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    जर्मन शेफर्ड किट्टी ने खून देकर बचाई जेली पग की जान!

    Published: Thu, 16 Feb 2017 11:52 PM (IST) | Updated: Fri, 17 Feb 2017 08:16 AM (IST)
    By: Editorial Team

    अरविन्द शर्मा, इटारसी। इंसानों के बीच रक्तदान कर जान बचाने की कई खबरें हम रोजाना सुनते और देखते हैं, लेकिन यहां के पशु चिकित्सकों ने वेटनरी साइंस में नया प्रयोग करते हुए जर्मन शेफर्ड ब्रीड की किट्टी ने फीमेल डॉग जेली को खून देकर उसकी जान बचा ली। यह प्रयोग इसलिए खास था क्योंकि मप्र में कहीं भी पशुओं का ब्लड बैंक या क्रास मैचिंग की सुविधा नहीं है। कुत्तों का ब्लड ग्रुप मैच करने डॉक्टर्स ने जोखिम लेकर नई तकनीक अपनाई, जो पूरी तरह सफल रही।

    सवा घंटे चला ऑपरेशन

    नाला मोहल्ला के संजय वर्मा की पग प्रजाति की फीमेल जैली फेफड़ों में संक्रमण होने से एक माह से बीमार थी, उसकी बॉडी में 13 प्रतिशत से घटकर खून घटकर 4 प्रतिशत बच गया। इससे उसे सांस लेने में तकलीफ हुई और वह बेदम हो गई। उसकी जान बचाने दवाईयां दी गईं लेकिन सेहत बिगड़ती गई।

    पांच कुत्तों के सैंपल लिए

    जैली का ब्लडग्रुप निकालने पांच कुत्तों के ब्लड सैंपल डॉक्टर्स ने लिए। क्रास मैचिंग के लिए कोई सुविधा जिले में नहीं होने से टीम ने एंटीजंस आरबीसी मैच किया, वर्मा की जर्मन शेफर्ड फीमेल किट्टी से जैली का ब्लड ग्रुप मैच हो गया।

    ऐसे किया परीक्षण

    ब्लड टेस्टिंग के लिए दोनों सैंपल की लाल रक्त कणिकाएं मिलाई गई। चिकित्सकों के मुताबिक ग्रुप मैच होने पर सात मिनट में खून का थक्का जम जाता है और ग्रुप अलग-अलग होने पर ब्लड पानी की तरह हो जाता है। इस परीक्षण के बाद तय हो गया कि दोनों का ब्लड ग्रुप एक सा है। केस में डॉक्टर्स के अलावा पशु मालिक ने भी रिस्क लिया, चूंकि जैली की जान बचना वैसे भी मुश्किल था।

    ऐसे चला जटिल ऑपरेशन

    वैटनरी सर्जन डॉ. शेलेेन्द्र नेमा, वेटनरी असिस्टेंट सर्जन डॉ. सुनील चौधरी, सुनील मेहरा एवं टीम ने सुबह 9:30 बजे दोनों फीमेल को पहले जीवन रक्षक दवाएं दीं, जिससे संक्रमण की स्थिति में जान बचाना आसान हो जाए। इसके बाद किट्टी को मामूली बेहोश कर 100 मिली. ब्लड लिया गया। इसके बाद बीमार जैली को टेबिल पर लेटाकर ट्रांसफ्यूजन किया गया। शरीर में ब्लड लेबल बढ़ते ही जैली एक्टिव हो गई।

    दोपहर बाद वह खेलने-कूदने के अलावा सामान्य होकर खाना भी खा चुकी है। जोखिम भरा कदम उठाने वाले डॉक्टर्स रात तक उसकी सेहत का अपडेट लेते रहे। नेमा ने कहा कि इस सफल प्रयोग ने पूरी टीम का हौसला बढ़ाया है, भविष्य में हम इस तरह एनीमिया के केस में पशुओं की जान बचा सकते हैं। डॉ. चौधरी कहते हैं कि जैली जैसे ही नार्मल हुई, हमें लगा कि हमने उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया।

    यह भी है खास

    कुत्तों की अलग-अलग नस्ल में 12 ग्रुप का खून होता है। अधिकांश ब्रीड में नेगेटिव ग्रुप पाया जाता है।

    मप्र के महू और जबलपुर वैटनरी कॉलेज में ट्रांसफ्यूजन हो सकता है, जबकि देश के दिल्ली, बैंगलोर समेत तीन जगह वैटनरी ब्लड बैंक यूनिट हैं।

    रक्त परीक्षण एवं ट्रांसफ्यूजन दोनों काफी महंगे पड़ते हैं, इसमें कई तरह की जांच एवं दवाईयां लगती हैं।

    इलाज में डॉग ऑनर को सिर्फ ब्लड बैग खरीदना पड़ा, बाकी दवाएं अस्पताल से मुफ्त दी गईं।

    इनका कहना है

    ये हमारे विभाग के लिए खुशी की बात है कि कम संसाधनों में अच्छा काम किया है, इस तरह अनुभव के आधार पर किए गए नवाचार को हम बढ़ावा देंगे।

    सीएम शुक्ला, उप संचालक, पशु चिकित्सा विभाग

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