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    'डेढ़ रुपए के दीये पर मत करो मोलभाव, मिट्टी में पसीना बहाने के बाद बनते हैं ये'

    Published: Sat, 14 Oct 2017 04:12 AM (IST) | Updated: Sat, 14 Oct 2017 12:04 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    विजय राठौर, भोपाल। बेटा ये डिजाइनर दीये हैं। 10 रुपए के 5 हैं, लेकिन तुम्हें 10 के 7 दे दूंगी। इससे ज्यादा मोलभाव मत करो। मिट्टी खोदने, पीसने, गलाने, बनाने और तपाने में पसीना बहाने के बाद तैयार होता है दीया। इसमें मोलभाव करोगे तो हमें क्या मिलेगा। वैसे भी मेरी तबीयत ठीक नहीं है। त्योहार सिर पर है, इसलिए चार पैसों की आस में बैठी हूं।

    इतना सब, एक सांस करीब 60 साल अम्मा ने बोल दिया, बगैर हमारे कुछ कहे। अम्मा, न्यू-मार्केट के एक कोने में अपने दीये की टोकरी को रख कर बैठी हुई है। हाथ में कपड़ा है जिसे कभी अपने माथे पर रखती है तो कभी उससे आंखों में आ रहे आंसू पौंछ रही है। कड़ी धूप में अम्मा इस उम्मीद के साथ बैठी है कि बाजार में हजारों रुपए की खरीददारी करने कुछ दिए उसके भी खरीद लेंगे। उसे चार पैसे मिल जाएंगे, उसका घर भी दीवाली पर रोशन हो जाएगा।

    शांति बाई नाम की यह अम्मा बताती है, दिवाली आने के तीन महीने पहले से दीये बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। काली, लाल और रेतीली मिट्टी को मिलाकर पहले सुधाते हैं, फिर कूटते हैं और फिर मिट्टी को गलाने के बाद पीसते हैं। उसके बाद कहीं दीये बनाने का काम शुरू होता है। दीये को आकार देने के बाद उन्हें घंटों लकड़ी व कंडों की आग में पकाया जाता है।

    एक दिन में अधिकतम 2 हजार दीये बन पाते हैं। यही दीये जब बिकते हैं तो हमारे घर में बरस-बरस का यह त्यौहार मनता है। यहां लोग बड़ी-बड़ी दुकानों में जाते हैं, हजारों रुपए का सामान खरीदते हैं पर कोई भावताव नहीं करते। वही लोग रुपए- दो रुपए का मोलभाव किए बगैर हमसे दीये नहीं लेते।

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