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    'यादों के झरोखों में न रह जाए गौरैया'

    Published: Thu, 07 Apr 2016 09:13 AM (IST) | Updated: Thu, 16 Mar 2017 10:52 PM (IST)
    By: Editorial Team

    इंदौर। 'नन्ही गौरैया की चहचहाहट, उसका यहां-वहां फुदकना, उसके कमरे में आते ही तुरंत पंखे बंद कर बाहर जाने का इंतजार करना और सुबह उठते ही छत पर दाना-पानी रखना' सब कुछ अब यादों और किस्से-कहानियों में ही सिमट कर रह गया है। इन सब की धुरी गौरैया कहीं गुम जो हो गई है। गौरैया को वापस बुलाने, उन्हें संरक्षित करने और उनकी संख्या को बढ़ाने के लिए नईदुनिया के अभियान 'लौट आओ गौरैया" को बेहतरीन प्रतिसाद मिल रहा है। कई लोग इस अभियान का हिस्सा बनते जा रहे हैं। अपना समर्थन और प्रयास वे रचनात्मक ढंग से भी दे रहे हैं।

    कविता

    'अब जाना नहीं गौरैया"

    मुझे अकेला छोड़ तुम

    कहां गई गौरैया?

    सुबह-सुबह जब आती तुम

    मां हौले-हौले जगाती थी।

    मैं अलसाई सी तुम्हें देखकर

    कैसे खुश हो जाती थी।

    दाना-दुनका चोंच में भर तुम

    झट मुंडेर पर आ जाती थी।

    फुदक-फुदक कर नाच दिखा तुम

    कैसे मन बहला जाती थी।

    फुर्र-फुर्र करती घर आंगन में तुम

    अपना अधिकार जताती थी।

    पर्यावरण संरक्षक भी तुम

    परोपकार सदा सिखाती थी।

    घर हुए छोटे आंगन हुए छोटे

    वृक्ष हुए कम पर स्नेह नहीं कम।

    वृक्ष लगाए नीड़ बनाए आकर देखो तुम

    आंगन में परोसे दाने और सकोरे में जल।

    मुझे अकेला छोड़ तुम

    अब जाना नहीं गौरैया।

    डॉ. शशि निगम

    50 परिहार कॉलोनी,

    एरोड्रम रोड, इंदौर

    कविता

    'चूरी चावल की लिए"

    भौतिकता हावी हुई हुई दृष्टि भी क्रूर

    तभी पलायन कर गई गौरैया अति दूर

    आंगन में अमरूद था जहां बनी दीवार

    दादाजी अब हैं नहीं कौन करे प्रतिकार

    गौरैया भरती नहीं आंगन में विश्वास

    बालकनी में है कहां जमी-जमाई घास

    गौरैया अच्छा नहीं सेहत के हित क्रोध

    रिश्तों में मिश्री घुले करो दूर गतिरोध

    गौरैया फड़फड़ करो खूब नहाओ धूल

    पीपल बरगद कट गए हुई हमीं से भूल

    चूरी चावल की लिए दादी मां के हाथ

    सुबह-सुबह ही चाहते गौरैया का साथ

    फिर से देखेंगे सभी चूजों की बारात

    चॉचू-चॉचू भीड़ से होता हुआ प्रभात

    दाना पानी घोंसला छुट्टी- सुबहो-शाम

    घर के लोगों ने किया एक तुम्हारे नाम

    तिनका-तिनका जोड़कर असली जैसा नीड़

    बना-बनाकर है खड़ी लो स्वजनों की भीड़

    देखो हमने भूल को लिया आज स्वीकार

    लौटो गौरैया तुम्हें पल-पल करते प्यार

    प्रभु त्रिवेदी

    प्रणम्य 111, राम रहीम कॉलोनी

    राऊ

    कविता

    'चिड़िया के हक में गुड़िया की चिट्ठी"

    रोज देखती गुड़िया

    अपनी प्यारी चिड़िया

    रोज-रोज आती चिड़िया

    कभी ट्यूब लाइट के ऊपर

    छत पर लटके पंखे पर

    घर अपना बनाती चिड़िया

    कभी भैया के बस्ते में

    खूंटी पर टंगे पापा के पेंट में

    मम्मी की ड्रेसिंग टेबल पर

    तिनके रोज जुटाती चिड़िया

    भैया के कंकर से कांपती

    पापा के हाथों से डरती

    मम्मी की झाड़ू से भागती

    फुर्र-फुर्र उड़ जाती चिड़िया

    पत्र डालती मंत्रीजी को

    प्यारी चिड़िया की प्यारी गुड़िया

    मिले हक चिड़िया को उसका

    घर भी दिलवाओ उसको बढ़िया

    ब्रजेश कानूनगो

    503, गोयल रिजेंसी

    चमेली पार्क, कनाड़िया रोड, इंदौर

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