वातावरण में गैस की उपस्थिति से गर्मी आ गई थी। लोग सड़क पर बेसुध पड़े थे। तभी, दूर से भागकर आते कुछ लोगों ने बताया कि 'उस फैक्ट्री से अब भी जहरीली गैस रिस रही है। भागो वरना सब मारे जाओगे।' सुनकर एक बार फिर भगदड़ मची लेकिन मेरे पिता टस से मस न हुए। यह देख अधिकांश लोग मेरे पिता के साथ ही खड़े रहे। अतः जल्द ही सबकुछ शांत हो गया। अब हमारे इलाके में गैस का प्रभाव कम हो चुका था।

    सुबह के चार बजे थे। तभी पड़ोस के एक भाईसाहब मुझसे बोले, 'चलो तुम्हें घूमा लाते हैं। स्टेशन तक देख आते हैं। क्या हालात हैं।' वे उम्र में मुझसे काफी बड़े थे, लेकिन वक्त का तकाज़ा था कि उन्हें उस रात सिवाय मेरे कोई और न मिला। हम यहां-वहां टहलते स्टेशन पहुंचे। सारा स्टेशन रोज की ही तरह रोशनी से जगमगा रहा था। एक हलकी सी जहरीली धुंध आसमान में थी, लेकिन आज न चहल-पहल थी और न वैसा शोर। कुछ लोगों के कराहने की आवाजें जरूर वहां तक सुनाई दे रही थी। स्टेशन पर पहुंचे तो एक पल भी खड़ा न रहा गया। इतना भयानक दृश्य मैंने आज तक कभी नहीं देखा था। चारों तरफ लाशें ही लाशें। ट्रेन के डिब्बों में लोग लेटे पड़े थे। भोपाल का प्लेटफार्म नम्बर एक तो जैसे गहरी नींद में था। वह दृश्य देख हम उस रात किस गति से वापस घर लौटे मुझे याद नहीं।

    सुबह हो चुकी थी, लेकिन वह सुबह वैसी नहीं थी जैसे हर रोज हुआ करती थी। पौ फटी जरूर मगर चिड़ियों का चहचहाना न हुआ। मुर्गे ने बांग नहीं दी। सुबह दूध वाले की आवाज नहीं आई। साईकल पर अखबार बांटने वाले नज़र नहीं आए। बल्कि हर तरफ से चिल्लाने और रोने की आवाजें आ रही थी। मानों आज मोहल्ले में किसी ने रुदालियों को न्योता दिया हो। सुबह जिनके हाथों में हमेशा चाय का कप हुआ करता था आज वो दवा की शीशी थामें थे। फिर भी हमारे कॉलोनी में उतनी मौतें नहीं हुई जितनी वेस्ट रेलवे कॉलोनी और यूनियन कार्बाइड से सटे इलाकों में हुईं।

    रात भर जागने की वजह से मेरी नींद सुबह कुछ देर से खुली। उठा तो देखा पिता घर पर नहीं थे। मां ब्लॉक की सीढ़ियां धो रही थी। पूछने पर मां ने कहा, 'पिता तो सुबह से ही पीछे के रेलवे अस्पताल में गए हैं।' मैं दौड़कर अस्पताल गया तो देखा वे डिस्पेंसरी में खड़े हो कर दवाइयां बांट रहे थे। यह देखकर पिता के लिए सम्मान और बढ़ गया। अस्पताल में लोगों का हूजूम उमड़ पड़ा था। लोग जरूरत से ज्यादा दवाइयां ले रहे थे। इस डर से कि कहीं फिर मिले न मिले। तकरीबन बारह बजे डॉक्टरों की एक टीम सफेद एम्बेसेडर कार में हमारी कॉलोनी में पहुंची। लोग टूट पड़े। बूढ़ी औरतें उन्हें दुवाएं देने लगी। 'तुम तो देवता हो देवता, तुम लोग न आते तो हम अल्लाह को प्यारे हो जाते।' तभी कोई डॉक्टरों की जेब में पैसे ठूंसता तो कोई दुवाएं देता। कुछ उनके उपकरण खींचने लगते तो कुछ दवाइयां छीनने लगते। तभी, कुछ पल ही बीते थे कि कहीं से अफवाह उड़ी कि 'फिर से गैस रिसाव शुरू हो गया है।' आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह बात लोगों के कानों तक पहुंचती इससे पहले ही सारे डॉक्टर वहां से भाग चुके थे। ऐसे कमाल के थे वे देवतागण।

    दिन चढ़ने लगा। सारा आसमान चील-कौवों से पट गया। सड़कों पर कई मवेशी मरे पड़े थे। गाय-भैंसे तो फूल कर दुगनी-चौगुनी हो गई थीं। दिन रात गलियों में भौंकने वाले कुत्ते नालियों में पड़े थे। पेड़ों के नीचे पंछी तड़प रहे थे। इससे पहले कभी ऐसा भयावह रूप नहीं देखा था। मुंह से सफेद झाग और पूरे बदन से बदबू आ रही थी।

    दिन बीता, रात बीती। कई दिन तक मवेशियों को इकट्ठा करने का काम चलता रहा। शहर में हाहाकार मचा था। कइयों के घर खुले पड़े थे तो कई बिना दरवाजा खोले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके थे। इतनी लाशें कि भोपाल का श्मशान घाट भी छोटा पड़ गया। सैकड़ों की तादाद में लाशें ट्रकों से मैदानों पर लायी जा रहीं थीं। एक के ऊपर एक उन्हें रखा जाता और फिर ऊपर से ढ़ेर सारा मिट्टी का तेल, पेट्रोल डाल उनमें आग लगा दी जाती। जहां रोज सैकड़ों चिताएं जल रही थीं, वहीं हजारों लोग अब भी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। दिन गुजरते गए। मृतकों की संख्या बढ़ती गई। तकरीबन दस हजार मौतों की गिनती सप्ताह भर में हो चुकीं थी।

    आज इस बात का अफसोस है कि विश्व इतिहास में 'भोपाल' का नाम भी हिरोशिमा और नागासाकी की तरह जुड़ गया। काश, दुनिया भोपाल को किसी और वजह से याद रख पाती। कम से कम हमें दुनिया के सामने दया का पात्र तो नहीं बनना पड़ता। यह कहकर कि मैं भोपाल से हूं। एक गैस पीड़ित हूं।

    - संस्मरणकर्ता मशहूर कार्टूनिस्ट है।

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