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    बीएमओ बोले : इन्हें पलंग पर लिटाओ या जमीन पर क्या फर्क पड़ता है

    Published: Wed, 15 Nov 2017 08:19 PM (IST) | Updated: Thu, 16 Nov 2017 09:51 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    कराहल। आदिवासी विकासखंड कराहल में रहने वाली सहरिया जनजाति के पिछड़ेपन के लिए प्रशासनिक अफसर भी जिम्मेदार हैं। बुधवार को नसबंदी कराने आई 80 आदिवासी महिलाओं की सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कराहल में नियम विरुद्ध शाम 7 बजे तक नसबंदी की जाती रही। नसबंदी के बाद उन्हें जमीन पर बैठा दिया गया। घर छोड़ने के लिए वाहन भी नहीं दिए गए।

    इस संवेदनहीनता के लिए जिम्मेदार बीएमओ डॉ. विजेन्द्र सिंह से पूछा गया तो उनका कहना था कि ये सहरिया महिलाएं हैं। इन्हें पलंग पर लिटाओ या जमीन पर, क्या फर्क पड़ता है। बीएमओ यहीं नहीं रुके।

    उन्होंने आगे कहा कि इनके बच्चे कौन से दिनभर में 10 बार खाना खाते हैं जो खिलाने की जरूरत पड़े। घर जाकर खा लेंगे। बुधवार को कई गांवों से नसबंदी कराने के लिए सुबह 9 बजे से ही आदिवासी महिलाओं को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर लाकर बैठा दिया गया।

    दोपहर 12 बजे डॉक्टरों के आने की बात स्टाफ प्रबंधन कहता रहा, लेकिन 2 बजे के बाद जिला अस्पताल से डॉ. बीएल यादव एवं जितेन्द्र यादव पहुंचे। इसके बाद उन्होंने ऑपरेशन शुरू किए, जो शाम 7 बजे तक चलते रहे। नियमानुसार 5 बजे के बाद ऑपरेशन नहीं किए जाने चाहिए लेकिन, लक्ष्य पूरा करने की आपाधापी में शाम 7 बजे तक नसबंदी की गई।

    इस दौरान 80 महिलाओं की नसबंदी सिर्फ दो डॉक्टरों द्वारा कर दी गई। नसबंदी के लिए स्वास्थ्य विभाग महिलाओं को बाइक पर बैठाकर या सरकारी वाहन से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तो ले आए, लेकिन नसबंदी के बाद उन्हें अपने भरोसे छोड़ दिया। अस्पताल में पहुंचे प्राइवेट टैक्सी चालकों ने हर महिला से किराया वसूलकर उसे घर तक पहुंचाया। इस दौरान महिलाओ के साथ आए बच्चे व दूसरे रिश्तेदार दिनभर भूखे इधर-उधर भटकते रहे।

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