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    पहले पति ने दिया जो रोग वो दूसरे पति को भी लगा

    Published: Thu, 15 Jun 2017 08:23 AM (IST) | Updated: Sat, 17 Jun 2017 02:25 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    ग्वालियर। परिवार के मुखिया की एक गलती पूरे परिवार को एचआईवी का शिकार बना रही है। इस प्रकार के मामले ग्वालियर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्र में ज्यादा सामने आ रहे हैं। जिसकी वजह से तीन साल में एचआईवी के मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है।

    कई बार तो एचआईवी पीड़ित को समझाने पहुंचे डॉक्टरों की टीम को ही लोग मारने दौड़ पड़े। यही वजह है कि अब स्वास्थ्य विभाग रोगियों की काउंसलिंग के लिए एचआईवी की रोकथाम के लिए काम करने वाले एनजीओ का सहारा ले रहा है।

    एचआईवी की रोकथाम के लिए शासन द्वारा तमाम जागरुकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। साथ ही निःशुल्क दवा भी दी जा रही है। लेकिन लोग एचआईवी की दवा लेना तो दूर नाम सुनते ही भड़क जाते हैं। जिसकी वजह से कभी-कभी तो डॉक्टरों को भी अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ जाता है।

    जीआर मेडिकल कॉलेज एवं शासकीय अस्पतालों में हुई एचआईवी जांचों के मुताबिक 2014 में एचआईवी रोगियों की संख्या जहां 238 थी, वह अब बढ़कर 284 तक पहुंच गई है। इस प्रकार वर्तमान में करीब 769 रोगी एचआईवी की दवा ले रहे हैं।

    खास बात ये है कि ग्वालियर के आसपास के कुछ ग्रामीण इलाकों में एचआईवी के सबसे ज्यादा रोगी हैं। ग्रामीण क्षेत्र में लोग आसानी से इस बीमारी के सच को स्वीकार नहीं करते हैं। इसी वजह से स्वास्थ्य विभाग को एचआईवी की रोकथाम के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों का सहयोग भी लेना पड़ता है।

    निर्दोष बच्चे जन्म से दवाओं पर

    स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक पति-पत्नी यदि एचआईवी पीड़ित हैं तो जन्म लेने वाले बच्चे के भी एचआईवी पॉजिटिव होने की आशंका रहती है। नवजात की जांच संभव नहीं होती है। ऐसे में उसे जन्म के कुछ समय बाद से एचआईवी, टीबी एवं जनरल इंफेक्शन की रोकथाम की दवा शुरू कर दी जाती है।

    इस प्रकार बच्चे को 18 माह तक नियमित 3 दवा लेना पड़ती हैं। बच्चा जब 18 माह का हो जाता है तो उसका ब्लड सैम्पल मुंबई जांच के लिए भेजा जाता है। इस रिपोर्ट में यदि बच्चा एचआईवी पॉजिटिव आता है तो उसे बिना किसी गलती के जीवन भर दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है।

    एचआईवी से पीड़ित की टीबी से मौत

    एचआईवी से पीड़ित व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में ज्यादातर लोग टीबी के रोग से ग्रसित हो जाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर एचआईवी रोगियों का मौत का कारण टीबी ही होता है। इसके चलते शासन ने इन दोनों प्रोग्रामों को एक कर दिया है।

    केस-1 : मोहना क्षेत्र में पति के एचआईवी पीड़ित होने से पत्नी भी एचआईवी का शिकार हो गई। पति की मौत के बाद पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। असुरक्षित संबंध बनाने के कारण दूसरा पति भी एचआईवी से पीड़ित हो गया। इनसे एक संतान हुई है। चूंकि पति-पत्नी एचआईवी से पीड़ित हैं, इसलिए बच्चे को जन्म से ही एचआईवी, टीबी एवं जनरल इंफेक्शन से बचाव की दवाएं शुरू कर दी गईं हैं। उसे नियमित 3 दवाएं लेना होती हैं।

    केस-2 : हस्तिनापुर इलाके में एक युवक एचआईवी से पीड़ित था। जिससे बीमारी उसकी पत्नी तक पहुंच गई। पति की मौत के बाद महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया है। जिला क्षय अधिकारी को जब करीब 15 दिन पहले पता चला कि महिला खुद एवं बच्चे को दवा देने को तैयार नहीं है तो वह समझाने के लिए उसके घर पहुंचे।

    यहां पर परिजनों ने जैसे ही सुना कि बच्चे को भी एचआईवी की दवा देना पड़ेगी तो वह मारने के लिए दौड़ पड़े। हालांकि बाद में एचआईवी की रोकथाम के लिए काम करने वाली संस्था के सहयोग से दवा शुरू करवाई गई है।

    लोग सलाह भी नहीं मानते

    एचआईवी रोगियों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए शासन लगातार प्रयासरत हैं। हालांकि इस बीमारी के फैलने का मुख्य कारण जागरुकता का आभाव है। लोग दवा लेने को तैयार नहीं होते हैं। साथ ही स्वास्थ्य विभाग की सलाह तक नहीं मानते हैं। जिसकी वजह से कभी-कभी अप्रिय स्थिति का भी सामना करना पड़ता है। - डॉ. मनीष शर्मा, जिला क्षय अधिकारी

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