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    'ओ री गौरैया, नन्ही सी चिड़िया, अंगना में फिर आ जा रे...'

    Published: Wed, 13 Apr 2016 08:59 AM (IST) | Updated: Thu, 16 Mar 2017 10:52 PM (IST)
    By: Editorial Team

    इंदौर। कभी वह घर के आंगन में आती थी, चहकती थी, दाना चुगती थी। अब वह जाने कहां चली गई? शायद हम अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त हो गए कि अब हमारे पास समय ही नहीं है। शहर को बसाने में इतना मदमस्त हो गए कि पेड़ लगाना ही भूल गए। अब वह हमसे नाराज है। यदि उसे वापस बुलाना है तो थोड़ा समय निकालना होगा। उसे दाना डालना होगा और पानी भी।

    उसके रहने के लिए कुछ पेड़ भी लगाने होंगे। फिर वह एक दिन लौट आएगी। जी हां, यहां बात रह रहे हैं नन्ही सी चिड़िया 'गौरैया की। हर आंगन में सहज रूप से दिखने वाली गौरैया अब नहीं दिखती है। इसे वापस लाने की 'नईदुनिया-जागरण' की मुहिम 'लौट आओ गौरैया के तहत मंगलवार को धार रोड स्थित विद्यांजलि इंटरनेशनल स्कूल में कार्यक्रम हुआ।

    स्कूल में बच्चों को बर्ड एक्सपर्ट अजय गड़िकर ने गौरैया के बारे में कुछ रोचक जानकारियां दीं। वहीं रूपांतरण संस्था के कलाकारों ने नुक्कड़ नाटक से उक्त संदेश रोचक अंदाज में बच्चों तक पहुंचाया। उन्होंने नाटक की शुरुआत चिड़िया उड़ खेल के साथ की। खेल-खेल के दौरान गौरैया का जिक्र होने पर सभी दोस्त मिलकर उसे ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं।

    काफी मशक्कत के बाद उन्हें गौरैया मिल जाती है और अपने वापस न आने का दर्द भी बयां करती है। 'ओ री गौरैया, नन्ही सी चिड़िया अंगना में फिर आजा रे..." गीत के साथ नाटक खत्म होता है। नाटक के जरिये कलाकार शालिनी सिंह, दिनेक सनोदिया, पीयूष ठाकुर, हैरी मीणा, केशव शर्मा सरल और मनोरंजक अंदाज में अपनी बात बच्चों तक पहुंचाते हैं। कार्यक्रम के अंत में बच्चों ने भी 'नईदुनिया-जागरण" की टीम से गौरैया को वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास का वादा किया।

    एक दिन में 220 बार खाना खाते हैं गौरैया के बच्चे

    गड़िकर ने बच्चों को बताया गौरैया एक बार में तीन से पांच अंडे देती है। उसके बच्चे बहुत जल्दी बढ़ते हैं और एक बच्चे को दिन में करीब 220 बार खाना चाहिए होता है। उसके बच्चों को प्रोटीन की आवश्यकता अधिक होती है और वह उन्हें सिर्फ कीड़े-मकोड़ों से मिलता है। आजकल कीड़े-मकोड़ों की संख्या भी बहुत कम हो गई है। इससे गौरैया के बच्चों को सही पोषण भी नहीं मिल पाता है। गड़िकर ने बताया मादा गौरैया का रंग थोड़ा फीका होता है, जिससे वह हिफाजत से बच्चों को जन्म देती है और शिकारियों से बचाती है।

    इन्फॉर्मेटिव और इंटरेस्टिंग है मुहिम

    यह एक संवेदनशील मुद्दा है। यदि हम बच्चों को इस बारे में बताते तो शायद गंभीर तरीके से जानकारी देते और पूरी बात पहुंच नहीं पाती। 'नईदुनिया-जागरण" की टीम ने इन्फॉर्मेटिव और इंटरेस्टिंग तरीके से बच्चों तक बात पहुंचाई है। गौरैया के विलुप्त होने का एक संकेत यह भी है कि कई और भी चीजें हो रही हैं, जो हमारे सामने नहीं आ पा रही हैं। कई बातों को हम जानकर भी अनजान बनने की कोशिश कर रहे हैं। इन बातों को समझने की कोशिश करते हुए अब गंभीर रूप से पर्यावरण बचाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। एक शैक्षणिक संस्थान होने के नाते हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। हम अन्य स्कूलों तक भी यह बात पहुंचाकर इस दिशा में आगे भी काम करेंगे। -रुचि गांधी, प्रिंसिपल, विद्यांजलि इंटरनेशनल स्कूल

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