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    जिसने चोर देखा ही नहीं पुलिस उसी से कह रही पहचान कौन

    Published: Tue, 20 Jun 2017 07:49 AM (IST) | Updated: Wed, 21 Jun 2017 08:44 AM (IST)
    By: Editorial Team
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    जबलपुर। पुलिस खुद के हाईटेक होने का दावा भले ही करे, लेकिन तमाम संसाधनों के बावजूद आज भी चोरी जैसे वारदातों की जांच वर्षों पुराने ढर्रें पर ही हो रही है। हैरानी की बात यह है कि पुलिस आज भी पीड़ितों से ही संदिग्धों की शिनाख्त परेड कराकर उन्हीं से चोरों को पहचानने के लिए कह रही है।

    ऐसे में पहले ही लाखों का माल गवां चुके लोगों को नहीं सूझ रहा कि जिसे उन्होंने चोरी करते हुए देखा ही नहीं उसे पहचाने कैसें? पुलिस की इसी लचर जांच प्रणाली और सुस्त कार्रवाई का नतीजा है कि शहर में चोरियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

    पुलिस की जांच से पीड़ित परेशान

    केस-1

    गोहलपुर क्षेत्र में संजीवनी अस्पताल के पास रहने वाले रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर तारिक हनफी के घर 23 मई को दिनदहाड़े घुसे चोर 17 मिनट में ही 15 तोला सोने के जेवर और 1 लाख 90 हजार नकद चुराकर भाग निकले थे। सूचना पर पुलिस, डॉग स्क्वॉड, फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट के साथ मौके पर पहुंची। घंटों जांच चली पर चोरों का कोई सुराग नहीं मिला।

    कैमरे में चोर दिखे, पर चेहरे क्लीयर नहीं

    चोरों की तलाश में जुटी पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, तो उसे एक कैमरे में कुछ संदिग्ध दिखे। लेकिन आरोपियों के चेहरे क्लीयर नहीं थे। ऐसे में पुलिस ने पारंपरिक अंदाज में संदिग्धों की धरपकड़ की कार्रवाई शुरू की।

    थाने बुलाकर कराई जा रही पहचान

    कुछ संदिग्धों को हिरासत में लेने के बाद उनकी पहचान के लिए इंजीनियर तारिक को रात में ही थाने बुलाया गया और नए सिरे से घटना के बारे में पूछताछ की गई। लंबी पूछताछ के बाद उनसे संदिग्धों में से चोर की पहचान करने के लिए कहा गया, जिसे वह नहीं कर सके।

    केस-2

    गोरखपुर में साहिल शूज के नाम से जूतों का शोरूम चलाने वाले नीरज बिल्ला के आदर्श नगर स्थित घर में चोरों ने 27 मई को दरवाजा तोड़कर 45 तोला सोने के जेवर और नकदी पार कर दी थी। वारदात के बाद गोरखपुर पुलिस ने घटना के दौरान इलाके में एक्टिवा सभी मोबाइल नंबरों की सीडीआर निकालकर चोरों को ट्रेस करने की कोशिश की, आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, पुराने चोरों को हिरासत में लेकर पूछताछ की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। मामले में लकीर पीट रही पुलिस संदिग्धों से पूछताछ के बजाए पीड़ित और उसके परिवार से ही बार-बार जानकारी जुटा रही है। इससे वह काफी परेशान हैं।

    यह है जांच की प्रक्रिया

    - चोरी की सूचना मिलते ही पुलिस फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट के साथ मौके पर पहुंचती है।

    - फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट चोरों की उंगलियों के निशान जुटाते हैं।

    - खोजी कुत्तों से चोरों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है।

    - आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की जाती है।

    - रात के समय अमूमन चोरों के चेहरे साफ नजर नहीं आने पर संदिग्धों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की जाती है।

    - साइबर सेल की मदद से एरिया में घटना के दौरान मोबाइल नंबरों की सीडीआर निकवाई जाती है।

    यह होना चाहिए

    - एक सेवानिवृत्त सीएसपी के मुताबिक लोकार्डों का सिद्घांत है कि घटनास्थल बोलता है। घटना के बाद पुलिस जितनी जल्दी मौके पर पहुंच कर सूक्ष्मता से जांच करेगी, उसे उतने ही सुराग मिलेंगे।

    - पीड़ित को चाहिए कि पुलिस के पहुंचने तक कम से कम लोगों को घटनास्थल पर आने दे।

    यह हो रहा

    - पुलिस घटना की जानकारी मिलने के बाद पहले यह देखती है कि घटनास्थल उसके एरिया में है कि नहीं।

    - टीआई, एसआई के नहीं होने पर उनके थाने में आने का इंतजार किया जाता है।

    - डायल 100 या अन्य पेट्रोलिंग स्टाफ को बिना पूरी बात बताए मौके पर भेज दिया जाता है।

    - इससे सबूत नष्ट हो जाते हैं। पुलिस आदतन अपराधियों से पूछताछ तक ही जांच का दायरा सीमित रखती है।

    लाखों की चोरी को ऐसे हजारों में बताती है पुलिस

    चोरी के वक्त पुलिस पीड़ित से चोरी गए सामान का ब्यौरा लेती है। इसमें जो भी जेवर पुस्तैनी बताए जाते हैं उसका दाम उस वक्त के दाम से तय कर दिया जाता है। जैसे किसी के घर में 45 तोला पुराने और नए जेवर चोरी हुए हैं, तो उसका दाम पुराने रेट से तकरीबन डेढ़ लाख तय कर किया जाता है। जबकि उनकी वास्तविक कीमत कई लाख रुपए होती है।

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